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पूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण की 115वीं जयंती आज मनाई गई

आज भारत के आठवें राष्ट्रपति और प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी रामास्वामी वेंकटरमन की 115वीं जन्म जयंती पर पूरे देश में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने उन्हें एक ईमानदार संवैधानिक संरक्षक, दूरदर्शी राजनेता और सरल स्वभाव वाले लोकसेवक के रूप में याद किया, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सर्वोच्च संवैधानिक पद तक देश की निष्ठापूर्वक सेवा की।​

जन्म, बचपन और स्वतंत्रता संग्राम

रामास्वामी वेंकटरमन का जन्म 4 दिसंबर 1910 को तमिलनाडु के तंजावुर ज़िले के पट्टुक्कोट्टई के पास एक साधारण परिवार में हुआ, जहां से उनका जीवन राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा तक पहुंचा। कानून की पढ़ाई के दौरान ही वे महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए, जिसके कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर जेल भेजा। इस दौर ने उन्हें एक प्रतिबद्ध स्वतंत्रता सेनानी और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रबल समर्थक के रूप में गढ़ा, जो आगे चलकर उनके पूरे सार्वजनिक जीवन का आधार बना।​

विधि, संसदीय और नीतिगत भूमिका

स्वतंत्रता के बाद वेंकटरमन ने एक जाने-माने अधिवक्ता के रूप में ख्याति पाई और वे उस संविधान सभा के सदस्य रहे, जिसने स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार किया। बाद में वे अस्थायी संसद और फिर लोकसभा के सदस्य बने, जहां उन्होंने श्रम, उद्योग, वित्त और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़ी नीतियों को आकार देने में अहम भूमिका निभाई। श्रम एवं उद्योग मंत्री के रूप में उन्होंने औद्योगिक विकास और श्रमिकों के अधिकारों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की, जबकि वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने चुनौतीपूर्ण आर्थिक परिस्थितियों में मितव्ययी और जिम्मेदार नीतियों पर ज़ोर दिया।​

रक्षा मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण योगदान

रक्षा मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण योगदान

1980 के दशक की शुरुआत में रक्षा मंत्री के रूप में वेंकटरमन ने भारत की सामरिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मज़बूत करने पर विशेष ध्यान दिया। उनके कार्यकाल में स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम को प्रोत्साहन मिला, जिसने आगे चलकर पृथ्वी, अग्नि और आकाश जैसे प्रमुख मिसाइल प्रणालियों की नींव रखी और भारत की रक्षा क्षमता को दीर्घकालिक रूप से सुदृढ़ किया। इस भूमिका में उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय, सशस्त्र बलों और नीति–निर्माताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर देश की सुरक्षा रणनीति को नई दिशा देने का काम किया।​

उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल

वेंकटरमन 1984 से 1987 तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे और राज्यसभा के सभापति के रूप में उन्होंने सदन की मर्यादा, सुव्यवस्थित चर्चा और संसदीय परंपराओं के पालन पर ज़ोर दिया। 1987 में वे देश के आठवें राष्ट्रपति बने और 1992 तक के अपने कार्यकाल में उन्होंने संवैधानिक सीमाओं, संतुलन और निष्पक्षता का उदाहरण प्रस्तुत किया, खासकर उस दौर में जब केंद्र की राजनीति गठबंधन, अस्थिरता और बार-बार बदलते समीकरणों से घिरी हुई थी। कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी उन्होंने राष्ट्रपति पद की नैतिक और संवैधानिक गरिमा बनाए रखी, जिससे उन्हें एक शांत, संयमित और नियम–पुस्तिका पर चलने वाले राष्ट्रपति के रूप में व्यापक सराहना मिली।​

विरासत, आदर्श और आज की प्रासंगिकता

उनकी 115वीं जयंती पर दिए गए संदेशों और श्रद्धांजलियों में नेताओं ने उन्हें एक ऐसे जननायक के रूप में याद किया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम, संविधान निर्माण, विधिक सेवाओं, आर्थिक नीतियों, रक्षा सुदृढ़ीकरण और संवैधानिक पदों—इन सभी क्षेत्रों में अखंड ईमानदारी के साथ काम किया। कई गणमान्य व्यक्तियों ने यह रेखांकित किया कि वेंकटरमन का जीवन दिखाता है कि सत्ता का सर्वोच्च पद भी विनम्रता, अनुशासन और संविधान के प्रति निष्ठा के साथ निभाया जा सकता है, और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत के रूप में आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनती है। भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों की मजबूती, शांतिपूर्ण सत्ता–हस्तांतरण और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर आज जो ज़ोर दिया जाता है, उसकी बुनियाद रखने वालों में वेंकटरमन का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।