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स्टैनफोर्ड की टीम ने बनाया पहला एआई-डिजाइन वायरस

अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से दुनिया का पहला पूरा काम करने वाला वायरस डिज़ाइन किया है, जो एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी ई. कोलाई बैक्टीरिया को संक्रमित करके मार सकता है। यह वायरस बैक्टीरियोफेज प्रकार का है, जो बैक्टीरिया पर हमला करता है, और इसे एआई मॉडल ने जीनोम स्तर पर तैयार किया, जिसमें डीएनए के हजारों न्यूक्लियोटाइड्स शामिल हैं। पहले एआई का इस्तेमाल केवल डीएनए के छोटे टुकड़ों या अलग-अलग प्रोटीन को डिज़ाइन करने के लिए होता था, लेकिन अब पहली बार एआई ने एक पूरे वायरल जीनोम को बनाया है, जो जटिल जीन इंटरैक्शन को संभालता है और वायरस को जीवित रखने, दोहराने और संक्रमित करने की क्षमता देता है।

यह एआई-डिज़ाइन वायरस विशेष रूप से उन ड्रग-प्रतिरोधी बैक्टीरिया को निशाना बनाता है जो पारंपरिक एंटीबायोटिक्स का असर नहीं झेल पाते, जैसे कुछ ई. कोलाई स्ट्रेन। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में नए प्रकार के एंटीबायोटिक्स विकसित करने का आधार बन सकती है, खासकर फेज थेरेपी के क्षेत्र में, जहां बैक्टीरियोफेज का इस्तेमाल बैक्टीरियल संक्रमणों को लक्षित तरीके से ठीक करने के लिए किया जाता है। शोध से पता चलता है कि एआई अब जैविक प्रणालियों को इतनी गहराई से समझ सकता है कि वह नए जीन व्यवस्थाओं, छोटे जीनों और यहां तक कि दूर के रिश्तेदार वायरस से उधार लिए गए प्रोटीन को शामिल करके नवीन डिज़ाइन बना सकता है, जो मानव इंजीनियरों के लिए पहले असंभव था। उदाहरण के लिए, एक डिज़ाइन में एआई ने डीएनए पैकेजिंग प्रोटीन को एक दूर के फेज से लिया, जो पहले के मानव प्रयासों में विफल रहा था, और क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से यह साबित हुआ कि यह प्रोटीन वायरस के शेल में फिट होकर काम करता है।

एआई वायरस भी बना सकता है

नेचर मैगज़ीन के अनुसार, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कम्प्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट ब्रायन ही और उनकी टीम ने यह नतीजा 17 सितंबर को प्रीप्रिंट सर्वर बायोआरएक्सिव पर पोस्ट किया, जो अभी पीयर रिव्यू से नहीं गुजरा है। टीम ने “ईवो” नाम के एआई मॉडल का इस्तेमाल किया, जो बड़े भाषा मॉडल्स जैसे चैटजीपीटी की तरह काम करता है, लेकिन डीएनए, आरएनए और प्रोटीन सीक्वेंस पर ट्रेन किया गया है। ईवो को पहले 20 लाख से ज्यादा बैक्टीरियोफेज जीनोम पर ट्रेन किया गया था, और फिर इसे सुपरवाइज्ड लर्निंग से फाइन-ट्यून किया गया ताकि यह ई. कोलाई को संक्रमित करने वाले वायरस डिज़ाइन कर सके।

शोध की शुरुआत एक साधारण वायरस ΦX174 से हुई, जिसमें 5,386 न्यूक्लियोटाइड्स और 11 जीन हैं, जो ई. कोलाई को संक्रमित करता है। यह वायरस 1977 में पहला पूरी तरह सेक्वेंस किया गया जीनोम था और 2003 में पहला सिंथेटिक जीनोम, लेकिन अब यह एआई द्वारा डिज़ाइन किया गया पहला है। टीम ने ईवो से हजारों संभावित जीनोम जेनरेट किए, फिर कस्टम सॉफ्टवेयर से जांच करके 302 व्यवहार्य बैक्टीरियोफेज चुने, जिनमें से ज्यादातर ΦX174 से 40% से ज्यादा न्यूक्लियोटाइड आइडेंटिटी शेयर करते थे, लेकिन कुछ में पूरी तरह अलग कोडिंग सीक्वेंस थे। इन एआई-डिज़ाइन जीनोम को सिंथेसाइज करके होस्ट बैक्टीरिया में डाला गया, और फिर टेस्ट किया गया कि वे ई. कोलाई को संक्रमित और मार सकते हैं या नहीं।

परिणामों में, 302 में से 16 वायरस ने ई. कोलाई के लिए होस्ट स्पेसिफिसिटी दिखाई और बैक्टीरिया को संक्रमित करके मार दिया। ये वायरस तीन अलग-अलग ई. कोलाई स्ट्रेन पर टेस्ट किए गए, जहां वे बैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म कर देते थे, जबकि मूल ΦX174 कुछ स्ट्रेन पर असर नहीं कर पाता। इन 16 वायरस में 392 ऐसे म्यूटेशन थे जो प्रकृति में कभी नहीं देखे गए, और कुछ में नए जीन, छोटे जीन या अलग जीन व्यवस्था थी। जब बैक्टीरिया ने प्राकृतिक वायरस के खिलाफ रेजिस्टेंस विकसित की, तो एआई-डिज़ाइन वायरस ने कुछ दिनों में उस रेजिस्टेंस को तोड़ दिया, जहां पारंपरिक वायरस विफल हो जाते। कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी के पीटर कू ने अध्ययन की समीक्षा करते हुए कहा कि यह आज की एआई क्षमताओं का शानदार उदाहरण है, लेकिन मानव शोधकर्ताओं की हस्तक्षेप और फिल्टरिंग अभी भी जरूरी है ताकि डिज़ाइन सही ढंग से काम करें।

नैतिक चिंताएं और जोखिम

एआई-डिज़ाइन वायरस पर कई विशेषज्ञों ने नैतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताई हैं। जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी की सिंथेटिक बायोलॉजिस्ट केर्स्टिन गोफ्रिच ने “ड्यूल-यूज डिलेमा” का जिक्र किया, जो जीवन विज्ञान में एक पुरानी समस्या है, जहां कोई तकनीक शांतिपूर्ण (जैसे चिकित्सा) और खतरनाक (जैसे जैविक हथियार) दोनों उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल हो सकती है। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि उन्होंने जानबूझकर ऐसे वायरस पर काम किया जो केवल बैक्टीरिया को संक्रमित करता है, इंसानों को नहीं, लेकिन फिर भी यह तकनीक बायोसिक्योरिटी के बड़े सवाल उठाती है, जैसे अनजाने में हानिकारक वायरस बनने का खतरा या दुरुपयोग।

एनवाईयू लैंगोन हेल्थ के बायोलॉजिस्ट जेफ बोके ने इसे एआई-जनित जीवन रूपों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया, लेकिन चेतावनी दी कि वायरस जीवन नहीं माने जाते क्योंकि वे स्वयं दोहरा नहीं सकते, फिर भी यह पूरे जीवों को डिज़ाइन करने की शुरुआत है। शोध टीम ने जोर दिया कि वे जिम्मेदार तरीके से काम कर रहे हैं, और एआई की अप्रत्याशितता को ध्यान में रखते हुए सख्त नियंत्रण जरूरी हैं। उदाहरण के लिए, अगर यह तकनीक गलत हाथों में पड़ गई, तो यह खतरनाक पैथोजन बना सकती है, हालांकि इंसानी वायरस डिज़ाइन करना अभी बहुत जटिल है।

भविष्य की संभावनाएं

शोध टीम आशावादी है कि यह अध्ययन अधिक विविध और लक्षित एंटीबायोटिक्स बनाने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि एआई विभिन्न प्रकार के वायरस जेनरेट करके कई बीमारियों से निपटने के लिए व्यापक दवाएं विकसित करने में सहायक होगा, जैसे अस्पतालों में होने वाले संक्रमणों का इलाज या कृषि में बैक्टीरिया से होने वाले नुकसान को रोकना। यह फेज थेरेपी को मजबूत कर सकता है, जो एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी संक्रमणों का सटीक इलाज है, और एआई की तेजी से डिज़ाइन बनाने की क्षमता से इलाज विकसित करने का समय कम हो सकता है।

भविष्य में, यह तकनीक एआई को पूरे जीवों को डिज़ाइन करने की दिशा में ले जा सकती है, लेकिन इसके लिए और प्रयोगात्मक प्रगति जरूरी है। स्टैनफोर्ड के शोधकर्ता ब्रायन ही ने कहा कि यह “एआई-जनित जीवन” की ओर पहला कदम है, लेकिन सहकर्मी सैमुअल किंग ने जोड़ा कि पूरे जीव को डिज़ाइन करने के लिए अभी कई चुनौतियां बाकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जिम्मेदार उपयोग से यह स्वास्थ्य और कृषि में क्रांति ला सकता है, लेकिन नैतिक दिशानिर्देशों का पालन जरूरी है।