केरल जल्द ही गरीबी से मुक्त होगाः सरकार
चार वर्ष पूर्व, 24 साल की Remya P (केरल के कोल्लम जिले के चवारा गाँव की निवासी) का जीवन भय-आशा से घिरा था। एक विधवा के रूप में, कैंसर-पीड़ित, दो छोटे बच्चों की माँ, न कोई स्थिर काम, न सुरक्षित छत — ऐसा जीवन रोज़मर्रा का संघर्ष बन गया था। उनके परिवार-हिस्से की कहानी वास्तव में उस “अत्यधिक गरीबी” स्तिथि की थी, जिसे अक्सर योजनाएँ नहीं पकड़ पाती।
लेकिन स्थानीय पंचायत के अधिकारियों ने जब उनकी स्थिति पर ध्यान दिया, तो उसे Extreme Poverty Eradication Project (EPEP) योजना के लाभार्थी के रूप में चिन्हित किया गया। आज-वजूद में, रेम्या कैंसर से विजयी हैं, उनको पंचायत हेल्पडेस्क-पर स्थिर नौकरी मिली है, और उन्हें राज्य-सरकार की LIFE Housing Programme के तहत सुरक्षित घर मिला है।
यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं — यह केरल राज्य की उस सामाजिक बदलाव की दिशा का प्रतीक है, जहाँ “कोई पीछे न छूटे” का सिद्धांत व्यवहार में उतर रहा है।
EPEP-योजना का रूप-रेखा और कार्यप्रणाली
राज्य-स्वशासन विभाग (LSGD) द्वारा संचालित यह पहल निम्न प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है:
- योजना की शुरुआत मई 2021 में हुई, जब सरकार ने पाँच वर्ष में “अत्यधिक गरीबी” खत्म करने का लक्ष्य तय किया।
- “अत्यधिक गरीबी” का मापन केवल आय-कम तक सीमित नहीं रहा — बल्कि चार मुख्य आयामों को लिया गया: भोजन-सुरक्षा, स्वास्थ्य-स्थिति, आय/उपार्जन, और आवास-श्रेणी (घर/भूमि)।
- पहचान-प्रक्रिया बहुत व्यापक थी: स्थानीय स्वशासन संस्थाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयं-सहायता समूहों (जैसे Kudumbashree) के सहयोग से लाखों लोगों को शामिल किया गया, फिर फील्ड-लीवल सत्यापन, ग्राम/वार्ड सभा में आंकलन हुआ।
- कुल 64,006 परिवारों, लगभग 1,03,099 व्यक्तियों को चिन्हित किया गया, जिन्हें ‘अत्यधिक गरीबी’ की श्रेणी में पाया गया।
- प्रत्येक परिवार के लिए माइक्रो-प्लान तैयार किया गया, जिसमें उनकी विशिष्ट जरूरतों (खाना, स्वास्थ्य, आवास, नौकरी) के अनुरूप हस्तक्षेप तय हुए।
- इस दौरान, अन्य योजनाओं (स्वास्थ्य बीमा, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, पहचान-दस्तावेज आदि) के साथ समन्वय बढ़ाया गया ताकि लाभार्थियों को ‘घंटे-घंटे’ समाधान मिले।
प्रमुख आंकड़े एवं उपलब्धियाँ
- राज्य-पुष्टि के अनुसार, चिन्हित 64,006 परिवारों को अब सक्रिय तौर पर “अत्यधिक गरीबी” की श्रेणी से बाहर लाने का काम पूरा कर लिया गया है।
- सर्वेक्षण में पाया गया: इन परिवारों में 35 % को आय-उपार्जन की कमी थी, 24 % स्वास्थ्य-सम्बंधित समस्याओं से जूझ रहे थे, 21 % भोजन-संकट में थे तथा 15 % के पास सुरक्षित आवास नहीं था।
- अब-तक 7,083 सुरक्षित आश्रय-घर (safe shelters/homes) पूरे किये जा चुके हैं राज्य में, सितंबर 2025 तक।
- इसके परिणामस्वरूप, राज्य सरकार का दावा है कि 1 नवंबर 2025 (राज्य-उत्थान-दिवस) तक केरल भारत का पहला “अत्यधिक गरीबी-मुक्त राज्य” बनेगा।
- मंत्री M B Rajesh ने कहा कि यह राजस्थान नहीं बल्कि देश में पहले और विश्व-स्तर पर चीन के बाद दूसरे स्थान पर “अत्यधिक गरीबी उन्मूलन” के मामले में खड़ा होगा।
मॉडल-प्रभाव और सफलता के कारण
- इस पहल का एक मुख्य कारण है विभागों का समन्वय (convergence) — जहाँ स्वास्थ्य, आवास, आय, सामाजिक सुरक्षा सभी एक-साथ चलाये गए। मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan ने इसकी निगरानी भी की।
- स्थानीय स्तर पर पंचायत-स्तर तक पहुंच — बहुत से लाभार्थी ऐसे थे जो पहले किसी सरकारी योजना से भी जुड़े नहीं थे (उदाहरण: घुमंतू-समुदाय/घुमन्तू जनजाति)। उन्हें भी इस अभियान में शामिल किया गया।
- शुरुआती प्राथमिकता खाद्य एवं स्वास्थ्य-जरूरतों को दी गयी — क्योंकि जीवन-रहने का आधार (खाना, स्वास्थ्य) तुरंत उपलब्ध होना था।
- एवं, इस योजना का डिजिटल-मानिटरिंग मोड लागू हुआ — प्रत्येक परिवार का डेटा मोबाइल-एप पर दर्ज किया गया, जिससे ट्रैकिंग संभव हो सकी।
चुनौतियाँ एवं आगे की चुनौतियाँ
- सरकार ने स्वयं कहा है कि “उठाए गए 60,000+ परिवारों का मतलब यह नहीं कि भविष्य में कोई परिवार अत्यधिक गरीबी में नहीं जाएगा।” यानी, पुनरावृत्ति (relapse) का जोखिम अभी भी मौजूद है।
- उदाहरण-स्वरूप, दृष्टिहीन गली-गायक Shy Varghese को नया घर मिला है, लेकिन अभी प्रवेश नहीं किया क्योंकि पहुँच-मार्ग असुरक्षित और बिजली कनेक्शन नहीं है।
- “भूमिहीन/घर-विहीन” परिवारों में ज़मीन उपलब्ध कराना मुख्य समस्या रहा — भारत जैसे स्थितिप्रधान संसाधन-संकट प्रदेश में यह बंदर-सवारी-कार्य है।
- एक अध्ययन (CSES) ने चेतावनी दी है कि “अत्यधिक गरीबी” एक स्थिर अवस्था नहीं— बल्कि उलझती प्रवृत्ति है। एक स्वास्थ्य-शोक, बेरोज़गारी-शॉक, मातृत्व-शोक आदि अचानक व्यक्ति को इस श्रेणी में ले जा सकते हैं। इसलिए “रुकने” की दिशा पर काम अब भी जरूरी है।
आगे की राह: क्या करना है?
- योजना अब सिर्फ उत्थान (upliftment) तक सीमित नहीं रह सकती — अगला काम पुनरावृत्ति रोकना तथा नए जोखिम-परिवारों को समय से पकड़ना है। CSES ने इसे “एक्स-एंटे रणनीति” कहकर चिन्हित किया है।
- माइक्रो-प्लानों को नियमित-अद्यतन (periodic revision) की जरूरत है ताकि प्रत्येक परिवार की बदलती स्थिति (बुढ़ापा, बीमारी, बेरोज़गारी) ध्यान में रहे।
- सामाजिक सुरक्षा-नेट को और मजबूती देने की जरूरत है — औपचारिक योजनाओं के साथ साथ स्थानीय सामाजिक नेटवर्क (जैसे Kudumbashree) की भूमिका अहम है।
- राज्य के अनुभव को अन्य राज्यों के संदर्भ में मॉडल-रूप देना संभव है — केरल का यह मॉडल देश में “सबको साथ ले चलने” का एक उदाहरण हो सकता है।
केरल की यह पहल — EPEP — बुनियादी रूप से यह दर्शाती है कि गरीबी सिर्फ आय-दर नहीं, बल्कि बहुआयामी है और उसे खत्म करने के लिए भी बहुआयामी रणनीति चाहिए भोजन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा, आय-उपार्जन सभी।
यह धारणा कि “गरीबी खुद बचेगी” गलत है — बल्कि सक्रिय, समन्वित और स्थानीय-सक्रिय हस्तक्षेप जरूरी है।
अब जब केरल लगभग लक्ष्य-रेखा पर खड़ा है, तो सबसे बड़ी जंग ये होगी कि यह उपलब्धि स्थायी बने — और भविष्य में कोई-नया परिवार इस श्रेणी में न जाए।
जानकारी द न्यू इंडियन एक्सप्रेस और मातृभूमि इंग्लिश से एकत्र की गई है।
