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पुतिन की भारत यात्रा 2025: एसयू-57 जेट, तेल सौदे और व्यापार को बढ़ावा

भारत आज से रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अहम यात्रा की मेजबानी कर रहा है, जिसमें सु‑57 लड़ाकू विमान, रक्षा सहयोग, सस्ता तेल और द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने पर विस्तृत बातचीत होगी। यह रूस‑यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पुतिन की भारत की पहली आधिकारिक यात्रा है, इसलिए इसे भारत‑रूस संबंधों के भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम माना जा रहा है।​

पुतिन की यात्रा का समय और पृष्ठभूमि

पुतिन 4–5 दिसंबर को 23वें भारत‑रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली में रहेंगे, जिसे दोनों देशों के बीच सर्वोच्च स्तर का राजनीतिक संवाद मंच माना जाता है। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब रूस पर यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी प्रतिबंध जारी हैं और भारत एक साथ अमेरिका, यूरोप और रूस – तीनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। हाल के महीनों में अमेरिका ने भारत से होने वाले कुछ आयातों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए हैं और रूस के साथ व्यापार पर भी प्रतिबंधों का दबाव बढ़ाने की कोशिश की है, जिससे इस शिखर बैठक की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई है।​

मोदी‑पुतिन बैठकें, निजी डिनर और आधिकारिक कार्यक्रम

पुतिन के दिल्ली पहुंचते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके सम्मान में सीमित दायरे वाला निजी डिनर आयोजित करेंगे, जिसे दोनों नेताओं के बीच “गुप्त लेकिन नियमित” संवाद की परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है। अगली बैठकों में उनका स्वागत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ औपचारिक शिष्टाचार भेंट, राजनयिक स्तर की वार्ताओं और संयुक्त प्रेस बयान के जरिये किया जाएगा, जहां रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे सभी प्रमुख मुद्दों पर आधिकारिक रूप से बात रखी जाएगी। कार्यक्रम में पुतिन की भारत‑रूस बिजनेस फोरम में भागीदारी, भारतीय और रूसी कंपनियों के बीच साझेदारी बढ़ाने पर संवाद और रूसी टीवी नेटवर्क RT के भारत में प्रसारण की औपचारिक शुरुआत भी शामिल है, जो मीडिया और सूचना क्षेत्र में दोनों देशों के बढ़ते सहयोग को दर्शाती है।​

रक्षा सहयोग: सु‑57 जेट, मिसाइल और नई तकनीक

क्रेमलिन के प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वार्ता के एजेंडा में रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सु‑57 को भारत को निर्यात करने की संभावना पर भी चर्चा होगी, क्योंकि भारतीय वायुसेना उन्नत स्टील्थ क्षमता वाले जेट विमानों के लिए विकल्प तलाश रही है। इसके साथ ही ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के संयुक्त उत्पादन, स्पेयर पार्ट्स की समय पर आपूर्ति, पहले से खरीदे गए S‑400 एयर डिफेंस सिस्टम के रखरखाव और भविष्य में नई एयर‑डिफेंस या नेवल प्लेटफॉर्म तकनीक पर सहयोग जैसे मुद्दे भी उठने की उम्मीद है। रूस पहले ही कह चुका है कि भारत के साथ सु‑57 जैसे प्लेटफॉर्म पर समझौते को प्रतिद्वंद्वी देशों के दबाव और पश्चिमी लॉबिंग से बचाकर आगे बढ़ाना उसके लिए प्राथमिकता है, जबकि भारत चाह रहा है कि हर रक्षा सौदे में तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय उत्पादन और लंबी अवधि के रखरखाव की स्पष्ट शर्तें तय हों।​

व्यापार, तेल और प्रतिबंधों से सुरक्षा की रणनीति

दोनों नेता मौजूदा लगभग 68 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य तय करने पर चर्चा करेंगे, जिसमें ऊर्जा, खनन, उर्वरक, फार्मा, आईटी और मशीनरी जैसे क्षेत्र प्रमुख होंगे। रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम बनी हुई है, लेकिन इसके साथ ही अमेरिका और उसके सहयोगियों के प्रतिबंधों, सेकेंडरी सैंक्शन और नए टैरिफ के खतरे को देखते हुए दिल्ली ऐसी व्यवस्था चाहती है जिससे न तो आपूर्ति पर असर पड़े और न ही भारतीय कंपनियां दंडात्मक कार्रवाई के जोखिम में आएं। इसी वजह से रुपये‑रूबल या स्थानीय मुद्राओं में भुगतान, वैकल्पिक शिपिंग और बीमा तंत्र, और ऐसे बैंकिंग चैनलों पर विचार हो रहा है जो प्रतिबंधित पश्चिमी वित्तीय संस्थानों पर निर्भर न हों; यह कदम भारत‑रूस व्यापार को बाहरी दबावों से अधिक “इंसुलेट” करने की दिशा में माना जा रहा है।​

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ऊर्जा, परमाणु, श्रम समझौते और भू‑राजनीतिक संदेश

शिखर बैठक में नागरिक परमाणु ऊर्जा सहयोग, विशेष रूप से कुडनकुलम जैसे प्रोजेक्ट्स और संभावित छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) तकनीक पर साझेदारी को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा होगी, ताकि भारत को स्वच्छ और भरोसेमंद बिजली के दीर्घकालिक स्रोत मिल सकें। दोनों पक्ष ऐसी रूपरेखा पर भी काम कर रहे हैं जिसके तहत भारतीय पेशेवरों और कुशल श्रमिकों को रूस में काम करने के लिए आसान वीजा, कानूनी सुरक्षा और दोतरफा श्रम समझौते के माध्यम से अधिक अवसर मिल सकें, जबकि रूस अपनी अर्थव्यवस्था के लिए तकनीकी और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में मानव संसाधन की जरूरतें पूरी कर सके।

व्यापक स्तर पर यह यात्रा यह संदेश भी देती है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और बदलते इंडो‑पैसिफिक समीकरणों के बावजूद भारत और रूस अपनी “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” को बनाए रखने, संवाद जारी रखने और आपसी हितों को ध्यान में रखते हुए नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालने के लिए तैयार हैं, जबकि भारत सार्वजनिक रूप से युद्ध खत्म करने और शांति की दिशा में कूटनीतिक प्रयासों की वकालत करता रहा है।