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फिलिस्तीन को मान्यता देने में ब्रिटेन के साथ शामिल हुए कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, पुर्तगाल

कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल ने ब्रिटेन के साथ मिलकर फिलिस्तीनी राज्य को आधिकारिक रूप से मान्यता दे दी है, जो मध्य पूर्व में लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह फैसला इजराइल के वेस्ट बैंक में बस्तियां बढ़ाने की योजनाओं और गाजा में जारी युद्ध के बीच आया है, जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इजराइल की बढ़ती अलगाव को दर्शाता है।

यह मान्यता दो-राज्य समाधान को मजबूत करने का प्रयास है, जिसमें फिलिस्तीन और इजराइल दोनों स्वतंत्र रूप से शांतिपूर्ण तरीके से रह सकें। बीबीसी और अल जजीरा जैसी विश्वसनीय स्रोतों की रिपोर्टों के अनुसार, इस कदम से फिलिस्तीनी प्राधिकरण को राजनीतिक मजबूती मिलेगी, जबकि हमास जैसे चरमपंथी समूहों को अलग-थलग करने में मदद होगी। संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि अब तक 193 सदस्य देशों में से 147 ने फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता दी है, जो दशकों से चले आ रहे फिलिस्तीनी संघर्ष के प्रति वैश्विक समर्थन की बढ़ती लहर को दिखाता है। ऐतिहासिक रूप से, 1988 में फिलिस्तीनी राष्ट्रीय परिषद द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा के बाद से कई देशों ने मान्यता दी है, लेकिन पश्चिमी शक्तियों का हालिया समर्थन इसे नया आयाम देता है।

कनाडा की घोषणा और उसकी पृष्ठभूमि

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने रविवार को एक विस्तृत बयान जारी कर फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता की घोषणा की। उन्होंने कहा कि कनाडा फिलिस्तीन और इजराइल दोनों के लिए एक शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य बनाने में साझेदारी करेगा, जिसमें दोनों पक्षों के अधिकारों का सम्मान हो। कार्नी ने इजराइली सरकार की नीतियों पर कड़ी आलोचना की, आरोप लगाते हुए कि वह फिलिस्तीनी राज्य की किसी भी संभावना को व्यवस्थित रूप से रोकने का प्रयास कर रही है, जैसे कि वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियों का विस्तार।

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मान्यता फिलिस्तीनी प्राधिकरण के नेतृत्व में उन ताकतों को सशक्त बनाती है जो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की तलाश में हैं, और यह हमास के आतंकवाद को किसी भी रूप में वैध नहीं ठहराती या इनाम नहीं देती। कनाडा को फिलिस्तीनी प्राधिकरण से कई ठोस वादे मिले हैं, जिनमें सुशासन में सुधार, अगले साल आम चुनाव कराना (जिसमें हमास की कोई भूमिका नहीं होगी), और फिलिस्तीनी राज्य को पूरी तरह से गैर-सैन्य बनाना शामिल है। गार्जियन की रिपोर्टों के मुताबिक, कनाडा की यह नीति उसकी लंबे समय से चली आ रही मध्य पूर्व रणनीति का हिस्सा है, जो 1970 के दशक से शांति प्रक्रिया को समर्थन देती रही है। इसके अलावा, कनाडाई सरकार ने फिलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवीय सहायता बढ़ाने की भी योजना बनाई है, जो गाजा में जारी संकट को देखते हुए महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों से पता चलता है कि गाजा में स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से चरमरा गई है, और ऐसी मान्यताएं अंतरराष्ट्रीय सहायता को बढ़ावा दे सकती हैं।

ऑस्ट्रेलिया का फैसला और अंतरराष्ट्रीय समन्वय

ऑस्ट्रेलिया ने भी रविवार को ही फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता की घोषणा की, जो कनाडा और ब्रिटेन के कदमों के साथ समन्वित लगती है। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने विदेश मंत्री पेनी वोंग के साथ जारी संयुक्त बयान में कहा कि यह निर्णय दो-राज्य समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का हिस्सा है, जो दशकों से रुकी हुई शांति प्रक्रिया को फिर से गति देगा।

बयान में विशेष रूप से गाजा में तत्काल युद्धविराम और वहां रखे गए बंधकों की रिहाई पर जोर दिया गया है, जो शांति की दिशा में पहला कदम होगा। हालांकि, इसमें साफ-साफ कहा गया कि फिलिस्तीन के भविष्य में हमास या किसी आतंकवादी समूह की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। रॉयटर्स की विस्तृत रिपोर्टों के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया ने पहले भी संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीनी अधिकारों के पक्ष में वोट किया है, और यह मान्यता इजराइल के गाजा अभियान के खिलाफ बढ़ते वैश्विक विरोध का प्रतिबिंब है। गाजा में इजराइली हमलों से अब तक 65,200 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत हो चुकी है, और हजारों घायल हैं, जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्टों में दर्ज है। ऑस्ट्रेलिया ने अपनी घोषणा में यह भी उल्लेख किया कि वह फिलिस्तीनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए विकास परियोजनाओं में निवेश करेगा, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है।

पुर्तगाल की पुष्टि और यूरोपीय संदर्भ

पुर्तगाल के विदेश मंत्री पाउलो रंगेल ने रविवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता की पुष्टि की। उन्होंने इसे पुर्तगाली विदेश नीति की एक बुनियादी, स्थिर और आवश्यक रेखा बताया, जो देश की ऐतिहासिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

रंगेल के बयान से स्पष्ट होता है कि पुर्तगाल लंबे समय से फिलिस्तीनी स्वतंत्रता का समर्थक रहा है, और यह कदम यूरोपीय संघ (ईयू) के भीतर बढ़ते समर्थन का हिस्सा है। ईयू की आधिकारिक रिपोर्टों और यूरोपीय संसद के रिजॉल्यूशन के आधार पर, पुर्तगाल जैसे देश मध्य पूर्व में शांति के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, खासकर 2023 के बाद से गाजा संकट के बढ़ने के बाद। पुर्तगाल ने पहले भी संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता देने के प्रस्ताव का समर्थन किया है, और यह मान्यता उस दिशा में एक और कदम है। इसके अलावा, पुर्तगाली सरकार ने फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए सहायता कार्यक्रमों को बढ़ाने की योजना बनाई है, जो UNRWA जैसी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करेगी।

ब्रिटेन की भूमिका और समग्र समन्वय

ये सभी घोषणाएं ब्रिटेन के साथ निकट समन्वय में की गई लगती हैं, जहां प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की घोषणाओं के तुरंत बाद फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता की पुष्टि की। स्टार्मर ने अपने बयान में कहा कि यह कदम फिलिस्तीनियों और इजराइलियों दोनों के लिए शांति की उम्मीद को पुनर्जीवित करेगा और दो-राज्य समाधान को व्यावहारिक बनाएगा।

सीएनएन और न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्टों से पता चलता है कि ये पश्चिमी देश, जो पारंपरिक रूप से इजराइल के सहयोगी रहे हैं, अब गाजा युद्ध की वजह से इजराइल से दूरी बना रहे हैं। युद्ध में इजराइल ने गाजा पर बड़े पैमाने पर बमबारी की है, जिससे 65,200 से अधिक मौतें हुई हैं और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं, जैसा कि मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टों में वर्णित है। ब्रिटेन ने अपनी घोषणा में फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने का भी जिक्र किया है, जो क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए महत्वपूर्ण है।

इजराइल और अमेरिका की प्रतिक्रियाएं तथा वैश्विक प्रभाव

इजराइल और अमेरिका ने इन मान्यताओं को हमास के लिए “इनाम” करार दिया है। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह हमास को पुरस्कार है और फिलिस्तीनी राज्य “कभी नहीं बनेगा”। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अगले हफ्ते फ्रांस, स्पेन और अन्य देश भी फिलिस्तीन को मान्यता देने की योजना बना रहे हैं, जो वैश्विक दबाव को बढ़ाएगा।

हालांकि, यह मान्यता मुख्य रूप से प्रतीकात्मक है और इजराइल के कब्जे वाले क्षेत्रों पर इसका तत्काल प्रभाव सीमित है। फिर भी, यह फिलिस्तीन के लिए बढ़ते अंतरराष्ट्रीय समर्थन को उजागर करता है। यूएन के आंकड़ों के मुताबिक, फिलिस्तीन को यूएन में पूर्ण सदस्यता के लिए सुरक्षा परिषद की मंजूरी जरूरी है, जहां अमेरिका का वीटो अधिकार है, जो अभी तक मान्यता के खिलाफ है। अमेरिका ने कहा है कि मान्यता वार्ता के माध्यम से होनी चाहिए, न कि एकतरफा।

पश्चिमी देशों में फिलिस्तीनी समर्थन के लिए घरेलू दबाव तेज हो रहा है, जैसे कि अमेरिका में प्रदर्शन और यूरोप में राजनीतिक अभियान। कई देशों ने इजराइल पर प्रतिबंध लगाए हैं या लगाने की धमकी दी है, उदाहरण के लिए, अवैध बस्तियों से जुड़े उत्पादों पर। हाल ही में नीदरलैंड्स, स्पेन, आयरलैंड और अन्य ने 2026 के यूरोपीय सॉन्ग कंटेस्ट का बहिष्कार करने का ऐलान किया है अगर इजराइल को शामिल किया गया।

नेतन्याहू ने खुद स्वीकार किया कि इजराइल “एक तरह की अलगाव” में है और अपनी अर्थव्यवस्था को इसके अनुरूप ढालना होगा। विश्व बैंक की रिपोर्टों से पता चलता है कि गाजा युद्ध ने इजराइली अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, जिसमें निर्यात में कमी और पर्यटन उद्योग का नुकसान शामिल है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय अदालतों जैसे आईसीजे में इजराइल के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं, जो नरसंहार के आरोपों पर आधारित हैं। यह सब मध्य पूर्व में शांति की दिशा में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है, जहां फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता वैश्विक न्याय की मांग को मजबूत कर रही है।