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मुझे नोबेल चाहिए! ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में कई युद्धों को रोकने का श्रेय लिया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार यह दावा किया है कि उन्होंने दुनिया भर में कई लंबे समय से चल रहे युद्धों को रोका है, और इसी वजह से वे नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए भाषण में उन्होंने फिर से भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने का श्रेय लिया, लेकिन भारत सरकार ने इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, क्योंकि दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य चैनलों से बातचीत हुई थी। ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र से 7 और युद्धों को तुरंत रोकने की मांग की, जिसमें उन्होंने खुद को शांति का दूत बताते हुए कहा कि उन्होंने पहले ही 7 युद्ध खत्म किए हैं, जिनमें से कुछ दशकों से चल रहे थे।

ट्रंप का यह दावा उनके दूसरे कार्यकाल में और मजबूत हुआ है, जहां उन्होंने विभिन्न देशों के नेताओं से नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकन भी हासिल किए हैं। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान ने उन्हें भारत के साथ संकट के दौरान “कूटनीतिक भूमिका और नेतृत्व” के लिए 2026 नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया, जबकि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने व्यक्तिगत रूप से नामांकन पत्र सौंपा। ट्रंप ने खुद कहा है कि वे इन युद्धों को रोककर हजारों लोगों की जान बचा रहे हैं, और भले ही नोबेल न मिले, लेकिन वे शांति के लिए काम करते रहेंगे। हालांकि, अमेरिका में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 76% अमेरिकी नागरिक मानते हैं कि ट्रंप नोबेल पुरस्कार के हकदार नहीं हैं, जबकि केवल 22% उनका समर्थन करते हैं, और यहां तक कि रिपब्लिकन पार्टी में भी 49% लोग सहमत नहीं हैं। भारत की ओर से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप से फोन पर बात करके स्पष्ट किया कि कश्मीर मुद्दे पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की कोई जरूरत नहीं है, और भारत ने अपने राजनीतिक और सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने के बाद ही ऑपरेशन रोका।

संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप का भाषण

संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप का भाषण

संयुक्त राष्ट्र की 80वीं महासभा का सत्र 22 सितंबर 2025 को न्यूयॉर्क में हुआ, जहां ट्रंप ने एक लंबा और विवादास्पद भाषण दिया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने 7 ऐसे युद्ध रोके हैं, जिन्हें खत्म करना लगभग असंभव माना जाता था, और इनमें से कुछ युद्ध 31 साल से चल रहे थे, जबकि एक 36 साल पुराना था। ट्रंप ने विस्तार से बताया कि इन युद्धों में हजारों लोग मारे गए हैं, और कोई भी वैश्विक नेता या संगठन इन्हें रोकने की गंभीर कोशिश नहीं कर रहा था, जबकि उन्होंने महज कुछ महीनों में इन्हें खत्म कर दिया।

ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र की कड़ी आलोचना की, कहते हुए कि यूएन ने इन युद्धों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया, सिर्फ कागजी कार्रवाई और कड़े शब्दों वाली चिट्ठियां लिखीं। उन्होंने कहा, “संयुक्त राष्ट्र का क्या फायदा है? वे बस बैठकों में समय बर्बाद करते हैं और वास्तविक कार्रवाई नहीं करते”। ट्रंप ने यूएन से इन युद्धों को रोकने की अपील की, साथ ही गाजा और यूक्रेन जैसे चल रहे संघर्षों पर भी जोर दिया, जहां उन्होंने तुरंत युद्धविराम और बंधकों की रिहाई की मांग की। भाषण में ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन को “धोखा” बताया और नाटो की फंडिंग पर भी सवाल उठाए, लेकिन मुख्य फोकस शांति समझौतों पर रहा। उन्होंने कहा कि यूएन को अधिक प्रभावी होना चाहिए, अन्यथा अमेरिका अपनी फंडिंग कम कर सकता है। इस भाषण के दौरान ट्रंप ने खुद को नोबेल पुरस्कार का दावेदार बताया, और कहा कि हर युद्ध रोकने के लिए अलग-अलग पुरस्कार मिलना चाहिए। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ट्रंप के भाषण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर ट्रंप सच में नोबेल चाहते हैं, तो उन्हें गाजा युद्ध रोकना होगा, क्योंकि अमेरिका ही इजराइल को हथियार सप्लाई करता है।

ट्रंप ने किन युद्धों को रोकने का दावा किया?

ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष के अलावा 6 अन्य युद्धों का जिक्र किया, जिन्हें उन्होंने कथित तौर पर रोका है। इनमें थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद, आर्मेनिया-अजरबैजान का नागोर्नो-काराबाख संघर्ष, कोसोवो-सर्बिया का लंबा विवाद, इजराइल-ईरान का तनाव, मिस्र-इथियोपिया का जल विवाद और रवांडा-कांगो का हिंसक संघर्ष शामिल हैं। ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने इन युद्धों को महज 7 महीनों में खत्म किया, जबकि संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन दशकों से असफल रहे।

उदाहरण के लिए, आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच 1980 के दशक से चले आ रहे विवाद में ट्रंप ने अगस्त 2025 में व्हाइट हाउस में एक बैठक आयोजित की, जहां दोनों देशों के नेताओं ने एक संयुक्त घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जो पूर्ण शांति समझौता नहीं था, लेकिन पहली बार दोनों पक्षों ने बातचीत की मेज पर बैठकर प्रगति दिखाई। इसी तरह, थाईलैंड और कंबोडिया के सीमा विवाद में ट्रंप की मध्यस्थता से एक युद्धविराम समझौता हुआ, जिसके लिए कंबोडिया ने उन्हें नोबेल के लिए नामांकित किया। ट्रंप ने कहा कि इनमें से 60% युद्ध उन्होंने व्यापारिक दबाव से रोके, जैसे कि दोनों पक्षों को व्यापारिक लाभ देने या रोकने की धमकी देकर। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ये “संघर्ष प्रबंधन” हैं, न कि पूर्ण “संघर्ष समाधान”, क्योंकि ट्रंप आर्थिक प्रोत्साहन या दंड का इस्तेमाल करके अस्थायी शांति लाते हैं। मिस्र और इथियोपिया के मामले में, ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने जल विवाद को रोका, लेकिन सीएनएन के फैक्ट-चेक के अनुसार, इन दोनों देशों के बीच ट्रंप के कार्यकाल में कोई सक्रिय युद्ध नहीं था। अफ्रीकी देशों जैसे गैबॉन, गिनी-बिसाऊ, लाइबेरिया, मॉरिटानिया और सेनेगल ने भी ट्रंप की शांति प्रयासों के लिए उनका समर्थन किया है। अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान ने भी ट्रंप को नामांकित करने पर विचार किया।

भारत-पाकिस्तान संघर्ष पर ट्रंप का बार-बार दावा

ट्रंप भारत-पाकिस्तान युद्ध को रोकने का श्रेय बार-बार लेते हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान दोनों ने इसे नकारा है। अप्रैल 2025 में कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए गए। यह संघर्ष मई 2025 तक चला, जिसमें दोनों पक्षों के दर्जनों सैनिक और नागरिक मारे गए।

ट्रंप का कहना है कि उन्होंने व्यापारिक दबाव डालकर दोनों देशों को युद्ध रोकने पर मजबूर किया, जैसे कि कहा, “अगर आप युद्ध जारी रखेंगे, तो अमेरिका के साथ व्यापार नहीं होगा, क्योंकि दोनों देश अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं”। लेकिन भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में स्पष्ट किया कि भारत ने अपने सभी राजनीतिक और सैन्य लक्ष्य पूरे होने के बाद ही ऑपरेशन रोका, और यह पाकिस्तान के डीजीएमओ की अनुरोध पर हुआ, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक दार ने भी माना कि भारत किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं स्वीकारता। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से फोन पर बात करके दोहराया कि कश्मीर द्विपक्षीय मुद्दा है, और कोई मध्यस्थता नहीं होगी। भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों ने सीधे संपर्क से युद्धविराम पर सहमति बनाई। ट्रंप के दावे के बावजूद, पाकिस्तान ने उन्हें नोबेल के लिए नामांकित किया, जो विवादास्पद है क्योंकि पाकिस्तान खुद ट्रंप की भूमिका से इनकार करता है।

नोबेल पुरस्कार की मांग क्यों?

नोबेल पुरस्कार की मांग क्यों

ट्रंप ने खुलकर कहा है कि वे नोबेल शांति पुरस्कार चाहते हैं, और उनका मानना है कि हर युद्ध रोकने के लिए अलग-अलग पुरस्कार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूक्रेन और गाजा जैसे युद्धों को रोकने की कोशिश जारी है, लेकिन वे पहले ही 7 युद्ध खत्म कर चुके हैं, जो उनके पहले कार्यकाल से शुरू हुए थे। ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने कैबिनेट मीटिंग में कहा कि ट्रंप नोबेल के हकदार हैं, क्योंकि उन्होंने सात युद्ध रोके। ट्रंप की नोबेल अभियान 2019 से चल रही है, जब उन्होंने दावा किया कि जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने उन्हें उत्तर कोरिया के साथ बातचीत के लिए नामांकित किया था।

ट्रंप को कई देशों से नामांकन मिले हैं, जैसे कंबोडिया ने थाईलैंड के साथ युद्धविराम के लिए, और पांच अफ्रीकी देशों ने वैश्विक शांति में योगदान के लिए। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की उपलब्धियां मुख्य रूप से अब्राहम समझौते जैसी हैं, जहां कई अरब देशों ने इजराइल को मान्यता दी, जो मध्य पूर्व में एक बड़ा कदम था और गाजा संघर्ष के बावजूद कायम है। हालांकि, सऊदी अरब का समझौता अभी बाकी है, जो ट्रंप के लिए चुनौती है। मैक्रों ने कहा कि नोबेल तभी संभव है, अगर ट्रंप गाजा युद्ध रोकें, जहां अमेरिका हथियार सप्लाई करता है। एक सर्वेक्षण में 54% अमेरिकियों ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के 2009 नोबेल को भी गलत बताया, जो ट्रंप को कुछ राहत दे सकता है। ट्रंप के दावों से वैश्विक शांति पर बहस छिड़ गई है, लेकिन कई देश उनकी भूमिका पर सवाल उठाते हैं, खासकर जहां पूर्ण समाधान नहीं हुआ। ट्रंप की ये कोशिशें उनके दूसरे कार्यकाल की विदेश नीति का हिस्सा हैं, जहां वे आर्थिक दबाव से शांति लाने पर जोर देते हैं।