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जापान की ‘आयरन लेडी’ और पहली महिला प्रधानमंत्री सना ताकाइची कौन हैं?

सनाे ताकाइची जापान की राजनीति के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रही हैं। वे जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं, जो विधायिका में हुए नेतृत्व चुनाव में उनकी शानदार जीत के बाद संभव हुआ है। यह जीत न केवल लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के लिए एक नई शुरुआत है, बल्कि जापानी समाज में महिलाओं के नेतृत्व को मजबूत करने का प्रतीक भी है। मंगलवार को वे सम्राट नारुहितो से औपचारिक मुलाकात करने वाली थीं, जो उनकी नियुक्ति को आधिकारिक रूप से पुष्टि देगा और उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर देगा। जापान जैसे पारंपरिक समाज में, जहां पुरुष-प्रधान राजनीति लंबे समय से हावी रही है, ताकाइची की यह उपलब्धि प्रेरणादायक है। आइए, विस्तार से जानते हैं जापान की इस नई नेता के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें, जो उनकी पृष्ठभूमि, राजनीतिक विचारधारा और आने वाली चुनौतियों को समझने में मदद करेंगी।

ताकाइची का बैकग्राउंड क्या है?

64 वर्षीय सनाे ताकाइची ने 1990 के दशक में जापानी राजनीति में प्रवेश किया, जब वे लंबे समय से सत्ता पर काबिज लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) की सदस्य बनीं। उनका जन्म जापान के मध्य भाग में स्थित नारा प्रीफेक्चर में एक साधारण परिवार में हुआ था, जो प्राचीन जापानी इतिहास और संस्कृति का केंद्र रहा है। नारा जापान की प्राचीन राजधानी के रूप में जाना जाता है, और साने ताकाइची का बचपन इसी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत से प्रभावित रहा। उन्होंने कोबे यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातक शिक्षा पूरी की, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र या संबंधित विषयों में विशेषज्ञता हासिल की, जैसा कि उनकी आधिकारिक जीवनी में वर्णित है। यह शिक्षा उन्हें आर्थिक नीतियों को समझने और लागू करने में मजबूत आधार प्रदान करती है।

एलडीपी के कई वरिष्ठ सदस्यों की तुलना में ताकाइची का पालन-पोषण अपेक्षाकृत विनम्र और सामान्य था। पार्टी के अधिकांश नेता टोक्यो यूनिवर्सिटी, क्योटो यूनिवर्सिटी या हार्वर्ड कैनेडी स्कूल जैसी विश्व-प्रसिद्ध संस्थाओं से पढ़े हुए हैं, जो एलीट वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन ताकाइची की कहानी अलग है – वे एक मध्यम वर्गीय परिवार से आती हैं, जहां कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प ने उन्हें ऊंचाइयों तक पहुंचाया। राजनीति में उनके शुरुआती वर्षों में वे स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय रहीं, जैसे नारा क्षेत्र के विकास और सांस्कृतिक संरक्षण।

ताकाइची को सबसे ज्यादा दिवंगत प्रधानमंत्री शिंजो आबे के प्रोटेग (शिष्य) के रूप में जाना जाता है। आबे, जो जापान के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री थे, ने ताकाइची को अपनी कई सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं सौंपीं। उन्होंने आबे के मंत्रिमंडलों में आर्थिक और सुरक्षा नीतियों से जुड़े विभागों में काम किया, जैसे आर्थिक सुरक्षा और विदेश मामलों में। इसके अलावा, पूर्व प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के कार्यकाल में भी वे कैबिनेट मंत्री रहीं, जहां उन्होंने जापान की आर्थिक चुनौतियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया। आबे की विरासत को आगे बढ़ाने वाली ताकाइची ने राजनीति में महिलाओं के लिए नई मिसाल कायम की है। जापान में महिलाओं का राजनीतिक नेतृत्व अभी भी दुर्लभ है – संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 10% के आसपास है, और कोई महिला पहले कभी प्रधानमंत्री नहीं बनी। ताकाइची की जीत इस बदलाव का संकेत है, जो लैंगिक समानता की दिशा में एक कदम है। उनकी यात्रा से प्रेरित होकर कई युवा महिलाएं अब राजनीति में कदम रखने की सोच रही हैं।

ताकाइची की राजनीति क्या है?

ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की बड़ी प्रशंसक सनाे ताकाइची को जापानी मीडिया में ‘आयरन लेडी’ का खिताब दिया गया है, जो उनकी सख्त और रूढ़िवादी विचारधारा को दर्शाता है। थैचर की तरह, ताकाइची आर्थिक उदारीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देती हैं, लेकिन जापानी संदर्भ में। हाल के नेतृत्व चुनाव में उन्होंने अपने गुरु शिंजो आबे की ‘अबेनॉमिक्स’ से प्रेरित आर्थिक नीतियों का पुरजोर समर्थन किया। अबेनॉमिक्स एक तीन-स्तंभ वाली रणनीति थी – वित्तीय विस्तार (जैसे सार्वजनिक खर्च बढ़ाना), मौद्रिक ढील (बैंक ऑफ जापान द्वारा ब्याज दरें कम रखना), और संरचनात्मक सुधार (श्रम बाजार और व्यापार विनियमों में बदलाव)। ताकाइची का मानना है कि यह नीति जापान की ठहरती अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर सकती है, खासकर मुद्रास्फीति और जनसंख्या संकट के दौर में। उन्होंने वादा किया है कि उनकी सरकार जापान की जीडीपी वृद्धि को 2% तक पहुंचाएगी और छोटे व्यवसायों को सहायता प्रदान करेगी।

सामाजिक मुद्दों पर ताकाइची का रुख काफी कठोर और पारंपरिक है। वे समलैंगिक विवाह का विरोध करती हैं, तर्क देते हुए कि यह जापान की पारंपरिक परिवार संरचना को प्रभावित कर सकता है। आप्रवासन पर उनकी नीति सख्त है – वे अवैध प्रवास को रोकने और केवल कुशल श्रमिकों को सीमित वीजा देने के पक्ष में हैं, क्योंकि जापान की उम्रदराज आबादी के कारण श्रमिकों की कमी है, लेकिन वे सांस्कृतिक एकरूपता को बनाए रखना चाहती हैं। सम्राट की उत्तराधिकार प्रथा पर भी वे पुरुष-प्रधान परंपरा को जारी रखने की समर्थक हैं, जो जापान की राजशाही को प्राचीन रखने का प्रयास है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों में ताकाइची को ‘चीन हॉक’ कहा जाता है, अर्थात चीन के प्रति सतर्क और आक्रामक रवैया रखने वाली। वे जापान की सेना (जापान सेल्फ-डिफेंस फोर्सेज) को मजबूत बनाने की पक्षधर हैं, जिसमें रक्षा बजट को जीडीपी के 2% तक बढ़ाने का प्रस्ताव शामिल है। ताइवान जलडमरूमध्य में यथास्थिति बनाए रखने के लिए वे अमेरिका के साथ घनिष्ठ गठबंधन का समर्थन करती हैं। एलडीपी सदस्य के रूप में उन्होंने कई बार ताइपे (ताइवान की राजधानी) जाकर राजनीतिक दलों से मुलाकात की, जो चीन के लिए उकसावे जैसा है। ये यात्राएं जापान-चीन संबंधों में तनाव पैदा करती रही हैं, लेकिन ताकाइची का कहना है कि यह जापान की संप्रभुता की रक्षा के लिए जरूरी है।

अन्य विवादास्पद मुद्दों में यासुकुनी मंदिर के उनके दर्शन प्रमुख हैं। यह मंदिर टोक्यो में स्थित है और जापान के युद्ध मृतकों को समर्पित है, लेकिन इसमें द्वितीय विश्व युद्ध के 14 क्लास-ए युद्ध अपराधियों को भी शामिल किया गया है। चीन, दक्षिण कोरिया और अन्य एशियाई देश इसे जापान के सैन्यवादी अतीत की याद दिलाने वाला मानते हैं। ताकाइची के इन दौरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना खड़ी की, लेकिन वे इसे राष्ट्रीय गौरव और पूर्वजों को श्रद्धांजलि के रूप में देखती हैं। उनकी ये यात्राएं आबे की नीतियों से प्रेरित हैं, जो जापान को अधिक आक्रामक विदेश नीति की ओर ले जाती हैं। कुल मिलाकर, ताकाइची की राजनीति जापान को एक मजबूत, आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने पर केंद्रित है, लेकिन यह एशियाई पड़ोसियों के साथ संबंधों को जटिल बना सकती है।

ताकाइची की जीत का जापान के लिए क्या मतलब है?

विशेषज्ञों के अनुसार, सनाे ताकाइची की जीत से जापान में रूढ़िवादी शासन की निरंतरता बनी रहेगी, लेकिन दक्षिणपंथी झुकाव के साथ एक स्पष्ट बदलाव आएगा। यह बदलाव जापान की आंतरिक और बाहरी नीतियों को प्रभावित करेगा। जापान की कंजर्वेटिव राजनीति पश्चिमी देशों, जैसे अमेरिका या ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी से काफी अलग है। जापान की इंटरनेशनल क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के प्रोफेसर स्टीफन नागी इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जापान में कंजर्वेटिव होना सुरक्षा पर मजबूत रुख अपनाने, चीन के प्रति सतर्कता बरतने, अमेरिका-जापान संबंधों को और मजबूत करने तथा सम्राट व्यवस्था की रक्षा करने का प्रतीक है।

नागी ने चुनाव से पहले अल जजीरा को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में कहा, “जापान में कंजर्वेटिव का मतलब एक हस्तक्षेपवादी सरकार है, जो काफी सामाजिक कल्याण कार्यक्रम चलाती है। यह उदारवादियों की तरह बाजार को पूरी तरह खुला नहीं छोड़ती, बल्कि राज्य की भूमिका को महत्व देती है।” ताकाइची जापान की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाएंगी, जैसे कि मिसाइल रक्षा प्रणाली को अपग्रेड करना और संयुक्त सैन्य अभ्यासों को बढ़ावा देना। आप्रवासन को वे सीमित रखेंगी, लेकिन श्रमिक कमी को पूरा करने के लिए चुनिंदा विदेशी श्रमिकों को आमंत्रित करेंगी। हालांकि, सामाजिक कल्याण प्रणाली में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा – जापान का स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और बेरोजगारी लाभ प्रणाली मजबूत बनी रहेगी। यह जापानी कंजर्वेटिव की अनूठी परिभाषा है: सुरक्षा और परंपराओं पर जोर, लेकिन कल्याणकारी राज्य को बनाए रखना।

इस जीत से जापान की विदेश नीति में निरंतरता आएगी, खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में। ताकाइची क्वाड (जापान, अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया) और AUKUS जैसे गठबंधनों को मजबूत करेंगी, जो चीन के विस्तारवाद का मुकाबला करने के लिए हैं। घरेलू स्तर पर, उनकी सरकार आर्थिक असमानता को कम करने और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने पर ध्यान देगी। लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि दक्षिणपंथी झुकाव से पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ सकता है, जो जापान की वैश्विक छवि को प्रभावित करेगा। कुल मिलाकर, ताकाइची का नेतृत्व जापान को एक अधिक आत्मविश्वासी राष्ट्र की ओर ले जाएगा, लेकिन संतुलित कूटनीति की जरूरत होगी।

ताकाइची के लिए आगे क्या है?

सनाे ताकाइची का रास्ता सत्ता तक पहुंचने के लिए आसान बिल्कुल नहीं था, और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कई अनिश्चितताएं बाकी हैं। वे पांच सालों में जापान की चौथी प्रधानमंत्री बनेंगी, जो राजनीतिक अस्थिरता को दर्शाता है। वे एक अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति से सत्ता संभालेंगी, क्योंकि एलडीपी युद्धोत्तर जापान की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही है, लेकिन पिछले दो सालों में पार्टी ने विधायिका के दोनों सदनों – हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और हाउस ऑफ काउंसिलर्स – में बहुमत खो दिया। इसका कारण 2023-2024 के दौरान हुए भ्रष्टाचार कांड थे, जिसमें एलडीपी नेताओं पर गुप्त चुनावी फंडिंग के आरोप लगे।

अक्टूबर में ताकाइची के एलडीपी नेता चुने जाने के तुरंत बाद, पार्टी का दक्षिणपंथी सांसेतो पार्टी (जापानिश इनोवेटिव पार्टी का एक धड़ा) के साथ लंबे समय का गठबंधन टूट गया। टूटने का मुख्य कारण चुनावी दान के पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी उपायों पर गंभीर मतभेद थे। सांसेतो पार्टी ने एलडीपी पर अनियमितताओं का आरोप लगाया, जिससे गठबंधन ध्वस्त हो गया। लेकिन ताकाइची ने जल्दी ही जापान इनोवेशन पार्टी (JIP) के साथ नया गठबंधन गढ़ा, जो एक अन्य कंजर्वेटिव पार्टी है और आर्थिक सुधारों पर जोर देती है। इस गठबंधन से विधायिका में पर्याप्त सीटें हासिल हुईं, जिससे ताकाइची की इस हफ्ते की जीत संभव हो सकी। JIP के साथ साझेदारी से एलडीपी को 250 से अधिक सीटें मिलीं, जो बहुमत के करीब है।

लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में ताकाइची को कई जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। सबसे पहले, जापान का जीवनयापन संकट – मुद्रास्फीति दर 3% से ऊपर है, येन की कमजोरी से आयात महंगे हो गए हैं, और ऊर्जा तथा खाद्य कीमतें आसमान छू रही हैं। दूसरा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार युद्ध के प्रभाव – ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से जापान को ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात पर टैरिफ का खतरा है, जो जापान की अर्थव्यवस्था को 1-2% नुकसान पहुंचा सकता है। तीसरा, लंबे समय की सुरक्षा चिंताएं – चीन की सैन्य गतिविधियां दक्षिण चीन सागर में और उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण जापान के लिए सीधा खतरा हैं। ताकाइची को इनके लिए क्वाड और QUAD प्लस जैसे मंचों पर सक्रियता बढ़ानी होगी। इसके अलावा, एलडीपी अभी भी 2024 के बड़े भ्रष्टाचार कांड से उबर रही है, जिसमें सैकड़ों मिलियन येन के अवैध फंड शामिल थे। पार्टी को विश्वास बहाल करने के लिए ताकाइची को पारदर्शिता कानूनों को मजबूत करना होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के लिए ताकाइची को अपनी कुछ सख्त किनारों को नरम करना पड़ेगा। उदाहरण के लिए, आप्रवासन नीति पर थोड़ी लचीलापन दिखाना या यासुकुनी दौरे कम करना पड़ सकता है, वरना विपक्षी दल जैसे कांस्टीट्यूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी से अविश्वास प्रस्ताव का सामना हो सकता है। उनकी नेतृत्व शैली जापान की आर्थिक वृद्धि को गति देने, तकनीकी क्षेत्र में निवेश बढ़ाने (जैसे AI और सेमीकंडक्टर) और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों को मजबूत करने पर केंद्रित रहेगी। लेकिन घरेलू राजनीति में संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी – जनता की अपेक्षाएं ऊंची हैं, और अगले आम चुनाव 2026 में हैं। यदि वे सफल रहीं, तो ताकाइची न केवल जापान की पहली महिला पीएम के रूप में याद की जाएंगी, बल्कि एक मजबूत नेता के रूप में भी।

यह जानकारी अल जज़ीरा और बी. बी. सी. से एकत्र की गई है।