अंबेडकर का दृष्टिकोण और आज का भारत: क्या हम अब भी संवैधानिक मार्ग पर हैं?
26 नवंबर को भारत में हर साल संविधान दिवस (सम्विधान दिवस / Constitution Day) मनाया जाता है। स्कूलों में प्रस्तावना (Preamble) पढ़ी जाती है। अदालतों और संसद में विशेष कार्यक्रम होते हैं। और लगभग हर जगह डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का नाम लिया जाता है, जिन्हें अक्सर भारतीय संविधान के शिल्पकार या मुख्य वास्तुकार कहा जाता है।
2015 में, जब डॉ. अंबेडकर की 125वीं जयंती मनाई जा रही थी, तब भारतीय सरकार ने 26 नवंबर को आधिकारिक रूप से संविधान दिवस घोषित किया। लेकिन इन औपचारिक कार्यक्रमों से आगे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है: “अंबेडकर का दृष्टिकोण और आज का भारत – क्या हम अभी भी संवैधानिक मार्ग पर हैं?”
इस पूरे लेख में हम आसान और सरल हिंदी में समझेंगे:
- अंबेडकर का दृष्टिकोण क्या था और उन्होंने किस तरह के भारत की कल्पना की।
- आज का भारत किस तरह उनके संवैधानिक विज़न को सम्मान देता है।
- कहाँ-कहाँ हम इस रास्ते से भटक रहे हैं।
- और हम, आम नागरिक, क्या कर सकते हैं।
भाषा को जानबूझकर सरल रखा गया है ताकि छात्र, सामान्य पाठक और सिविक्स के नए विद्यार्थी भी आराम से समझ सकें।
अंबेडकर की दृष्टि: वे किस तरह का भारत चाहते थे?
अंबेडकर चाहते थे कि भारत केवल ऐसा देश न हो जहाँ हर पाँच साल में चुनाव हो जाएं। वे एक सामाजिक लोकतंत्र (Social Democracy) चाहते थे, जो तीन मूल्यों पर टिका हो:
- स्वतंत्रता (Liberty)।
- समानता (Equality)।
- बंधुत्व / भाईचारा (Fraternity)।
संविधान सभा में अपनी अंतिम भाषण (25 नवंबर 1949) में उन्होंने इन मूल्यों को बहुत स्पष्ट शब्दों में रखा।
दमन से सामाजिक लोकतंत्र तक
अंबेडकर का जन्म 1891 में एक दलित परिवार में हुआ था। बचपन से उन्होंने अछूतपन और भेदभाव झेला – स्कूल में अलग बैठना, पानी तक अलग से पीना, सामाजिक अपमान आदि। इसलिए उनके लिए जाति-व्यवस्था कोई किताबों का विषय नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई थी।
उनके अनुसार:
- राजनीतिक लोकतंत्र = एक व्यक्ति, एक वोट।
- सामाजिक लोकतंत्र = एक व्यक्ति, एक सम्मान।
वे कहते थे कि अगर समाज में जाति-आधारित और वर्ग-आधारित असमानताएँ बनी रहें, तो केवल मतदान से लोकतंत्र टिक नहीं सकता।
एक नज़र में – अंबेडकर का “सामाजिक लोकतंत्र”
| पहलू | अंबेडकर क्या चाहते थे |
| स्वतंत्रता (Liberty) | विचार, अभिव्यक्ति, धर्म और जीवन शैली की आज़ादी |
| समानता (Equality) | खासकर जाति-आधारित ऊँच-नीच का अंत |
| बंधुत्व (Fraternity) | जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र से ऊपर उठकर भाईचारा और सम्मान |
| लोकतंत्र | केवल चुनाव नहीं, बल्कि समाज में हर व्यक्ति का बराबर मान |
| परिवर्तन का तरीका | संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके, न कि हिंसा या अंधभक्ति |
सीधी भाषा में कहें तो: अंबेडकर की नज़र में संविधान का काम सिर्फ सरकार चलाने के नियम बनाना नहीं था, बल्कि समाज की गहरी असमानताओं को तोड़ना और हर इंसान को सम्मान देना था।
संविधान एक “सामाजिक दस्तावेज़” के रूप में
भारतीय संविधान को कई विद्वान “सबसे पहले एक सामाजिक दस्तावेज़” कहते हैं। विद्वान ग्रैनविल ऑस्टिन ने लिखा कि भारत का संविधान एक सामाजिक क्रांति (social revolution) को आगे बढ़ाने का उपकरण है।
इसका मतलब:
- संविधान केवल संसद, न्यायपालिका और चुनाव की प्रक्रिया नहीं बताता।
- यह यह भी दिखाता है कि समाज को किस दिशा में बदलना है।
संविधान में छिपे प्रमुख सामाजिक लक्ष्य
| सामाजिक लक्ष्य | संविधान इन्हें कैसे समर्थन देता है |
| जातिगत ऊँच-नीच का अंत | अनुच्छेद 17 – अछूत प्रथा का उन्मूलन; जाति-आधारित भेदभाव पर रोक |
| समान दर्जा और अवसर | अनुच्छेद 14–16 – कानून के समक्ष समानता, रोजगार में समान अवसर |
| सामाजिक व आर्थिक न्याय | भाग IV – राज्य के नीति निर्देशक तत्व (Directive Principles) |
| कमजोर वर्गों की रक्षा | अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान |
| विविधता में एकता | संघीय ढाँचा, विभिन्न भाषाओं की मान्यता, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा |
यानी संविधान न्याय और समानता के पक्ष में खुलकर खड़ा होता है। यह “तटस्थ” (neutral) नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से कमज़ोर और वंचित लोगों के साथ है।
संवैधानिक नैतिकता और प्रस्तावना (Preamble)
अंबेडकर ने एक महत्वपूर्ण शब्द इस्तेमाल किया – “संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality)”। इसका सीधा अर्थ है:
- संविधान, नेताओं से ऊपर है।
- सत्ता व्यक्ति-पूजा नहीं, नियमों और संस्थाओं से चलनी चाहिए।
- बदलाव के लिए हिंसा या गैर-कानूनी रास्तों की जगह, संवैधानिक तरीके अपनाने चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर संविधान बनने के बाद भी हम केवल आंदोलन, हड़ताल, तोड़फोड़ और अराजक तरीके अपनाएँगे, तो यह “grammar of anarchy” (अराजकता का व्याकरण) होगा। भारतीय संविधान की प्रस्तावना इन मूल्यों को सरल शब्दों में सामने रखती है। यह भारत को घोषित करती है:
- संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य।
- जो अपने नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता देगा।
- और बंधुत्व को बढ़ावा देगा, ताकि व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता बनी रहे।
प्रस्तावना के मुख्य मूल्य – एक नज़र में
| प्रस्तावना का मूल्य | दैनिक जीवन में सरल अर्थ |
| न्याय (Justice) | कानून, अवसर और परिणामों में निष्पक्षता |
| स्वतंत्रता (Liberty) | विचार, बोलने, विश्वास, धर्म और जीवन शैली की उचित स्वतंत्रता |
| समानता (Equality) | किसी भी समूह को स्वाभाविक रूप से ऊँचा-नीचा न मानना |
| बंधुत्व (Fraternity) | हर समुदाय के प्रति सम्मान, भय और घृणा के बिना साथ-साथ रहना |
| लोकतांत्रिक (Democratic) | जनता द्वारा चुनी गई सरकार, जो जनता के प्रति उत्तरदायी हो |
जब हम पूछते हैं, “क्या हम संवैधानिक मार्ग पर हैं?”, तो असल में हम पूछ रहे होते हैं: “क्या हमारा समाज और राजनीति इन मूल्यों के अनुसार चल रहे हैं या नहीं?”
संविधान निर्माण में अंबेडकर की भूमिका
अंबेडकर ने केवल विचार नहीं दिए, बल्कि संविधान बनाने की प्रक्रिया के केंद्र में भी रहे।
प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष
अंबेडकर को संविधान सभा की मसौदा समिति (Drafting Committee) का अध्यक्ष बनाया गया था।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:
| पहलू | विवरण |
| पद | मसौदा समिति के अध्यक्ष |
| संविधान सभा की अवधि | लगभग 3 साल (दिसंबर 1946 – नवंबर 1949) |
| बैठकें और सत्र | 11 सत्र, सैकड़ों घंटे की बहस |
| काम का स्वरूप | प्रारूप तैयार करना, संशोधनों को देखना, संविधान सभा में मसौदे का बचाव करना |
| “architect” कहलाने का कारण | केंद्रीय भूमिका + अधिकारों, समानता और सामाजिक न्याय पर गहरा बौद्धिक योगदान |
इसी गहन और निर्णायक भूमिका के कारण उन्हें अक्सर “भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार” कहा जाता है।
वंचित वर्गों के लिए सुरक्षा और आरक्षण
अंबेडकर ने सुनिश्चित किया कि संविधान में SC, ST और अन्य वंचित वर्गों के लिए मजबूत सुरक्षा प्रावधान हों।
मुख्य उदाहरण:
- अनुच्छेद 17 – अछूत प्रथा का उन्मूलन।
- अनुच्छेद 15 – धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव की मनाही।
- अनुच्छेद 16 – सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर।
- अनुच्छेद 330–334 – लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए आरक्षित सीटें।
आज की स्थिति (हाल की आँकड़ों के अनुसार):
- लोकसभा (543 सीटें) में
- 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं।
- 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं।
- 84 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं।
- राज्य विधानसभाओं (कुल 4,120 सीटें) में
- 614 सीटें SC के लिए।
- 554 सीटें ST के लिए आरक्षित हैं।
- 614 सीटें SC के लिए।
आरक्षण की वर्तमान स्थिति – सारणी
| सदन / स्तर | कुल सीटें | SC आरक्षित सीटें | ST आरक्षित सीटें |
| लोकसभा | 543 | 84 | 47 |
| राज्य विधानसभाएँ (कुल मिलाकर) | 4,120 | 614 | 554 |
इन प्रावधानों के पीछे अंबेडकर का स्पष्ट विचार था कि सदियों के भेदभाव से पीड़ित समुदायों को केवल “बराबर अवसर” कह देने से न्याय नहीं होगा।
उन्हें ऊपर उठाने के लिए विशेष साधन भी देना ज़रूरी है।
आज का भारत: जहाँ हम अंबेडकर की दृष्टि का सम्मान करते हैं
अब देखें कि आज का भारत किस तरह अंबेडकर के संवैधानिक विज़न को आगे बढ़ा रहा है।
सार्वजनिक जीवन में संवैधानिक मूल्य
जैसा कि ऊपर बताया, 26 नवंबर – संविधान दिवस अब हर साल पूरे देश में मनाया जाता है।
संविधान दिवस के अवसर पर आम तौर पर:
- स्कूलों और कॉलेजों में प्रस्तावना का पाठ, निबंध प्रतियोगिताएँ, क्विज़, भाषण आदि।
- संसद और राज्य विधानसभाओं में विशेष चर्चा।
- न्यायपालिका, कानून विश्वविद्यालय और बार एसोसिएशन में कार्यक्रम, व्याख्यान।
- “Run for Equality” जैसे जन अभियान, रैलियाँ, सोशल मीडिया campaigns।
संविधान दिवस – एक झलक
| स्थान / संस्थान | सामान्य गतिविधियाँ |
| स्कूल व कॉलेज | प्रस्तावना पाठ, निबंध व वाद-विवाद, अंबेडकर पर व्याख्यान |
| संसद / राज्य विधानसभाएँ | संविधान निर्माण की याद, वर्तमान चुनौतियों पर चर्चा |
| अदालतें व बार | अधिकारों, क़ानून के शासन (Rule of Law) और न्याय तक पहुँच पर कार्यक्रम |
| नागरिक समाज / NGOs | जागरूकता रैलियाँ, पोस्टर अभियान, सोशल मीडिया चर्चाएँ |
इसके अलावा, अंबेडकर को सम्मान देने के लिए:
- देश भर में उनकी प्रतिमाएँ, स्मारक, पार्क, संग्रहालय।
- उनके भाषणों और लेखन का डिजिटल संकलन।
- विश्वविद्यालयों में अंबेडकर स्टडी सेंटर इत्यादि स्थापित किए गए हैं।
यह सब दिखाता है कि अंबेडकर और भारतीय लोकतंत्र आज भी आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
अधिकारों का विस्तार और प्रतिनिधित्व
भारतीय संविधान एक “जीवंत दस्तावेज़” (Living Document) है। समय के साथ-साथ अदालतें इसे नये हालात के अनुसार व्याख्यायित करती हैं।
निजता का अधिकार – पुट्टस्वामी मामला
2017 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों की पीठ ने Justice K.S. Puttaswamy (Retd.) v. Union of India मामले में फैसला दिया कि निजता (Right to Privacy), अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है।
इस निर्णय का प्रभाव:
- व्यक्ति की गरिमा (dignity) और स्वतंत्रता (liberty) को मज़बूत आधार।
- डेटा सुरक्षा, निगरानी (surveillance), आधार, लैंगिक पहचान, व्यक्तिगत जीवन आदि पर गहरा असर।
इसके अलावा कई महत्वपूर्ण फैसलों ने:
- सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया।
- महिलाओं, बच्चों और हाशिए पर खड़े समूहों के अधिकारों को मज़बूत किया।
- व्यक्तिगत पसंद (जैसे शादी, जीवन साथी, धर्म) के अधिकारों को मजबूत समर्थन दिया।
स्थानीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी
1992–93 में 73वां और 74वां संविधान संशोधन लाया गया। इसके तहत:
- ग्राम पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों (नगरपालिकाओं) में कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।
- आज देश भर में लाखों महिलाएँ सरपंच, पार्षद, ज़िला पंचायत सदस्य आदि के रूप में चुनी जाती हैं।
“जीवंत संविधान” – प्रमुख उदाहरण
| क्षेत्र | विकास / निर्णय |
| निजता (Privacy) | 2017 – पुट्टस्वामी फैसला: निजता मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता |
| स्थानीय लोकतंत्र | 73वां–74वां संशोधन: पंचायत व नगरीय निकायों में कम से कम 33% सीटें महिलाओं के लिए |
| शिक्षा व मूल्य | नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) में संवैधानिक मूल्यों – न्याय, समानता, सहानुभूति – पर जोर |
| नए सामाजिक अधिकार | LGBTQ+ अधिकार, गरिमा, स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय |
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 विशेष रूप से कहती है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि मानवीय और संवैधानिक मूल्य – जैसे समानता, न्याय, सहानुभूति, लोकतांत्रिक भावना – भी होना चाहिए। ये सब बातें दिखाती हैं कि अंबेडकर के विचार अभी भी कानून, नीति और शिक्षा को दिशा दे रहे हैं।
दरारें: जहाँ आज का भारत संवैधानिक मार्ग से भटकता दिखता है
अब हम उन क्षेत्रों को देखें, जहाँ हकीकत, अंबेडकर के सपने से टकराती है।
धर्मनिरपेक्षता (Secularism) पर बहस
संविधान की प्रस्तावना में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द 1976 में, आपातकाल के दौरान लाए गए 42वें संशोधन से जोड़े गए।
हाल के वर्षों में:
- कुछ राजनैतिक नेता इन शब्दों को प्रस्तावना से हटाने की बात करते हैं।
- जबकि कई संवैधानिक विशेषज्ञ और राजनीतिक दल इसे संविधान की बुनियादी पहचान बताते हैं।
प्रस्तावना और धर्मनिरपेक्षता – सार
| बिंदु | विवरण |
| मूल प्रस्तावना (1950) | “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द नहीं थे |
| 42वाँ संशोधन (1976) | “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द “लोकतांत्रिक गणराज्य” से पहले जोड़े गए |
| मौजूदा बहस | कुछ लोग हटाने का सुझाव; दूसरे कहते हैं कि ये मूल भावना को ही मजबूत करते हैं |
| अंबेडकर की भावना | धर्म की स्वतंत्रता के साथ-साथ, अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों की सशक्त रक्षा |
यानी भले ही “secular” शब्द बाद में जोड़ा गया, लेकिन धर्म के आधार पर भेदभाव न करने की भावना शुरुआत से ही संविधान में मौजूद है।
सार्वजनिक विमर्श में संवैधानिक मूल्यों का क्षरण
कई रिपोर्टों और विश्लेषणों में यह चिंता व्यक्त की जाती है कि हाल के वर्षों में:
- घृणास्पद भाषण (Hate Speech) और।
- साम्प्रदायिक तनाव।
- असहमत आवाज़ों पर दबाव बढ़े हैं।
इस माहौल में:
- कुछ समुदाय खुद को असुरक्षित या निशाना बना हुआ महसूस करते हैं।
- पत्रकार, कार्यकर्ता और सामान्य नागरिक भी कभी-कभी अपने विचार रखने से डरते हैं।
- मीडिया और सोशल मीडिया में बहसें अक्सर अत्यधिक ध्रुवीकृत (polarised) हो जाती हैं।
ये सब सीधे-सीधे टकराते हैं:
- स्वतंत्रता (Liberty) – विचार और अभिव्यक्ति की आज़ादी से।
- समानता (Equality) – सभी के समान सम्मान से।
- बंधुत्व (Fraternity) – समुदायों के बीच भरोसे और भाईचारे से।
संवैधानिक मूल्यों पर दबाव – त्वरित चित्र
| मुद्दा | संवैधानिक मूल्य पर प्रभाव |
| घृणा-भाषण और ऑनलाइन ट्रोलिंग | बंधुत्व को नुकसान; कुछ समुदायों और व्यक्तियों को निशाना बनाना |
| कठोर क़ानूनों का दुरुपयोग | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकारात्मक असर; लोकतांत्रिक बहस कमजोर |
| मीडिया की ध्रुवीकृत बहस | तटस्थ, तथ्य-आधारित चर्चा कम, भावनात्मक और विभाजनकारी भाषा ज्यादा |
| नेता-पूजा (Hero Worship) | अंबेडकर जिस “संवैधानिक नैतिकता” की बात करते थे, उसे चुनौती |
अंबेडकर ने साफ-साफ चेतावनी दी थी कि नेता-पूजा (hero worship) लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे संविधान और संस्थाएँ कमज़ोर होती हैं और व्यक्ति बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं।
सामाजिक न्याय और अधूरा एजेंडा
जाति-आधारित हिंसा और भेदभाव आज भी भारत की बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की “Crime in India 2022” रिपोर्ट के अनुसार:
- 2022 में अनुसूचित जातियों (SCs) के खिलाफ अपराध के 57,582 मामले दर्ज हुए।
- यह 2021 (लगभग 50,900 मामले) की तुलना में 13% से ज्यादा की वृद्धि है।
इन मामलों में प्रमुख अपराध हैं:
- साधारण मारपीट।
- धमकी (Intimidation)।
- SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध।
SC के खिलाफ अपराध – 2022 की झलक
| सूचकांक | 2022 का आँकड़ा |
| कुल दर्ज मामले (SC के खिलाफ अपराध) | 57,582 |
| 2021 की तुलना में वृद्धि | लगभग 13% |
| प्रमुख अपराध श्रेणियाँ | साधारण मारपीट, धमकी, SC/ST अत्याचार अधिनियम के तहत अपराध |
इसके साथ-साथ:
- आर्थिक असमानता ऊँची बनी हुई है।
- अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और स्थिर रोज़गार तक पहुंच में जाति और वर्ग के आधार पर बड़ा अंतर है।
यह सब दर्शाता है कि अंबेडकर का सामाजिक लोकतंत्र वाला सपना अभी भी अधूरा है।
क्या हम अभी भी अंबेडकर के संवैधानिक मार्ग पर हैं?
अब मूल सवाल पर वापस लौटते हैं। ईमानदार उत्तर शायद यह होगा: कुछ हद तक हाँ, कुछ हद तक नहीं।
जहाँ हम मार्ग पर हैं
सकारात्मक संकेत:
- भारत अब भी एक लिखित संविधान के तहत चलने वाला लोकतांत्रिक गणराज्य है।
- अदालतें लगातार संविधान की व्याख्या कर नए अधिकारों को मान्यता दे रही हैं – जैसे निजता, गरिमा, स्वायत्तता।
- SC/ST और महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि हुई है – आरक्षण और संवैधानिक संशोधनों के कारण।
- कई नागरिक, विद्यार्थी और संगठन संविधान साक्षरता (Constitution Literacy) अभियान चला रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर, केरल के कोल्लम जिले को 2023 में भारत का पहला “संविधान साक्षर जिला” घोषित किया गया।यहाँ लाखों लोगों को संविधान के मूल प्रावधानों की जानकारी दी गई – जैसे प्रस्तावना, अधिकार और कर्तव्य आदि।
सकारात्मक स्थिति – सारणी
| क्षेत्र | सकारात्मक विकास |
| क़ानून व अधिकार | निजता, गरिमा और स्वतंत्रता पर प्रगतिशील फैसले |
| राजनीतिक प्रतिनिधित्व | संसद, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में SC/ST और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि |
| जनजागरण | संविधान साक्षरता अभियान, ग्राम पंचायतों और जिलों में संविधान अध्ययन कार्यक्रम |
| शिक्षा | NEP 2020 में संवैधानिक मूल्यों, समानता, न्याय, सहानुभूति पर स्पष्ट जोर |
ये संकेत बताते हैं कि अंबेडकर की सोच पूरी तरह खत्म नहीं हुई, बल्कि कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है।
जहाँ हम भटकते दिखाई देते हैं
नकारात्मक संकेत:
- SC/ST के खिलाफ अपराध के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं।
- साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, नफरत भरा भाषण और डर का माहौल।
- प्रस्तावना में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” जैसे शब्दों पर विवाद, जो मूल्यों पर खींचतान का संकेत है।
- कई नागरिक अभी भी अपने मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों से ठीक से परिचित नहीं हैं।
भटकाव के क्षेत्र – सारणी
| मुद्दा | अंबेडकर की दृष्टि से टकराव |
| जाति-आधारित हिंसा | समानता और गरिमा के आदर्श के बिल्कुल विरुद्ध; अछूत प्रथा के खात्मे की भावना पर प्रहार |
| साम्प्रदायिक तनाव | बंधुत्व को नुकसान; समुदायों के बीच भरोसा घटता है |
| असहमति पर हमला | स्वतंत्रता और संवैधानिक नैतिकता कमजोर; लोकतांत्रिक बहस प्रभावित |
| आर्थिक व शैक्षिक असमानता | सामाजिक लोकतंत्र अधूरा; बराबरी के अवसर का सपना अधूरा |
अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि अगर हम राजनीतिक समानता (एक वोट) तो दे दें, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता को जस का तस छोड़ दें, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।
“We the People” – हमारी भूमिका
संविधान की शुरुआत तीन शब्दों से होती है – “हम, भारत के लोग (We, the People of India)”। अंबेडकर ने ज़ोर देकर कहा था कि संविधान की सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करती है कि:
- इसे लागू करने वाले लोग कितने ईमानदार और जिम्मेदार हैं।
- नागरिक अपने अधिकार और कर्तव्य कैसे निभाते हैं।
नागरिकों की भूमिका – एक नज़र में
| क्षेत्र | नागरिक क्या कर सकते हैं |
| सीखना | प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्यों को पढ़ना और समझना |
| वोट देना | सोच-समझकर वोट देना; उम्मीदवारों की संवैधानिक सोच और रिकॉर्ड पर ध्यान |
| बोलना | नफरत भरे भाषण, जातिवाद, लैंगिक और धार्मिक भेदभाव का विरोध करना |
| संगठित होना | शांतिपूर्ण और संवैधानिक आंदोलनों का हिस्सा बनना, लोक मुद्दों पर चर्चा करना |
| आचरण | रोजमर्रा के जीवन में दूसरों के साथ सम्मान और बराबरी का व्यवहार करना |
अगर “हम, भारत के लोग” ही संविधान को भूल जाएँ, तो कोई भी अदालत या क़ानून अकेले देश को संवैधानिक मार्ग पर नहीं रख सकता।
आज अंबेडकर हमें क्या करने को कहते?
हम अंबेडकर के स्थान पर बोल नहीं सकते, लेकिन उनकी बातों और लेखन से कुछ संदेश साफ दिखते हैं।
Educate, Agitate, Organise – आज के संदर्भ में
अंबेडकर का प्रसिद्ध नारा था – “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो (Educate, Agitate, Organise)”। आज के भारत के लिए इसका अर्थ हो सकता है:
- Educate (शिक्षित बनो)
- संविधान की बुनियादी बातें पढ़ें।
- अंबेडकर के भाषणों और विचारों को जानें।
- संविधान की बुनियादी बातें पढ़ें।
- Agitate (संघर्ष करो – शांतिपूर्वक)
- अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन, याचिका, RTI, जनसुनवाई आदि।
- अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन, याचिका, RTI, जनसुनवाई आदि।
- Organise (संगठित रहो)
- समुदायों में मिलकर काम करें – जागरूकता, कानूनी सहायता, सामाजिक सुधार आदि के लिए।
- समुदायों में मिलकर काम करें – जागरूकता, कानूनी सहायता, सामाजिक सुधार आदि के लिए।
आधुनिक संदर्भ में “Educate – Agitate – Organise”
| चरण | आधुनिक उदाहरण |
| Educate | ऑनलाइन कोर्स, यूट्यूब लेक्चर, संविधान पढ़ने की स्थानीय बैठकों में भाग लेना |
| Agitate | शांतिपूर्ण प्रदर्शन, हस्ताक्षर अभियान, जनहित याचिका, सूचना के अधिकार का उपयोग |
| Organise | छात्र संगठन, महिला समूह, श्रमिक संगठन, स्थानीय नागरिक मंच आदि |
केवल रस्म नहीं, रोज़ का आचरण बनें प्रस्तावना
अंबेडकर संविधान दिवस के कार्यक्रमों की सराहना कर सकते हैं, लेकिन वे निश्चित रूप से खाली दिखावे के खिलाफ होते।
वो शायद हमसे ऐसे सवाल पूछते:
- क्या हम अपने घरों में काम करने वाले व्यक्ति के साथ बराबरी का व्यवहार करते हैं?
- क्या हम अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह स्वीकार करते हैं?
- क्या हम किसी के साथ अन्याय होते देखकर चुप रहते हैं या बोलते हैं?
रोज़मर्रा में प्रस्तावना को जीने के तरीके
| प्रस्तावना मूल्य | रोज़मर्रा की क्रिया |
| न्याय | स्कूल, कार्यस्थल, पड़ोस में किसी के साथ भेदभाव हो तो विरोध करना |
| स्वतंत्रता | दूसरों के धर्म, विचार, पहनावे और जीवन शैली का सम्मान करना |
| समानता | जाति, लिंग, धर्म के आधार पर दूरी या ऊँच-नीच की सोच छोड़ना |
| बंधुत्व | अलग समुदायों के लोगों से मित्रता, संवाद, सहयोग बढ़ाना |
| लोकतांत्रिक भावना | स्थानीय बैठकों में भाग लेना, सवाल पूछना, जानकारी प्राप्त करना |
इसी तरह से अंबेडकर का संवैधानिक विज़न केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जीवन का हिस्सा बनेगा।
निष्कर्ष: क्या हम रास्ते पर हैं या भटक गए हैं?
तो, क्या आज का भारत अभी भी अंबेडकर के संवैधानिक मार्ग पर चल रहा है?
सच यह है:
- हाँ, कुछ महत्वपूर्ण बातों में –
- हमारे पास एक जीवंत संविधान है।
- अदालतें नए अधिकारों को मान्यता दे रही हैं।
- वंचित समुदायों और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है।
- लोग संविधान और अंबेडकर के बारे में ज्यादा चर्चा कर रहे हैं।
- हमारे पास एक जीवंत संविधान है।
- लेकिन, नहीं – कुछ गहरे स्तरों पर –
- जातीय और साम्प्रदायिक हिंसा अभी भी होती है।
- भेदभाव और आर्थिक असमानता बड़े पैमाने पर मौजूद हैं।
- असहमति और आलोचना को कभी-कभी देशद्रोह जैसा माना जाता है।
- जातीय और साम्प्रदायिक हिंसा अभी भी होती है।
अंबेडकर ने कभी नहीं कहा कि संविधान अपने आप सब समस्याएँ हल कर देगा। उन्होंने कहा था कि यह सब हमारी प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगा। संविधान दिवस (26 नवंबर) पर असली श्रद्धांजलि यह नहीं कि हम सिर्फ प्रस्तावना पढ़ लें या एक मूर्ति पर माला चढ़ा दें, बल्कि यह है कि हम चुपचाप यह संकल्प लें: “मैं हर दिन सोचूँगा, बोलूँगा और ऐसा व्यवहार करूँगा जो संविधान और हर व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करता हो।” अगर अधिक से अधिक नागरिक ऐसा सोचने लगें,तो हम सचमुच अंबेडकर के संवैधानिक मार्ग पर आगे बढ़ रहे होंगे।
