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बिहार में एनडीए का 200 पार, महागठबंधन का सफाया

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने एनडीए को 243 सदस्यीय विधानसभा में 200 सीटों से ज्यादा की जबरदस्त बढ़त दिलाई है, जो नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो रही है। यह जीत महागठबंधन को पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने जैसी लग रही है, जहां विपक्षी गठबंधन की सीटें 30-35 तक सिमट गई हैं। सुबह 8 बजे शुरू हुई वोटों की गिनती ने शुरुआती घंटों में ही एनडीए को मजबूत बढ़त दिलाई, और पोस्टल बैलेट्स ने इस लहर को और तेज कर दिया।​

यह चुनाव दो चरणों में 6 से 11 नवंबर तक हुआ था, जिसमें 67.13% रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया, जो बिहार का अब तक का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। एनडीए की यह सफलता 2020 के मुकाबले कहीं ज्यादा व्यापक है, जब गठबंधन को सिर्फ 125 सीटें मिली थीं। विपक्ष ने भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर हमला बोला, लेकिन एनडीए की विकास और सामाजिक कल्याण की रणनीति ने मतदाताओं को आकर्षित किया। विशेष रूप से महिलाओं का 71% मतदान ने नीतीश कुमार की सरकार को मजबूत आधार दिया, जो ‘महिला फैक्टर’ के रूप में उभरा।​

एनडीए की ऐतिहासिक धमाकेदार जीत: भाजपा और जेडीयू का दबदबा

एनडीए ने बिहार में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, जहां भाजपा 95 से ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है, जबकि जेडीयू ने 84 सीटों पर मजबूत पकड़ बना ली है, जो 2020 के 43 सीटों से दोगुना से ज्यादा है। जेडीयू को लगभग 19% वोट शेयर मिला, जो 2010 के बाद उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन है। गठबंधन के छोटे सहयोगियों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया: चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने 19 सीटें जीतीं, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) को 1 सीट मिली, और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने कुछ क्षेत्रों में सफलता पाई।​

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आक्रामक चुनावी मुहिम ने एनडीए को नई ऊर्जा दी, खासकर महिलाओं, युवाओं और पिछड़े वर्गों के बीच। मोदी ने ‘महिला एंड यूथ’ को नया ‘एमवाई’ फॉर्मूला बताया, जो बिहार की जीत का आधार बना। एनडीए ने सीट बंटवारे में भाजपा और जेडीयू के बीच लगभग बराबरी रखी थी, लेकिन भाजपा का बेहतर प्रदर्शन अब गठबंधन की आंतरिक गतिशीलता पर सवाल उठा रहा है। कुल मिलाकर, एनडीए की 204 से ज्यादा सीटें 2020 की 125 से कहीं आगे हैं, जो वोट-टू-सीट कन्वर्जन में उनकी दक्षता दिखाती हैं। क्षेत्रीय स्तर पर, एनडीए ने अंग प्रदेश और सीमांचल जैसे इलाकों में दबदबा कायम किया, जहां विकास परियोजनाओं का प्रचार प्रभावी रहा।​

महागठबंधन का बुरा हाल: आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों की करारी हार

महागठबंधन को इस चुनाव में भारी नुकसान हुआ, जहां तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) केवल 25 सीटों तक सिमट गई है। आरजेडी ने 6 सीटें जीतीं और 19 पर बढ़त बरकरार रखी, लेकिन पिछली बार की 75 सीटों से आधी से ज्यादा गंवा दीं। कांग्रेस ने महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी साबित होते हुए सिर्फ 6 सीटें हासिल कीं, जो 2020 के 19 से काफी कम है। वाम दल जैसे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन को 2 सीटें, सीपीआई (एम) को 1, जबकि इंडियन इनक्लूसिव पार्टी (आईआईपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को एक-एक बढ़त मिली।​

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने सीमांचल के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 6 सीटें जीतकर आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक को चोट पहुंचाई। लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप ने अपनी नई पार्टी जन शक्ति जनता दल के बैनर पर महुआ सीट से हार मानी, लेकिन उन्होंने बिहार के मतदाताओं को अच्छे शासन वाली सरकार चुनने के लिए बधाई दी। महागठबंधन अब कुल 33-36 सीटों पर सिमट गया है, जो बेरोजगारी, प्रवासन और युवा मुद्दों पर उनकी रणनीति के बावजूद विफल रही। विपक्ष ने चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर सवाल उठाए थे, जिसमें वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने का आरोप लगाया, लेकिन यह विवाद उनकी हार को नहीं रोक सका।​

प्राशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का पूरी तरह फेलियर

प्राशांत किशोर की नई पार्टी जन सुराज ने बिहार चुनाव में कोई सीट नहीं जीती, और ज्यादातर उम्मीदवारों को जमानत जब्त करने का सामना करना पड़ा। किशोर ने प्रचार के दौरान जेडीयू को 25 से ज्यादा सीटें न जीतने की भविष्यवाणी की थी, लेकिन जेडीयू 80 के करीब पहुंच गई, जो उनके अनुमान को पूरी तरह गलत साबित करती है। पूर्व जेडीयू उपाध्यक्ष और रणनीतिकार किशोर ने ‘बात बिहार की’ कैंपेन से लेकर कांग्रेस को पुनर्जीवित करने तक कई प्रयास किए, लेकिन बिहार की राजनीति में उनका यह सपना चूर-चूर हो गया। पार्टी ने भ्रष्टाचार और वैकल्पिक राजनीति पर फोकस किया था, लेकिन वोटरों ने स्थापित गठबंधनों को तरजीह दी।​

तेजस्वी यादव की रघोपुर में कड़ी टक्कर, अंत में जीत का स्वाद

तेजस्वी यादव ने रघोपुर विधानसभा सीट पर भाजपा के सतीश कुमार के खिलाफ कड़ा मुकाबला लड़ा, लेकिन 31वें राउंड की गिनती में 1.18 लाख वोटों के साथ 14,100 वोटों की बढ़त बरकरार रखी। सतीश कुमार के 1.04 लाख वोटों के मुकाबले यह मार्जिन आरजेडी के परिवारिक गढ़ को बचाने वाली साबित हुई। महागठबंधन की कुल हार के बावजूद यह जीत तेजस्वी के लिए व्यक्तिगत राहत है, जो बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर प्रचार कर रहे थे। रघोपुर में यादव और मुस्लिम वोटों ने निर्णायक भूमिका निभाई, लेकिन राज्य स्तर पर एनडीए की लहर ने इसे सीमित कर दिया।​

नीतीश कुमार का रिकॉर्डतोड़ पांचवां कार्यकाल? गठबंधन में तनाव की आशंका

ट्रेंड्स बने रहने पर नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड पांचवीं बार शपथ ले सकते हैं, जो कई लोगों ने चुनाव से पहले असंभव माना था। महिलाओं का रिकॉर्डतोड़ मतदान और सामाजिक कल्याण योजनाओं जैसे छात्रवृत्ति व पेंशन प्रोग्राम ने जेडीयू को मजबूत किया। हालांकि, भाजपा का श्रेष्ठ प्रदर्शन गठबंधन में ‘बड़े भाई’ की भूमिका पर बहस छेड़ सकता है, जहां भाजपा शायद मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोके।​

एनडीए कार्यकर्ता सड़कों पर पटाखे फोड़कर जश्न मना रहे हैं, जबकि जेडीयू समर्थक ‘टाइगर अभी जिंदा है’ के नारे लगाते हुए नीतीश के पोस्टर लहरा रहे हैं। चिराग पासवान ने 19 सीटों की सफलता के बाद नीतीश को सीएम बनाने का समर्थन किया और खुद डिप्टी सीएम पद की संभावना जता रहे हैं, जो मोदी लहर का श्रेय देते हैं। यह जीत गठबंधन की एकजुटता को परखेगी, खासकर सीट बंटवारे के बाद।​

‘निमो’ लहर का कमाल: मोदी-नीतीश का शक्तिशाली संयोजन

एनडीए की यह जीत ‘निमो’ लहर यानी नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के संयोजन से प्रेरित है, जो राज्य भर में फैली। नीतीश की सामाजिक कल्याण नीतियां, जैसे महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं, ने कुंजी क्षेत्रों में मदद की, जहां महिलाओं का मतदान पुरुषों से 7 पॉइंट ज्यादा रहा। पीएम मोदी ने ‘जंगल राज’ का जाप दोहराकर आरजेडी पर हमला बोला, जो 1990 के दशक के अराजकता का जिक्र करता है। सीमांचल जैसे मुस्लिम बहुल सीमावर्ती जिलों में भाजपा की ‘घुसपैठिए’ (अवैध प्रवासियों) विरोधी रणनीति ने वोटों को प्रभावित किया।​

चुनाव के प्रमुख मुद्दे बेरोजगारी, प्रवासन और विकास थे, जहां 29% वोटरों ने विकास को प्राथमिकता दी और 58% ने एनडीए को चुना। आरजेडी ने 10 लाख नौकरियों का वादा किया, लेकिन मतदाताओं ने स्थिरता और केंद्रीय सरकार की लोकप्रियता को तरजीह दी। एनडीए ने ऊपरी जातियों (63%), कुर्मी/कोएरी (52%) और अत्यंत पिछड़े वर्गों (49%) से मजबूत समर्थन हासिल किया। यह जीत बिहार की राजनीति को नई दिशा देगी, जहां गरीब, युवा, किसान और महिलाओं ने विकास और शासन को वोट दिया। विपक्ष की हार से अब उनकी रणनीति पर सवाल उठेंगे, जबकि एनडीए अगले पांच सालों के लिए मजबूत नींव रखेगा।