पुरानी टैक्स व्यवस्था बनाम नई टैक्स व्यवस्था: कौन सी आपके ज़्यादा पैसे बचाती है?
बजट 2026 के अपडेट्स के बाद, वेतनभोगी और सामान्य करदाताओं के मन में एक ही सवाल सबसे बड़ा है: पुरानी कर व्यवस्था (Old Tax Regime) बनाम नई कर व्यवस्था (New Tax Regime) में से किसे चुना जाए? सरकार ने नई व्यवस्था को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए इसमें कई बड़े बदलाव किए हैं।
टैक्स प्लानिंग केवल फॉर्म भरने के बारे में नहीं है; यह आपकी मेहनत की कमाई को बचाने का सबसे वैध तरीका है। चाहे आप एक अनुभवी निवेशक हों या अपनी पहली नौकरी शुरू कर रहे हों, सही कर व्यवस्था का चुनाव आपके बैंक बैलेंस में हजारों, और कभी-कभी लाखों रुपये का अंतर पैदा कर सकता है। इस लेख में, हम आपको एक विस्तृत और आसान तुलना देंगे ताकि आप यह तय कर सकें कि आपके वित्तीय लक्ष्यों के लिए कौन सा रास्ता सही है।
पुरानी कर व्यवस्था बनाम नई कर व्यवस्था: यह विषय क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की कर प्रणाली पिछले कुछ वर्षों में काफी बदल गई है। पहले जहां केवल एक ही तरीका था—’निवेश करो और टैक्स बचाओ’—अब सरकार आपको बिना निवेश के भी ‘कम टैक्स दर’ का विकल्प दे रही है।
यह बहस इसलिए मायने रखती है क्योंकि ‘नई कर व्यवस्था’ अब डिफ़ॉल्ट (Default) विकल्प बन गया है। इसका मतलब है कि अगर आप वित्त वर्ष की शुरुआत में अपने नियोक्ता (Employer) को अपनी पसंद नहीं बताते हैं, तो आपका टैक्स अपने आप नई व्यवस्था के हिसाब से काट लिया जाएगा।
अगर आपके पास होम लोन है, आप किराए के घर में रहते हैं (मकान किराया भत्ता लेते हैं), या आपने जीवन बीमा (LIC) और पीपीएफ (PPF) में भारी निवेश किया हुआ है, तो बिना सोचे-समझे नई व्यवस्था में जाना आपको महंगा पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर, अगर आप निवेश के कागजी पचड़ों से बचना चाहते हैं, तो नई व्यवस्था आपके लिए वरदान साबित हो सकती है। आइए, इन दोनों के बीच के अंतर को गहराई से समझते हैं।
7 मुख्य कारक: पुरानी और नई कर व्यवस्था की तुलना
सही निर्णय लेने के लिए, आपको इन दोनों व्यवस्थाओं को अलग-अलग पैमानों पर तौलना होगा। नीचे 7 सबसे महत्वपूर्ण कारक दिए गए हैं जो आपको यह समझने में मदद करेंगे कि आपके लिए क्या बेहतर है।
1. टैक्स स्लैब और दरें
सबसे बुनियादी अंतर टैक्स की दरों में है। नई व्यवस्था में कर की दरें कम हैं और स्लैब (आय के स्तर) ज्यादा हैं, जबकि पुरानी व्यवस्था में दरें ऊंची हैं लेकिन स्लैब सरल हैं। वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 के लिए, नई कर व्यवस्था के तहत स्लैब को मध्यम वर्ग को राहत देने के लिए संशोधित किया गया है।
महत्वपूर्ण अंतर:
नई व्यवस्था में आय के कई टुकड़े किए गए हैं और हर टुकड़े पर धीरे-धीरे टैक्स बढ़ता है। पुरानी व्यवस्था में 10 लाख रुपये से ऊपर की आय पर सीधा 30% टैक्स लगता है, जो बहुत ज्यादा महसूस हो सकता है।
| आय स्लैब | नई कर व्यवस्था (संशोधित दरें) | पुरानी कर व्यवस्था (दरें) |
| ₹0 – ₹3 लाख | शून्य | शून्य (₹2.5 लाख तक) |
| ₹3 लाख – ₹7 लाख | 5% | 5% (₹2.5 – ₹5 लाख) |
| ₹7 लाख – ₹10 लाख | 10% | 20% (₹5 – ₹10 लाख) |
| ₹10 लाख – ₹12 लाख | 15% | 20% |
| ₹12 लाख – ₹15 लाख | 20% | 30% (₹10 लाख से ऊपर) |
| ₹15 लाख से ऊपर | 30% तक | 30% |
2. छूट और कटौती (Exemptions & Deductions)
यह इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच का सबसे बड़ा अंतर है। पुरानी व्यवस्था ‘छूट’ के दम पर जीवित है, जबकि नई व्यवस्था ने इनका त्याग कर दिया है।
अगर आप पुरानी कर व्यवस्था चुनते हैं, तो आप लगभग 70 तरह की छूटों का दावा कर सकते हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय धारा 80C (भविष्य निधि, जीवन बीमा आदि में ₹1.5 लाख तक), धारा 80D (स्वास्थ्य बीमा), और HRA (मकान किराया भत्ता) शामिल हैं।
नई कर व्यवस्था में आपको ये छूट नहीं मिलतीं। इसमें आपको न तो मकान किराया भत्ता मिलता है, न ही 80C की छूट, और न ही होम लोन के ब्याज पर कोई छूट (खुद के घर के लिए)। यह एक “फ्लैट रेट” सिस्टम है—बिना किसी कटौती के कम टैक्स दर।
| कटौती का प्रकार | पुरानी कर व्यवस्था | नई कर व्यवस्था |
| धारा 80C (₹1.5 लाख) | उपलब्ध है | उपलब्ध नहीं |
| मकान किराया भत्ता (HRA) | उपलब्ध है | उपलब्ध नहीं |
| धारा 80D (मेडिकल) | उपलब्ध है | उपलब्ध नहीं |
| होम लोन ब्याज (धारा 24) | ₹2 लाख तक छूट | छूट नहीं |
3. मानक कटौती (Standard Deduction)
पहले यह माना जाता था कि मानक कटौती (वेतनभोगियों के लिए एक निश्चित छूट) केवल पुरानी व्यवस्था में मिलती है। लेकिन अब इसे नई कर व्यवस्था में भी शामिल कर लिया गया है, जिसने इसे और भी आकर्षक बना दिया है।
बजट घोषणाओं के अनुसार, नई कर व्यवस्था के तहत मानक कटौती को बढ़ाकर ₹75,000 कर दिया गया है। यह वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए सीधी राहत है। पुरानी व्यवस्था में यह सीमा अभी भी सामान्यतः ₹50,000 ही है। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है जो नई व्यवस्था को बेहतर बनाता है।
| विशेषता | पुरानी कर व्यवस्था | नई कर व्यवस्था |
| राशि | ₹50,000 | ₹75,000 |
| किसके लिए? | वेतनभोगी और पेंशनभोगी | वेतनभोगी और पेंशनभोगी |
| प्रभाव | कर योग्य आय ₹50k कम होगी | कर योग्य आय ₹75k कम होगी |
4. धारा 87A के तहत रिबेट (छूट)
कम आय वालों के लिए टैक्स रिबेट (छूट) एक जादुई कवच की तरह काम करती है। यह वह सीमा है जहाँ तक आपको सरकार को ₹1 भी टैक्स नहीं देना पड़ता।
नई कर व्यवस्था में यह सीमा काफी ऊंची है। नई व्यवस्था में ₹12 लाख तक की कर योग्य आय पर (प्रस्तावित रिबेट के साथ) टैक्स देनदारी शून्य हो सकती है। पुरानी व्यवस्था में, यह रिबेट केवल ₹5 लाख तक की आय पर ही मिलती है।
इसका सीधा मतलब है कि अगर आपकी सालाना कमाई ₹7-10 लाख के बीच है और आप कोई निवेश नहीं करते, तो पुरानी व्यवस्था की तुलना में नई व्यवस्था आपके लिए स्पष्ट विजेता है।
| विशेषता | पुरानी कर व्यवस्था | नई कर व्यवस्था |
| टैक्स-फ्री आय सीमा | ₹5 लाख | ₹12 लाख (संभावित/प्रस्तावित) |
| रिबेट राशि | ₹12,500 तक | ₹60,000 तक (अनुमानित) |
| किसके लिए सही? | कम आय वालों के लिए | मध्यम आय वर्ग के लिए |
5. ब्रेक-ईवन पॉइंट (संतुलन बिंदु)
यह वह बिंदु है जहां आपको गणित लगाने की जरूरत है। ब्रेक-ईवन पॉइंट वह राशि है, जिस पर दोनों व्यवस्थाओं में टैक्स बराबर हो जाता है।
एक सामान्य नियम के रूप में, यदि आपकी कुल कटौतियां (Deductions) आपकी आय का 15-18% से अधिक हैं, तो आपको पुरानी कर व्यवस्था चुननी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आपकी आय ₹15 लाख है और आप मकान किराया भत्ता, 80C, और होम लोन के ब्याज को मिलाकर ₹3.75 लाख या उससे अधिक की छूट क्लेम कर सकते हैं, तो पुरानी व्यवस्था आपको ज्यादा पैसे बचाकर देगी।

लेकिन अगर आपकी कटौतियां ₹1.5 लाख या ₹2 लाख तक सीमित हैं, तो नई व्यवस्था आपके लिए बेहतर साबित होगी क्योंकि इसमें टैक्स दरें बहुत कम हैं।
| कुल कटौती | सुझाव |
| ₹1.5 लाख से कम | नई कर व्यवस्था चुनें |
| ₹3.75 लाख से अधिक | पुरानी कर व्यवस्था चुनें |
क्या आप जानते हैं कि आप हर साल अपना टैक्स रिजीम बदल सकते हैं?
- वेतनभोगी कर्मचारी: आप हर वित्तीय वर्ष में अपनी सुविधा के अनुसार पुरानी या नई व्यवस्था चुन सकते हैं। एक साल आप निवेश करके पुरानी व्यवस्था ले सकते हैं, और अगले साल निवेश न कर पाने पर नई व्यवस्था चुन सकते हैं।
- व्यापारी और पेशेवर: इनके लिए नियम थोड़े सख्त हैं। अगर आपने एक बार नई कर व्यवस्था चुन ली, तो आप जीवन में केवल एक बार ही वापस पुरानी कर व्यवस्था में लौट सकते हैं।
7. फाइलिंग में आसानी
अंत में, सुविधा भी एक बड़ा कारक है। पुरानी कर व्यवस्था में आपको वर्ष भर अपने निवेश के सबूत संभालने पड़ते हैं, रसीदें जमा करनी पड़ती हैं, और एचआर विभाग को समय पर जमा करना होता है। अगर कोई रसीद खो गई, तो टैक्स छूट नहीं मिलेगी।
नई कर व्यवस्था में यह सब झंझट खत्म हो जाता है। न कोई रसीद, न कोई निवेश का सबूत। बस अपनी आय देखिए, स्लैब के हिसाब से टैक्स भरिए और निश्चिंत हो जाइए। यह उन युवाओं के लिए बहुत आकर्षक है जो अपनी नकदी को फंसाना नहीं चाहते।
निष्कर्ष
अंततः, पुरानी कर व्यवस्था बनाम नई कर व्यवस्था की लड़ाई में कोई भी एक विजेता नहीं है; विजेता वही है जो आपकी जेब को सूट करे।
नई कर व्यवस्था (New Regime) चुनें यदि:
- आपकी आय ₹15 लाख तक है और आपके पास ज्यादा निवेश नहीं है।
- आप अभी करियर की शुरुआत कर रहे हैं।
- आप जटिल कागजी कार्रवाई से बचना चाहते हैं।
- आप वेतनभोगी हैं और बढ़ी हुई मानक कटौती (Standard Deduction) का लाभ लेना चाहते हैं।
पुरानी कर व्यवस्था (Old Regime) चुनें यदि:
- आपकी आय बहुत अधिक है और आपके पास बड़े निवेश हैं।
- आप किराया भत्ता (HRA), होम लोन ब्याज (₹2 लाख), और 80C (₹1.5 लाख) का पूरा लाभ उठा रहे हैं।
- आपके पास स्वास्थ्य बीमा और शिक्षा ऋण जैसे अतिरिक्त क्लेम भी हैं।
निर्णय लेने से पहले, एक बार दोनों तरीकों से अपने टैक्स की गणना (कैलकुलेटर का उपयोग करके) अवश्य करें। याद रखें, बचाया गया एक-एक रुपया, कमाए गए रुपये के बराबर होता है।
