टैक्स गाइडरियल एस्टेटवित्त

भारत में संपत्ति बेचने के कर प्रभावः एक पूर्ण मार्गदर्शिका

जब कोई व्यक्ति अपनी बरसों की मेहनत से बनाई गई प्रॉपर्टी को बेचने का फैसला करता है, तो उसके मन में कई तरह के सवाल और थोड़ी घबराहट होती है। यह घबराहट सिर्फ खरीदार ढूंढने या सही कीमत पाने को लेकर नहीं होती, बल्कि सरकार को दिए जाने वाले हिस्से यानी टैक्स को लेकर भी होती है। भारत में जमीन या मकान बेचना सिर्फ एक वित्तीय लेन-देन नहीं है, बल्कि यह कानूनी नियमों का एक पूरा जाल है जिसे समझना हर विक्रेता के लिए बहुत जरूरी है। India में प्रॉपर्टी बेचने पर टैक्स की गणना कैसे होती है और किन परिस्थितियों में आप अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा बचा सकते हैं, इसी विषय पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे। 2026 के इस दौर में टैक्स के नियम पहले के मुकाबले काफी स्पष्ट हो चुके हैं, लेकिन उनकी बारीकियों को नजरअंदाज करना आपको भारी पड़ सकता है।

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अक्सर लोग प्रॉपर्टी बेचने के बाद मिलने वाले पूरे पैसे को अपना मुनाफा मान लेते हैं, जबकि असलियत में वह ‘कैपिटल गेन्स’ के दायरे में आता है। इनकम टैक्स विभाग आपकी संपत्ति की बिक्री से होने वाले लाभ को आपकी आय का एक हिस्सा मानता है। अगर आप बिना किसी टैक्स प्लानिंग के सौदा करते हैं, तो आपको अपने मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में देना पड़ सकता है। लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कानून आपको कई ऐसे रास्ते भी देता है जिनसे आप अपनी टैक्स देनदारी को शून्य तक ला सकते हैं। इस गाइड में हम उन सभी पहलुओं को छुएंगे जो एक प्रॉपर्टी मालिक के लिए जानना बेहद जरूरी है।

कैपिटल गेन्स का वर्गीकरण और समय सीमा का महत्व

प्रॉपर्टी बेचने पर होने वाले लाभ को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है, और आपकी पूरी टैक्स प्लानिंग इसी बात पर टिकी होती है कि आपकी संपत्ति किस श्रेणी में आती है। पहली श्रेणी है ‘शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स’ और दूसरी है ‘लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स’। इन दोनों के बीच का सबसे बड़ा अंतर वह समय है जितने समय तक आपने उस प्रॉपर्टी को अपने पास रखा था। भारत के मौजूदा नियमों के अनुसार, यदि आप किसी अचल संपत्ति (जैसे मकान या जमीन) को खरीदने के 24 महीने के भीतर बेच देते हैं, तो उससे होने वाला मुनाफा शॉर्ट-टर्म माना जाएगा। इसके विपरीत, यदि आप उसे 24 महीने से अधिक समय तक रखने के बाद बेचते हैं, तो वह लॉन्ग-टर्म मुनाफे की श्रेणी में आता है।

शॉर्ट-टर्म मुनाफे पर टैक्स की मार सबसे ज्यादा पड़ती है क्योंकि इसे आपकी नियमित आय में जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आपकी साल भर की कमाई और प्रॉपर्टी का मुनाफा मिलाकर आप 30 प्रतिशत वाले टैक्स स्लैब में आते हैं, तो आपको मुनाफे पर भी सीधा 30 प्रतिशत टैक्स देना होगा। वहीं दूसरी ओर, लॉन्ग-टर्म मुनाफे पर सरकार कुछ राहत देती है और इसमें टैक्स की दरें तुलनात्मक रूप से कम और फिक्स होती हैं। इसके अलावा, लॉन्ग-टर्म मुनाफे पर आपको निवेश के कई ऐसे विकल्प मिलते हैं जो शॉर्ट-टर्म में उपलब्ध नहीं होते। इसलिए प्रॉपर्टी बेचने से पहले यह देख लेना चाहिए कि क्या आप 24 महीने की समय सीमा को पार कर चुके हैं या नहीं।

वर्गीकरण के मुख्य बिंदु शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG)
समय की पाबंदी 24 महीने से कम अवधि 24 महीने से अधिक की अवधि
टैक्स की गणना आपकी कुल वार्षिक आय में जोड़कर अलग से निर्धारित टैक्स दर पर
इंडेक्सेशन लाभ इस श्रेणी में उपलब्ध नहीं है कुछ मामलों में लाभ मिलता है
निवेश छूट कोई निवेश छूट नहीं मिलती सेक्शन 54 और 54EC के तहत छूट
घाटे का तालमेल किसी भी कैपिटल गेन से संभव सिर्फ लॉन्ग-टर्म गेन से संभव

India में प्रॉपर्टी बेचने पर टैक्स की मौजूदा दरें

साल 2026 में टैक्स की दरों को लेकर काफी स्पष्टता आ चुकी है, लेकिन इंडेक्सेशन के नियमों ने इसे थोड़ा दिलचस्प बना दिया है। लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स के लिए अब मुख्य रूप से 12.5 प्रतिशत की एक समान टैक्स दर का चलन बढ़ गया है, जिसमें इंडेक्सेशन (महंगाई के हिसाब से लागत बढ़ाना) का लाभ शामिल नहीं होता। हालांकि, जिन लोगों ने अपनी प्रॉपर्टी बहुत साल पहले खरीदी थी, उनके लिए सरकार ने कुछ विशेष प्रावधान किए हैं ताकि उन्हें अचानक से ज्यादा टैक्स न देना पड़े। टैक्स की इन दरों को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि इसी के आधार पर आप अपने सौदे की अंतिम कीमत तय कर सकते हैं।

जब हम टैक्स की बात करते हैं, तो सिर्फ मुनाफे पर लगने वाले प्रतिशत को ही नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसके साथ लगने वाले सरचार्ज और एजुकेशन सेस को भी जोड़ना चाहिए। कुल मिलाकर आपकी टैक्स देनदारी बताए गए प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा ही बैठती है। शॉर्ट-टर्म के मामलों में तो यह पूरी तरह आपकी किस्मत और आपकी अन्य आय पर निर्भर करता है। यदि आप एक ऊंचे वेतन वाले प्रोफेशनल हैं, तो प्रॉपर्टी बेचना आपके लिए टैक्स के लिहाज से महंगा सौदा साबित हो सकता है। इसलिए जानकार हमेशा सलाह देते हैं कि प्रॉपर्टी को कम से कम दो साल तक रखने के बाद ही बेचने का मन बनाना चाहिए ताकि टैक्स का बोझ कम हो सके।

प्रॉपर्टी टैक्स की दरें 2026 शॉर्ट-टर्म (STCG) दर लॉन्ग-टर्म (LTCG) दर
रिहायशी मकान या फ्लैट लागू इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार 12.5% (बिना इंडेक्सेशन)
खाली जमीन या प्लॉट लागू इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार 12.5% (बिना इंडेक्सेशन)
कमर्शियल दुकान या ऑफिस लागू इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार 12.5% या स्लैब के अनुसार
विरासत वाली संपत्ति लागू इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार 12.5% (मूल खरीद से गणना)
कृषि योग्य शहरी जमीन लागू इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार 12.5% (नियमों के अधीन)

टीडीएस (TDS) के नियम और विक्रेता की सावधानियां

भारत में जब भी कोई प्रॉपर्टी का सौदा 50 लाख रुपये या उससे अधिक का होता है, तो आयकर विभाग एक विशेष नियम लागू करता है जिसे टीडीएस कहा जाता है। इस नियम के तहत, खरीदार की यह जिम्मेदारी होती है कि वह आपको पूरी रकम देने के बजाय कुल सौदे का 1 प्रतिशत हिस्सा काटकर सरकार के पास जमा करे। उदाहरण के तौर पर, यदि आप अपना घर 80 लाख रुपये में बेच रहे हैं, तो खरीदार आपको 79 लाख 20 हजार रुपये देगा और 80 हजार रुपये आपके पैन कार्ड के जरिए टैक्स विभाग को भेजेगा। यह राशि आपके एडवांस टैक्स के रूप में जमा हो जाती है जिसे आप साल के अंत में अपनी टैक्स देनदारी से कम कर सकते हैं।

विक्रेता के तौर पर आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि खरीदार ने वह 1 प्रतिशत पैसा वाकई जमा कर दिया है। इसके लिए आपको खरीदार से फॉर्म 16बी मांगना चाहिए। यदि खरीदार पैसा काट लेता है लेकिन जमा नहीं करता, तो आपको टैक्स विभाग की तरफ से नोटिस आ सकता है क्योंकि आपकी सेल डीड में पूरी रकम लिखी होगी। इसके अलावा, यदि बेचने वाला व्यक्ति भारत का निवासी नहीं है (यानी एनआरआई है), तो टीडीएस की दर 1 प्रतिशत नहीं बल्कि बहुत अधिक (लगभग 20-23 प्रतिशत) होती है। इसलिए सौदे से पहले अपनी रेजिडेंशियल स्टेटस स्पष्ट करना बहुत जरूरी है ताकि बाद में कोई कानूनी अड़चन न आए।

टीडीएस (TDS) संबंधी नियम मुख्य विवरण
लागू होने की सीमा 50 लाख रुपये या उससे अधिक का सौदा
कटौती की दर कुल बिक्री मूल्य का 1 प्रतिशत
जमा करने की जिम्मेदारी खरीदार (Buyer) की होती है
आवश्यक दस्तावेज फॉर्म 16बी और पैन कार्ड लिंकिंग
एनआरआई विक्रेता के लिए मुनाफे के आधार पर 20% से अधिक

सेक्शन 54: नया घर खरीदकर टैक्स बचाने का तरीका

सेक्शन 54: नया घर खरीदकर टैक्स बचाने का तरीका

इनकम टैक्स एक्ट का सेक्शन 54 उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो अपना पुराना घर बेचकर नया घर लेना चाहते हैं। सरकार का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी छत बेचकर दूसरी छत खरीद रहा है, तो उस पर टैक्स का बोझ नहीं डालना चाहिए। इस नियम के तहत, यदि आप अपने पुराने रिहायशी मकान को बेचकर उससे होने वाले लॉन्ग-टर्म मुनाफे को एक नए रिहायशी मकान में निवेश करते हैं, तो आपको उस मुनाफे पर कोई टैक्स नहीं देना होगा। यह छूट उतनी ही मिलेगी जितना पैसा आप नए घर में लगाएंगे।

इस छूट को पाने के लिए कुछ समय की सीमाएं तय की गई हैं। नया घर आप पुरानी प्रॉपर्टी बेचने के एक साल पहले खरीद चुके हों या फिर बेचने के दो साल के भीतर खरीद लें। यदि आप बना-बनाया घर लेने के बजाय जमीन लेकर घर बनवाना चाहते हैं, तो सरकार आपको तीन साल का समय देती है। एक बहुत ही महत्वपूर्ण बदलाव जो हाल के वर्षों में हुआ है वह यह कि यदि आपका मुनाफा 2 करोड़ रुपये तक है, तो आप उस पैसे से एक के बजाय दो घर भी खरीद सकते हैं और दोनों पर टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। हालांकि, यह मौका जीवन में केवल एक ही बार मिलता है, इसलिए इसका चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए।

सेक्शन 54 के तहत लाभ नियम और शर्तें
कौन निवेश कर सकता है सिर्फ व्यक्तिगत मालिक या अविभाजित हिंदू परिवार
किसमें निवेश करना है सिर्फ भारत में स्थित रिहायशी मकान में
निवेश की समय सीमा बिक्री के 2 साल के भीतर (खरीद) या 3 साल (निर्माण)
अधिकतम छूट की सीमा अधिकतम 10 करोड़ रुपये तक का मुनाफा
होल्डिंग की शर्त नया घर 3 साल तक नहीं बेचा जाना चाहिए

सेक्शन 54EC: कैपिटल गेन्स बॉन्ड्स में सुरक्षित निवेश

हर कोई प्रॉपर्टी बेचकर तुरंत दूसरा घर नहीं खरीदना चाहता। कुछ लोग उस पैसे को अपनी रिटायरमेंट के लिए रखना चाहते हैं या सुरक्षित निवेश करना चाहते हैं। ऐसे लोगों के लिए सेक्शन 54EC एक बेहतरीन विकल्प प्रदान करता है। इस नियम के अनुसार, आप अपनी प्रॉपर्टी के लॉन्ग-टर्म मुनाफे को कुछ विशेष सरकारी बॉन्ड्स में निवेश कर सकते हैं। ये बॉन्ड्स आमतौर पर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) या रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन (REC) जैसी संस्थाओं द्वारा जारी किए जाते हैं। इन बॉन्ड्स में पैसा लगाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको प्रॉपर्टी के मुनाफे पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता।

हालांकि, इस विकल्प के साथ कुछ सीमाएं भी जुड़ी हुई हैं। पहली यह कि आप एक वित्तीय वर्ष में इन बॉन्ड्स में अधिकतम 50 लाख रुपये ही निवेश कर सकते हैं। दूसरी बात यह है कि यह निवेश आपको प्रॉपर्टी बेचने के 6 महीने के भीतर ही करना होता है। इन बॉन्ड्स का लॉक-इन पीरियड 5 साल का होता है, जिसका मतलब है कि आप 5 साल से पहले अपना पैसा नहीं निकाल सकते। इन पर मिलने वाला ब्याज भी बहुत ज्यादा नहीं होता (आमतौर पर 5 प्रतिशत के आसपास), लेकिन जो टैक्स आप बचाते हैं, वह इसे एक बहुत ही आकर्षक विकल्प बना देता है। यह उन लोगों के लिए सबसे अच्छा है जिनके पास पहले से ही रहने के लिए घर है और वे प्रॉपर्टी मार्केट के रिस्क से दूर रहना चाहते हैं।

54EC बॉन्ड्स की जानकारी मुख्य विशेषताएं
निवेश की संस्थाएं आरईसी, एनएचएआई, पीएफसी और आईआरएफसी
अधिकतम निवेश राशि प्रति वित्तीय वर्ष 50 लाख रुपये
निवेश की अवधि सेल डीड की तारीख से 6 महीने के अंदर
लॉक-इन पीरियड 5 साल तक पैसा निकालना वर्जित
ब्याज का भुगतान वार्षिक ब्याज मिलता है, जो टैक्स योग्य है

कैपिटल गेन्स अकाउंट स्कीम (CGAS) का स्मार्ट उपयोग

प्रॉपर्टी बेचने और टैक्स रिटर्न भरने के बीच अक्सर समय का बहुत बड़ा अंतर होता है। मान लीजिए आपने अपनी प्रॉपर्टी मई के महीने में बेची, लेकिन आपको इनकम टैक्स रिटर्न अगले साल जुलाई में भरना है। कानून कहता है कि टैक्स से बचने के लिए आपको तय समय में नया घर खरीदना होगा। लेकिन अगर आपको जुलाई तक कोई अच्छा घर नहीं मिला, तो क्या आपको टैक्स देना पड़ेगा? यहीं पर काम आती है ‘कैपिटल गेन्स अकाउंट स्कीम’। आप अपना मुनाफा किसी भी अधिकृत सरकारी बैंक में इस विशेष खाते के तहत जमा कर सकते हैं।

इस खाते में पैसा जमा करने का मतलब यह होता है कि आपने सरकार को यह वचन दिया है कि आप इस पैसे का इस्तेमाल घर खरीदने के लिए ही करेंगे। जैसे ही आप इस खाते में पैसा डालते हैं, आपको उस साल के टैक्स से छूट मिल जाती है। बाद में जब भी आपको सही प्रॉपर्टी मिले, आप इस खाते से पैसा निकालकर भुगतान कर सकते हैं। बस एक बात का ध्यान रखें कि यदि आप तीन साल के भीतर इस पैसे का उपयोग घर बनाने या खरीदने में नहीं करते हैं, तो वह पैसा वापस टैक्स के दायरे में आ जाएगा। यह स्कीम उन लोगों के लिए किसी लाइफलाइन की तरह है जो जल्दबाजी में गलत प्रॉपर्टी खरीदने के बजाय सही चुनाव करने के लिए समय चाहते हैं।

कैपिटल गेन्स अकाउंट के नियम विवरण
खाता कहाँ खुलवाएं किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (जैसे SBI) में
जमा करने की समय सीमा इनकम टैक्स रिटर्न भरने की नियत तारीख से पहले
पैसे का इस्तेमाल केवल घर खरीदने या निर्माण के लिए
ब्याज दरें सामान्य बचत या सावधि जमा के बराबर
विफलता का परिणाम उपयोग न होने पर 3 साल बाद टैक्स देय होगा

विरासत में मिली प्रॉपर्टी और टैक्स का जटिल गणित

भारत में बहुत से लोग ऐसी प्रॉपर्टी बेचते हैं जो उन्हें अपने माता-पिता या दादा-दादी से विरासत में मिली होती है। ऐसी प्रॉपर्टी को बेचते समय अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं कि उन्हें टैक्स किस कीमत पर देना है। नियम यह कहता है कि विरासत में मिली संपत्ति पर आपको वह मूल्य ‘खरीद मूल्य’ मानना चाहिए जिस पर उस व्यक्ति ने उसे खरीदा था जिसने वह आपको दी है। उदाहरण के लिए, अगर आपके पिता ने 1990 में एक प्लॉट 50 हजार में खरीदा था और आज आप उसे 50 लाख में बेच रहे हैं, तो आपका मुनाफा 49 लाख 50 हजार माना जाएगा (इंडेक्सेशन के बिना)।

यहाँ एक अच्छी बात यह है कि ‘होल्डिंग पीरियड’ यानी समय सीमा की गणना भी पिता की खरीद की तारीख से ही की जाएगी। इसका मतलब है कि विरासत में मिली लगभग हर प्रॉपर्टी लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स के दायरे में ही आती है, जिससे आपको टैक्स बचाने के ज्यादा विकल्प मिलते हैं। यदि वह प्रॉपर्टी 1 अप्रैल 2001 से पहले की है, तो आपके पास विकल्प होता है कि आप 2001 की ‘फेयर मार्केट वैल्यू’ को अपनी खरीद लागत मान लें। इससे आपकी लागत बढ़ जाती है और टैक्स का बोझ काफी कम हो जाता है। वसीयत या उपहार में मिली संपत्ति के कागजात हमेशा संभालकर रखने चाहिए क्योंकि टैक्स विभाग खरीद के पुराने सबूत मांग सकता है।

विरासत वाली प्रॉपर्टी के बिंदु टैक्स नियम
खरीद की लागत मूल खरीदार द्वारा चुकाई गई राशि
समय की गणना मूल खरीदार की खरीद की तारीख से
2001 का विकल्प 1 अप्रैल 2001 की मार्केट वैल्यू चुनने की आजादी
आवश्यक दस्तावेज वसीयत, म्यूटेशन पेपर और पुरानी सेल डीड
टैक्स छूट के रास्ते सेक्शन 54 और 54EC पूरी तरह लागू

सर्किल रेट और असल कीमत का टकराव (सेक्शन 50C)

प्रॉपर्टी के लेन-देन में एक सबसे बड़ी रुकावट तब आती है जब उस इलाके का ‘सर्किल रेट’ (सरकारी रेट) आपकी वास्तविक बिक्री कीमत से ज्यादा हो। मान लीजिए किसी इलाके की मार्केट वैल्यू गिर गई है और आप अपना फ्लैट 40 लाख में बेच रहे हैं, लेकिन वहां का सरकारी रेट 50 लाख है। ऐसी स्थिति में इनकम टैक्स विभाग यह नहीं मानेगा कि आपने इसे 40 लाख में बेचा है। सेक्शन 50C के तहत, विभाग यह मान लेगा कि आपने इसे 50 लाख में ही बेचा है और आपसे उसी आधार पर टैक्स वसूलेगा।

यह नियम काले धन के लेन-देन को रोकने के लिए बनाया गया है, लेकिन कभी-कभी ईमानदार विक्रेता भी इसमें फंस जाते हैं। हालांकि, इसमें 10 प्रतिशत की राहत दी गई है। यदि आपकी बिक्री कीमत और सर्किल रेट में 10 प्रतिशत तक का अंतर है, तो विभाग आपकी बताई हुई कीमत को स्वीकार कर लेगा। लेकिन अगर अंतर इससे ज्यादा है, तो आपको बहुत सावधानी बरतनी होगी। आप वैल्यूएशन ऑफिसर के पास अपील कर सकते हैं, लेकिन इसमें समय और मेहनत लगती है। इसलिए हमेशा कोशिश करें कि आपका सौदा सर्किल रेट के आसपास ही हो ताकि बाद में आयकर विभाग के चक्कर न लगाने पड़ें।

सर्किल रेट बनाम असल कीमत परिणाम और समाधान
कीमत में 10% तक का अंतर कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं, सेल प्राइस मान्य
कीमत में 10% से ज्यादा अंतर सर्किल रेट को ही बिक्री मूल्य माना जाएगा
खरीदार पर असर खरीदार को ‘अन्य स्रोतों से आय’ पर टैक्स देना होगा
अपील का रास्ता जिला स्तर के वैल्यूएशन ऑफिसर से शिकायत
स्टांप ड्यूटी का महत्व स्टांप ड्यूटी हमेशा सर्किल रेट पर ही देनी होगी

आखिरी विचार

प्रॉपर्टी बेचना जीवन का एक बड़ा वित्तीय पड़ाव है, और India में प्रॉपर्टी बेचने पर टैक्स की जानकारी होना इस पड़ाव को सफल बनाने के लिए अनिवार्य है। हमने देखा कि कैसे समय सीमा (24 महीने) और निवेश के सही विकल्प (सेक्शन 54 और 54EC) आपके लाखों रुपये बचा सकते हैं। 2026 में टैक्स के नियम सरल तो हुए हैं, लेकिन वे काफी सख्त भी हैं।

चाहे वह टीडीएस जमा करने की बात हो या सर्किल रेट का मिलान करने की, आपकी एक छोटी सी लापरवाही नोटिस का कारण बन सकती है। हमेशा याद रखें कि टैक्स बचाना आपका कानूनी हक है, लेकिन इसके लिए आपको नियमों के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए। किसी भी बड़े सौदे पर हस्ताक्षर करने से पहले अपने सभी कागजों की जांच कर लें और यदि संभव हो, तो एक अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट से मशविरा जरूर लें ताकि आपकी मेहनत की कमाई सुरक्षित रहे।

FAQs: महत्वपूर्ण और अनकहे सवाल

1. क्या मैं एक प्रॉपर्टी बेचकर उससे अपना पुराना होम लोन चुका सकता हूँ और टैक्स बचा सकता हूँ?

नहीं, होम लोन चुकाने को ‘पुनः निवेश’ नहीं माना जाता। टैक्स छूट केवल तभी मिलती है जब आप नया घर खरीदते हैं या बॉन्ड्स में निवेश करते हैं। यदि आप लोन चुकाते हैं, तो आपको पूरे मुनाफे पर टैक्स देना होगा।

2. मैंने प्रॉपर्टी घाटे में बेची है, क्या मुझे इसकी जानकारी आयकर विभाग को देनी चाहिए?

जी हाँ, घाटे को दिखाना बहुत जरूरी है। इस ‘कैपिटल लॉस’ को आप अगले 8 सालों तक अपनी बैलेंस शीट में रख सकते हैं। भविष्य में जब भी आप कोई और प्रॉपर्टी या सोना बेचेंगे और उस पर मुनाफा होगा, तो आप इस पुराने घाटे को उस मुनाफे से घटा सकते हैं।

3. क्या कृषि योग्य जमीन बेचने पर भी टैक्स लगता है?

यदि वह जमीन ‘ग्रामीण कृषि भूमि’ (Rural Agricultural Land) की श्रेणी में आती है, तो उस पर कोई कैपिटल गेन टैक्स नहीं लगता क्योंकि उसे ‘कैपिटल एसेट’ माना ही नहीं जाता। लेकिन अगर जमीन शहर की सीमा के भीतर है, तो वह सामान्य प्रॉपर्टी की तरह ही टैक्स के दायरे में आएगी।

4. क्या मैं एनआरआई (NRI) होते हुए भी कैपिटल गेन्स बॉन्ड्स में निवेश कर सकता हूँ?

हाँ, एनआरआई भी सेक्शन 54EC के तहत बॉन्ड्स में निवेश कर सकते हैं। हालांकि, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि बॉन्ड्स से मिलने वाला ब्याज भारत में टैक्स योग्य होता है, और उन्हें निवेश की पूरी प्रक्रिया एनआरओ (NRO) खाते के जरिए ही करनी चाहिए।

5. क्या घर की पेंटिंग या फिटिंग का खर्च लागत में जोड़ा जा सकता है?

छोटे-मोटे मरम्मत के काम या पेंटिंग को लागत में नहीं जोड़ा जा सकता। लेकिन अगर आपने कोई स्थायी निर्माण किया है, जैसे एक नया कमरा बनवाया या छत डलवाई, तो उसे ‘कॉस्ट ऑफ इम्प्रूवमेंट’ के तौर पर लागत में जोड़कर टैक्स कम किया जा सकता है।