अमेरिकी वीजा शुल्क में बढ़ोतरी ने भारतीय तकनीक के सपनों को ध्वस्त किया
अमेरिकी वीजा फीस में भारी बढ़ोतरी से भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के सपने चकनाचूर हो गए हैं। इस बदलाव ने न केवल व्यक्तिगत योजनाओं को प्रभावित किया है, बल्कि पूरे भारतीय आईटी सेक्टर पर गहरा असर डाला है, जिसे हम विस्तार से समझेंगे।
एच-1बी वीजा कार्यक्रम की पृष्ठभूमि और महत्व
एच-1बी वीजा अमेरिका में विदेशी कुशल कामगारों को नौकरी करने की अनुमति देता है, खासकर टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में। यह कार्यक्रम 1990 में शुरू हुआ था और तब से भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिकी नौकरियों का मुख्य द्वार बना हुआ है। यूएस सिटीजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (यूएससीआईएस) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024 में कुल 85,000 एच-1बी वीजा जारी किए गए, जिनमें से 70 प्रतिशत से अधिक भारतीयों को मिले। यह संख्या चीन (दूसरा सबसे बड़ा लाभार्थी) से लगभग दोगुनी है। भारतीय आईटी कंपनियां जैसे टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो इन वीजा का बड़े पैमाने पर उपयोग करती हैं, जो अमेरिकी क्लाइंट्स के लिए ऑनसाइट सेवाएं प्रदान करती हैं।
हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह नीति बदलाव आया है। प्रशासन ने एच-1बी वीजा की आवेदन फीस को 2,000 डॉलर से बढ़ाकर 1,00,000 डॉलर कर दिया है, जो कंपनियों के लिए कुल लागत को 1,60,000 डॉलर तक पहुंचा देता है। इसमें वकील फीस, प्रशासनिक खर्च और अन्य शुल्क शामिल हैं। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ लेबर की रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह बढ़ोतरी “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य स्थानीय अमेरिकी कामगारों को प्राथमिकता देना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम कोरोना महामारी के बाद की आर्थिक मंदी से उबरने के प्रयासों से जुड़ा है, जहां बेरोजगारी दर को कम करने पर जोर दिया जा रहा है।
व्यक्तिगत कहानियां और भावनात्मक प्रभाव
नई दिल्ली की मेघना गुप्ता की कहानी हजारों भारतीय युवाओं की प्रतिनिधि है। 29 साल की मेघना ने आईआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री ली और टीसीएस में पांच साल से अधिक समय तक काम किया। उनका सपना था कि कंपनी उन्हें अमेरिका में ट्रांसफर करे, जहां वे सिलिकॉन वैली की हाई-टेक कंपनियों में योगदान दे सकें। लेकिन फीस बढ़ोतरी ने सब कुछ बदल दिया। “मैंने रात-दिन मेहनत की, परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए। अब सब बेकार लगता है,” मेघना ने एक इंटरव्यू में कहा।
ऐसी ही कहानियां बैंगलोर, हैदराबाद और पुणे जैसे आईटी हब्स से आ रही हैं। एक सर्वेक्षण, जो इंडियन सॉफ्टवेयर एसोसिएशन (NASSCOM) द्वारा किया गया, दर्शाता है कि 2025 में कम से कम 50,000 भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के अमेरिका जाने के प्लान प्रभावित हो सकते हैं। इनमें से कई ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों में लाखों रुपये खर्च कर पढ़ाई की थी, उम्मीद में कि एच-1बी वीजा उन्हें वहां बसने का मौका देगा।
सेक्टर-विशिष्ट प्रभाव और आर्थिक निहितार्थ
विशेषज्ञों के अनुसार, मिड-लेवल आईटी जॉब्स जैसे सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डेटा एनालिसिस और क्लाउड कंप्यूटिंग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। छोटी और मध्यम आकार की अमेरिकी कंपनियां अब विदेशी टैलेंट को स्पॉन्सर करने से कतराएंगी, क्योंकि लागत बहुत ज्यादा है। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़ी कंपनियां जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न केवल उच्च-स्तरीय स्पेशलिस्ट रोल्स के लिए वीजा का उपयोग करेंगी, जैसे एआई एक्सपर्ट या साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ।
इसके परिणामस्वरूप, कई रूटीन जॉब्स भारत में ऑफशोर हो सकते हैं। NASSCOM के अनुमान से, यह बदलाव भारत के आईटी निर्यात को 10-15 प्रतिशत बढ़ा सकता है, क्योंकि कंपनियां लागत बचाने के लिए काम भारत में शिफ्ट करेंगी। हालांकि, यह अमेरिका में रहने वाले भारतीयों के लिए चुनौती है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव ने कहा, “यह नीति अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए है, लेकिन भारतीय टैलेंट पूल के लिए यह एक बड़ा झटका है। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कई लोग घर लौटने पर मजबूर होंगे।”
छात्रों और युवा पेशेवरों पर असर
भारतीय छात्रों के लिए स्थिति और भी जटिल है। हर साल हजारों छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में एमएस या एमबीए के लिए जाते हैं, और अधिकांश ग्रेजुएशन के बाद ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) के जरिए एच-1बी वीजा पर स्विच करते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक हालिया स्टडी से पता चलता है कि 2024 में 80 प्रतिशत से अधिक भारतीय छात्रों ने अमेरिका में रहने का प्लान बनाया था, लेकिन अब फीस बढ़ोतरी से यह संख्या 50 प्रतिशत तक गिर सकती है। “अमेरिकी शिक्षा पर निवेश का रिटर्न कम हो रहा है,” श्रीवास्तव ने चेतावनी दी।
कई छात्र अब कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या जर्मनी जैसे देशों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां इमिग्रेशन नियम ज्यादा उदार हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन के डेटा के अनुसार, 2024 में अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या 2,50,000 से अधिक थी, लेकिन 2025 में इसमें 20 प्रतिशत की गिरावट की उम्मीद है।
भारत के लिए अवसर और चुनौतियां
कुछ विशेषज्ञ इसे भारत के लिए सकारात्मक मानते हैं। स्किल्ड प्रोफेशनल्स के वापस लौटने से देश की अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) अहमदाबाद की एक स्टडी बताती है कि रिटर्निंग एनआरआई (नॉन-रेजिडेंट इंडियंस) स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत कर सकते हैं, खासकर बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों में। सरकार की “मेक इन इंडिया” और “स्टार्टअप इंडिया” पहलें ऐसे टैलेंट को आकर्षित करने के लिए तैयार हैं।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। मेटा के सीनियर इंजीनियर अंश जैसे कई प्रोफेशनल्स का कहना है कि अमेरिका में इनोवेशन का स्तर भारत से कहीं ऊंचा है। “यहां हम एआई, मशीन लर्निंग और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में अग्रणी काम करते हैं। भारत में अभी इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च फंडिंग की कमी है,” अंश ने बताया। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट्स से पता चलता है कि भारत को अपनी आरएंडडी (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) निवेश को जीडीपी के 2 प्रतिशत तक बढ़ाना होगा, जो वर्तमान में 0.7 प्रतिशत है, ताकि यह अमेरिका जैसा बन सके।
भविष्य की दिशा और सलाह
अभी हजारों युवा भारतीय जैसे मेघना अनिश्चितता में फंसे हैं। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ लेबर के आंकड़े दिखाते हैं कि एच-1बी कार्यक्रम ने पिछले दशक में अमेरिकी टेक सेक्टर को 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का योगदान दिया है, लेकिन नई नीतियां लोकल हायरिंग को बढ़ावा दे रही हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि भारतीय प्रोफेशनल्स अब वैकल्पिक रास्तों पर विचार करें, जैसे कनाडा का एक्सप्रेस एंट्री सिस्टम या यूके का ग्लोबल टैलेंट वीजा। साथ ही, भारत सरकार को स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स को मजबूत करने की जरूरत है ताकि घरेलू अवसर बढ़ें।
यह नीति बदलाव न केवल व्यक्तिगत सपनों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि वैश्विक टैलेंट फ्लो को भी बदल रहा है, जो आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका संबंधों पर असर डालेगा।
