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बर्लिन में हजारों जर्मनों ने विरोध प्रदर्शन किया, गाजा में इजरायल-हमास युद्ध को समाप्त करने का आह्वान किया

बर्लिन, जर्मनी की राजधानी में शनिवार को दसियों हजार प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए, जो गाजा में फलस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाते हुए इजराइल-हमास युद्ध को तुरंत खत्म करने की मांग कर रहे थे। ये प्रदर्शनकारी युद्ध से तबाह हुए गाजा पट्टी में बिगड़ती मानवीय स्थिति पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे, जहां लाखों लोग भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता की कमी से जूझ रहे हैं।

प्रदर्शन की मुख्य बातें और आयोजन

पुलिस अनुमानों के अनुसार, बर्लिन के केंद्रीय इलाके में आयोजित इस मार्च में लगभग 50,000 लोग शामिल हुए, जो शहर के ऐतिहासिक स्थलों से गुजरते हुए अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। सुरक्षा व्यवस्था के लिए करीब 1,800 पुलिस अधिकारी तैनात किए गए थे, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके। प्रदर्शनकारियों ने जोरदार नारे लगाए, जैसे “फ्री, फ्री फिलिस्तीन” और “गाजा में नरसंहार बंद करो”, साथ ही जर्मनी से इजराइल को हथियार निर्यात बंद करने की मांग की। जर्मन न्यूज एजेंसी डीपीए की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने यूरोपीय संघ से इजराइल पर आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाने की भी अपील की, क्योंकि जर्मनी इजराइल का प्रमुख सैन्य साझेदार है।

जर्मनी, अमेरिका और इटली के साथ मिलकर इजराइल को सैन्य उपकरणों का बड़ा आपूर्तिकर्ता है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के आंकड़ों के अनुसार, 2019-2023 के बीच जर्मनी ने इजराइल को लगभग 30% हथियार निर्यात किए, जिसमें टैंक, सबमरीन और अन्य सैन्य सामग्री शामिल है। हालांकि, अगस्त 2024 में, जर्मन सरकार ने गाजा में इस्तेमाल होने वाले हथियारों के निर्यात पर अस्थायी रोक लगा दी थी, जो इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नई आक्रामक योजना के खिलाफ बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव का नतीजा था। इस योजना के तहत इजराइल ने गाजा में नए सैन्य अभियान शुरू किए, जिससे नागरिक मौतों में वृद्धि हुई है।

प्रदर्शन का आयोजन अलेक्जेंडरप्लात्ज से शुरू हुआ, जो बर्लिन का एक प्रमुख सार्वजनिक स्थल है, और यह मार्च टियरगार्टन जिले में स्थित विक्ट्री कॉलम तक पहुंचा। इस रूट पर प्रदर्शनकारी फिलिस्तीनी झंडे लहराते हुए और पोस्टरों के माध्यम से अपनी मांगें जता रहे थे। लगभग 50 संगठनों और एसोसिएशनों ने इस प्रदर्शन का समर्थन किया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल, राजनीतिक पार्टी डाई लिंके, और विभिन्न फलस्तीनी समर्थक ग्रुप शामिल थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐसे प्रदर्शन गाजा में मानवीय सहायता की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, क्रुजबर्ग इलाके में एक अलग प्रो-फिलिस्तीन प्रदर्शन को इजराइल-विरोधी नारों के कारण पुलिस ने रोक दिया, जो जर्मनी के सख्त कानूनों के तहत यहूदी-विरोधी गतिविधियों को प्रतिबंधित करता है।

इजराइल समर्थक प्रदर्शन और झड़पें

इसी दौरान, एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण प्रदर्शन इजराइल के समर्थन में हुआ, जिसमें करीब 100 लोग शामिल थे। ये प्रदर्शनकारी “सभी प्रकार के यहूदी-विरोध के खिलाफ” नारे लगा रहे थे, जैसा कि जर्मन पब्लिक ब्रॉडकास्टर आरबीबी ने रिपोर्ट किया। जब प्रो-फिलिस्तीन और प्रो-इजराइल समूह आमने-सामने आए, तो कुछ छिटपुट झड़पें हुईं। पुलिस रिपोर्ट्स के अनुसार, ये झड़पें मुख्य रूप से प्रदर्शनकारियों के बीच हुईं, लेकिन अधिकारियों ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया। जर्मनी में ऐसे टकराव अक्सर देखे जाते हैं, जहां देश का नाजी इतिहास यहूदी-विरोध को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतने के लिए मजबूर करता है। एंटी-डिफेमेशन लीग की रिपोर्ट्स बताती हैं कि यूरोप में फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों में कभी-कभी यहूदी-विरोधी तत्व घुस जाते हैं, जिससे तनाव बढ़ता है।

यूरोप के अन्य शहरों में समानांतर प्रदर्शन

बर्लिन के अलावा, यूरोपीय संघ के कई शहरों में इसी मुद्दे पर प्रदर्शन हुए, जो गाजा युद्ध के खिलाफ बढ़ते वैश्विक असंतोष को दर्शाते हैं। पश्चिमी जर्मनी के शहर डुसेलडॉर्फ में हजारों लोग “हम गाजा को नहीं भूलेंगे – फिलिस्तीन और सभी दबे हुए लोगों के लिए आजादी” के स्लोगन के साथ सड़कों पर उतरे। यहां प्रदर्शनकारी स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज की मांग कर रहे थे, ताकि गाजा की स्थिति को अधिक ध्यान मिले।

स्विट्जरलैंड के जेनेवा में करीब 6,000 लोगों ने गाजा युद्ध को खत्म करने की मांग के साथ मार्च निकाला, जैसा कि स्विस पब्लिक ब्रॉडकास्टर एसआरएफ ने बताया। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के नजदीक होने के कारण जेनेवा में ऐसे प्रदर्शन अक्सर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करते हैं। हाल के हफ्तों में, लंदन, पेरिस, रोम और अन्य यूरोपीय शहरों में भी समान प्रदर्शन देखे गए हैं, जहां लाखों लोग इजराइल की सैन्य कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। बीबीसी और रॉयटर्स की रिपोर्ट्स के अनुसार, इन प्रदर्शनों में युवा और छात्र समूह प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, जो सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता फैला रहे हैं।

युद्ध की पृष्ठभूमि और मानवीय प्रभाव

यह पूरा संघर्ष 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा दक्षिणी इजराइल पर किए गए हमले से शुरू हुआ, जिसमें हमास के लड़ाकों ने सीमा पार करके आक्रमण किया। इस हमले में लगभग 1,200 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर नागरिक थे, और 251 लोगों को बंधक बनाया गया। इजराइली अधिकारियों के अनुसार, गाजा में बचे 48 बंधकों में से केवल 20 के जीवित होने की संभावना है, जबकि बाकी की मौत हो चुकी है या स्थिति अज्ञात है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस हमले ने क्षेत्रीय तनाव को चरम पर पहुंचा दिया।

इजराइल की जवाबी सैन्य कार्रवाई में पिछले 23 महीनों में गाजा में 65,100 से अधिक लोग मारे गए हैं, जैसा कि गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रिपोर्ट किया। यह आंकड़ा नागरिकों और हमास लड़ाकों के बीच अंतर नहीं करता, लेकिन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (ओएचसीएचआर) के अनुमानों के अनुसार, मरने वालों में 70% से अधिक महिलाएं और बच्चे हैं। गाजा में मानवीय संकट बेहद गंभीर है, जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, स्वास्थ्य सुविधाएं 80% से अधिक क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, और लाखों लोग विस्थापित होकर शिविरों में रह रहे हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इजराइल की नाकाबंदी से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रुकी हुई है, जिससे कुपोषण और बीमारियां फैल रही हैं।

जर्मनी की भूमिका और हालिया नीतिगत बदलाव

जर्मनी ने यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में इजराइल की गाजा नाकाबंदी और सैन्य अभियान की आलोचना को रोकने में अग्रणी भूमिका निभाई है, मुख्य रूप से अपने ऐतिहासिक दायित्वों के कारण। लेकिन हाल ही में, जर्मन सरकार ने अपनी स्थिति पर पुनर्विचार किया है। अगस्त 2024 में, चांसलर ओलाफ शोल्ज ने गाजा में नागरिकों की पीड़ा पर गहरी चिंता जताई और इजराइल की नई आक्रामक योजना का विरोध किया। जर्मन विदेश मंत्रालय की आधिकारिक बयानों के अनुसार, देश अब मानवीय सहायता बढ़ाने और युद्धविराम के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में अधिक सक्रिय है।

अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे इंटरनेशनल कमिटी ऑफ द रेड क्रॉस (आईसीआरसी) ने गाजा में तत्काल सहायता की जरूरत पर जोर दिया है, और जर्मनी जैसे देशों से हथियार निर्यात पर स्थायी रोक लगाने की अपील की है। इन प्रदर्शनों से साफ है कि यूरोपीय नागरिकों में युद्ध के प्रति असंतोष बढ़ रहा है, जो राजनीतिक बदलाव ला सकता है।