फ्रांस ने नए प्रधानमंत्री का स्वागत किया, ‘सब कुछ रोकें’ प्रदर्शन के साथ किया स्वागत
फ्रांस में बुधवार को नए प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नु ने पदभार संभाला, लेकिन उनका स्वागत देशभर में फैले बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों से हुआ, जहां लगभग 1,75,000 लोगों ने ‘सब कुछ रोक दो’ के नारे के साथ सड़कें, रेलवे स्टेशन और अन्य महत्वपूर्ण जगहों को जाम किया। ये प्रदर्शन बजट कटौती, बढ़ती महंगाई और आर्थिक असमानता के खिलाफ थे, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम 473 लोग गिरफ्तार हुए और कई जगहों पर हिंसक झड़पें हुईं, जैसा कि फ्रांसीसी आंतरिक मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है।
ये विरोध प्रदर्शन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे ट्विटर और फेसबुक पर तेजी से वायरल हुए, जहां विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं वाले समूहों ने एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद की। हालांकि प्रदर्शन पूरी तरह से देश को ठप करने में सफल नहीं रहे, लेकिन उन्होंने परिवहन, व्यापार और दैनिक जीवन में बड़े पैमाने पर व्यवधान पैदा किया। राष्ट्रीय पुलिस के अनुसार, सुबह से ही 80,000 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था ताकि स्थिति को नियंत्रित रखा जा सके। आंतरिक मंत्रालय की रिपोर्ट में उल्लेख है कि प्रदर्शनकारियों ने कम से कम 262 जगहों पर सड़कों पर आग लगाई, जिससे कई शहरों में यातायात पूरी तरह से प्रभावित हुआ। ये प्रदर्शन न केवल बजट कटौती के खिलाफ थे, बल्कि वे फ्रांस की केंद्र सरकार की किफायती नीतियों, बेरोजगारी और जीवनयापन की बढ़ती लागत के प्रति एक सामान्य असंतोष को दर्शाते हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में हाल के वर्षों में आर्थिक असमानता बढ़ी है, जहां अमीर और गरीब के बीच का अंतर 2024 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसने ऐसे प्रदर्शनों को और हवा दी।
प्रदर्शनों का समय, योजना और पृष्ठभूमि
ये प्रदर्शन नए प्रधानमंत्री लेकोर्नु के पदभार संभालने के पहले दिन ही आयोजित किए गए थे, लेकिन इन्हें पहले से ही तय किया गया था, जब पिछली सरकार के पतन की खबरें आ रही थीं। प्रदर्शन की योजना सोशल मीडिया पर हफ्तों पहले से बन रही थी, और यह विभिन्न यूनियनों, छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों के सहयोग से आयोजित किया गया। लेकोर्नु ने बुधवार दोपहर पेरिस के होटल माटिग्नॉन में आधिकारिक हैंडओवर समारोह में हिस्सा लिया, जो फ्रांसीसी प्रधानमंत्री का पारंपरिक निवास और कार्यालय है। इस समारोह के दौरान बाहर सड़कों पर प्रदर्शन चरम पर थे, जहां प्रदर्शनकारी सरकार की नीतियों के खिलाफ नारे लगा रहे थे।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने लेकोर्नु को अपना करीबी सहयोगी चुनकर नियुक्त किया है, जो पहले रक्षा मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं। प्रदर्शनकारी और विपक्षी नेता इस नियुक्ति को पुरानी नीतियों की निरंतरता के रूप में देखते हैं, क्योंकि लेकोर्नु मैक्रों के साथ लंबे समय से जुड़े हुए हैं और उनकी विचारधारा समान है। पिछली प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बेयरू ने मंगलवार को अपना इस्तीफा सौंपा था, जब फ्रांसीसी संसद ने उन्हें बाहर करने के लिए वोट दिया। यह राजनीतिक संकट जून 2024 में मैक्रों द्वारा नेशनल असेंबली को भंग करने और अचानक विधानसभा चुनाव कराने के फैसले से शुरू हुआ था। चुनाव के परिणामस्वरूप मैक्रों की पार्टी ‘रिनेसांस’ को बहुमत नहीं मिला, और अब सरकार को कोई भी कानून पारित करने के लिए विपक्षी दलों जैसे नेशनल रैली या लेफ्ट-विंग गठबंधनों का समर्थन चाहिए। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस राजनीतिक गतिरोध ने फ्रांस की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, जहां निवेशक अनिश्चितता के कारण सतर्क हैं और स्टॉक मार्केट में उतार-चढ़ाव देखा गया है।
यह असहमति मुख्य रूप से मैक्रों की वित्तीय सुधार योजनाओं से जुड़ी है, जिसमें सार्वजनिक खर्च में कटौती, पेंशन सुधार और कर वृद्धि शामिल हैं। ये सुधार फ्रांस के बढ़ते बजट घाटे को कम करने के लिए हैं, जो 2024 में जीडीपी का 5.5% से अधिक होने का अनुमान है। यूरोपीय संघ के नियमों के तहत, घाटे को 3% तक सीमित रखना जरूरी है, और मैक्रों की सरकार 2027 तक इस लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश कर रही है। हालांकि, इन कटौतियों ने आम लोगों में भारी असंतोष पैदा किया है, खासकर निम्न और मध्यम वर्ग में, जहां बेरोजगारी दर 7.5% के आसपास है और महंगाई 2.5% से ऊपर बनी हुई है।
लेकोर्नु का संबोधन, वादे और चुनौतियां
हैंडओवर समारोह में लेकोर्नु ने अपना भाषण काफी संक्षिप्त रखा, जिसमें उन्होंने वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता और संकट को स्वीकार किया। उन्होंने कहा, ‘वास्तविक जीवन और राजनीतिक जीवन के बीच एक बड़ा अंतर है, जो हमें विनम्रता और गंभीरता के साथ काम करने के लिए मजबूर करता है।’ लेकोर्नु ने आशावादी रुख अपनाते हुए कहा कि ‘कुछ भी असंभव नहीं है’ और सरकार को फ्रांसीसी नागरिकों की उम्मीदों तथा देश के भारी कर्ज की कठोर वास्तविकता के बीच संतुलन बनाने के लिए अधिक रचनात्मक और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने ‘केवल रूप और तरीके में नहीं, बल्कि सार में बदलाव’ का वादा किया, जिसमें नीतियों में मूलभूत परिवर्तन शामिल हैं।
लेकोर्नु की पृष्ठभूमि को देखें तो वे 38 वर्षीय राजनेता हैं, जो 2017 से मैक्रों के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होंने कृषि मंत्री और रक्षा मंत्री के रूप में काम किया है, और उनकी विशेषज्ञता रक्षा और ग्रामीण विकास में है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि उनकी नियुक्ति से कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा, क्योंकि वे मैक्रों की पुरानी टीम का हिस्सा हैं। द गार्जियन की रिपोर्ट में उल्लेख है कि लेकोर्नु को अब संसद से बजट पारित करवाने की चुनौती है, जहां विपक्षी दल जैसे जीन-ल्यूक मेलेंशॉन की लेफ्ट-विंग पार्टी या मरीन ले पेन की नेशनल रैली मजबूत स्थिति में हैं।
देशभर में प्रदर्शनों का विस्तार और प्रभाव
पेरिस के अलावा, मार्सिले, लियोन, टूलूज, बोर्डो और नांत जैसे शहरों में हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। मार्सिले में प्रदर्शनकारियों ने मुख्य बंदरगाह क्षेत्र को जाम किया, जबकि लियोन में रेलवे स्टेशन पर ट्रेन सेवाएं प्रभावित हुईं। प्रदर्शन में छात्र, शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी और ट्रेड यूनियन सदस्य शामिल थे, जो सरकार की कटौती योजनाओं से प्रभावित हो रहे हैं। ऑनलाइन अभियान ने इसे ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ नाम दिया, जो 2018 के ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन की याद दिलाता है। वह आंदोलन ईंधन कर वृद्धि के खिलाफ शुरू हुआ था लेकिन जल्दी ही मैक्रों की सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध में बदल गया, जिसमें साप्ताहिक प्रदर्शन होते थे और पुलिस से हिंसक झड़पें हुईं। उस आंदोलन ने मैक्रों की लोकप्रियता को 20% से नीचे गिरा दिया और अर्थव्यवस्था को अरबों यूरो का नुकसान पहुंचाया।
फ्रांस 24 की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा प्रदर्शन भी इसी तरह के मुद्दों से जुड़े हैं, जैसे बढ़ती ऊर्जा कीमतें, आवास संकट और स्वास्थ्य सेवाओं में कटौती। प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि सरकार न्यूनतम वेतन बढ़ाए, करों को कम करे और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को मजबूत करे। कुछ जगहों पर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन पेरिस में पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, जिससे कई लोग घायल हुए।
संभावित प्रभाव, भविष्य की दिशा और वैश्विक संदर्भ
ये प्रदर्शन फ्रांस की गहरी राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों को उजागर करते हैं, जहां मैक्रों को बिना बहुमत के शासन करना पड़ रहा है। लेकोर्नु की सरकार को अब 2025 के बजट को पारित करवाना है, जिसमें 60 अरब यूरो की कटौती प्रस्तावित है, लेकिन विपक्ष इसका विरोध कर रहा है। अगर प्रदर्शन जारी रहे, तो यह ‘येलो वेस्ट’ की तरह लंबा आंदोलन बन सकता है, जो यूरोपीय संघ स्तर पर फ्रांस की छवि को प्रभावित करेगा। सीएनएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्रांस का घाटा यूरो जोन में सबसे ऊंचा है, और अगर सुधार नहीं हुए, तो यूरोपीय आयोग दंड लगा सकता है।
वैश्विक संदर्भ में, ये प्रदर्शन यूरोप भर में बढ़ते पॉपुलिज्म और आर्थिक असंतोष को दर्शाते हैं, जहां जर्मनी और इटली जैसे देश भी समान चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। फ्रांस में अगर राजनीतिक स्थिरता नहीं आई, तो यह 2027 के राष्ट्रपति चुनावों को प्रभावित कर सकता है, जहां मैक्रों दोबारा चुनाव नहीं लड़ सकते। कुल मिलाकर, यह घटना दर्शाती है कि फ्रांस को जनता की आर्थिक चिंताओं और राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है, ताकि आगे की अस्थिरता से बचा जा सके।
