नासा ने चंद्रमा की धूल से बने कांच के बुलबुले के अंदर अंतरिक्ष यात्रियों के लिए चंद्रमा पर रहने की योजना का खुलासा किया
नासा ने चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों के लिए रहने की क्रांतिकारी योजना का खुलासा किया है, जिसमें चंद्र धूल से ही बड़े-बड़े कांच के गोले-सी संरचनाएं बनाई जाएंगी, जो मानव बस्तियों की नई संभावनाएं खोलेंगी। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी इस विचार को अपनी इनोवेटिव एडवांस्ड कॉन्सेप्ट्स (NIAC) प्रोग्राम के तहत फंडिंग दे रही है, जो एयरोस्पेस क्षेत्र को बदलने वाली परियोजनाओं पर केंद्रित है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, ये गोले चंद्रमा पर ही ‘इन-सिटू’ यानी मौके पर बनाए जाएंगे, जो पारंपरिक निर्माण विधियों से अलग एक नई दिशा सुझाते हैं। यह प्रोजेक्ट स्काईपोर्ट्स कंपनी द्वारा प्रस्तावित है, जिसने पहले ही छोटे स्तर पर चंद्र धूल से कांच के गोले बनाने की क्षमता साबित कर दी है।
चंद्र धूल से कांच कैसे बनेगा? माइक्रोवेव तकनीक का जादू
चंद्रमा की सतह पर मौजूद मिट्टी, जिसे रेगोलिथ कहा जाता है, में छोटे-छोटे कांच के टुकड़े, चट्टानें और खनिज कण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो प्राकृतिक रूप से सूक्ष्म उल्कापिंडों के प्रभाव से बने एग्लूटिनेट्स (agglutinates) के रूप में मौजूद हैं। पृथ्वी से पहुंचने वाले अंतरिक्ष यात्री सबसे पहले इन छोटे टुकड़ों को इकट्ठा करेंगे, जो चंद्र धूल का एक प्रमुख घटक है। नासा के अनुसार, इस सामग्री को पिघलाने के लिए घरेलू माइक्रोवेव ओवन जैसी साधारण तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन एक उन्नत ‘स्मार्ट माइक्रोवेव फर्नेस’ की सहायता से, जो प्लाज्मा-आधारित हीटिंग सिस्टम पर काम करेगी।
यह फर्नेस न केवल सामग्री को उच्च तापमान पर पिघलाएगा, बल्कि उसे फूंक मारकर गोले के आकार में ढाल भी देगा, जो ठंडा होने पर एक मजबूत, पारदर्शी और मोनोलिथिक (एकछत्र) ढांचा बन जाएगा। स्काईपोर्ट्स ने अपने प्रारंभिक परीक्षणों में साबित किया है कि चंद्र सिमुलेंट (नकली चंद्र धूल) से कुछ इंच व्यास के गोले बनाए जा सकते हैं, लेकिन अब लक्ष्य इन्हें सैकड़ों या हजारों फीट चौड़े बनाने का है, ताकि ये पूर्ण रूप से रहने योग्य घर बन सकें। नासा की NIAC 2025 फंडिंग में कुल 2.625 मिलियन डॉलर आवंटित किए गए हैं, जिनमें से एक हिस्सा इस प्रोजेक्ट को मिला है, जो बड़े पैमाने पर कांच के गोले बनाने की व्यवहार्यता का अध्ययन करेगा।
चंद्रमा पर सामग्री भेजना बेहद महंगा है, जहां प्रति किलोग्राम लागत लाखों डॉलर तक पहुंच सकती है, इसलिए इन-सिटू निर्माण न केवल लागत घटाएगा बल्कि स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करेगा। स्काईपोर्ट्स के सीईओ डॉ. मार्टिन बर्मुडेज ने बताया कि चंद्र रेगोलिथ में सिलिका (SiO2) 50-60% तक मौजूद है, जो कांच का मुख्य घटक है, और इसे पिघलाने के लिए 1,200-1,500 डिग्री सेल्सियस तापमान पर्याप्त है। यह तकनीक पृथ्वी पर बड़े पैमाने के कांच निर्माण से प्रेरित है, लेकिन कम गुरुत्वाकर्षण (1/6th of Earth’s) के कारण गोले का निर्माण आसान हो जाएगा।
गोले का आकार, मजबूती और डिजाइन: सेल्फ-हीलिंग कांच की क्रांति
इन गोले-सी संरचनाओं का प्रस्तावित व्यास 1,000 से 1,600 फीट (लगभग 300 से 500 मीटर) तक हो सकता है, जो दर्जनों अंतरिक्ष यात्रियों को समायोजित कर सकेगा। स्काईपोर्ट्स के अनुसार, निर्माण यौगिक को विशेष रूप से संशोधित किया जाएगा ताकि कांच ‘सेल्फ-हीलिंग’ गुण वाला बने, यानी सूक्ष्म उल्कापिंडों, चंद्र कांपनों (मूनक्वेक्स) या तापमान परिवर्तनों से होने वाले दरारें खुद-ब-खुद भर जाएं। यह पॉलीमार-आधारित कांच है, जिसमें नैनो-स्तरीय संरचनाएं होती हैं जो क्षति होने पर पुनर्गठित हो जाती हैं।
गोल आकार का चयन संरचनात्मक मजबूती के लिए किया गया है, क्योंकि यह दबाव को समान रूप से वितरित करता है और गुरुत्वाकर्षण प्रभाव को न्यूनतम रखता है, जिससे चंद्रमा की चरम स्थितियों जैसे -173°C से +127°C तापमान उतार-चढ़ाव और विकिरण से सुरक्षा मिलती है। पारदर्शी कांच का इस्तेमाल न केवल सौंदर्यपूर्ण है बल्कि अंतरिक्ष यात्रियों की मानसिक सेहत के लिए लाभदायक होगा, क्योंकि वे चंद्र परिदृश्य को देख सकेंगे, जो अलगाव की भावना को कम करेगा। डॉ. बर्मुडेज ने कहा, “उच्च तापमान पर कांच अमॉर्फस तरल बन जाता है, और चंद्रमा के कम गुरुत्वाकर्षण में फर्नेस से निकलते ही यह स्वाभाविक रूप से गोले का आकार ग्रहण कर लेता है।”
मजबूती बढ़ाने के लिए कच्चे मिश्रण में टाइटेनियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और एल्यूमीनियम जैसी धातुओं को मिलाया जाएगा, जो चंद्र रेगोलिथ से ही निकाली जा सकेंगी। इसके अलावा, बोरोसिलिकेट ग्लास जैसी विशेष किस्मों का उपयोग किया जा सकता है, जो तापमान प्रतिरोध में बेहतर है और स्टील से भी मजबूत साबित हो सकती है। डॉ. बर्मुडेज ने दो साल पहले नासा से संपर्क किया था, और एजेंसी ने तुरंत इसे NIAC के तहत स्वीकृत कर लिया, जो सैकड़ों प्रस्तावों में से चयनित परियोजनाओं को फंड करता है। यह प्रोजेक्ट जोश सिम्पसन जैसे ग्लास आर्टिस्ट के साथ सहयोग में विकसित हो रहा है, जो चंद्र कांच की ऑप्टिकल गुणों और विस्तार गुणांक का अध्ययन कर रहे हैं।
ऊर्जा, इंटीरियर और निर्माण प्रक्रिया: 3D प्रिंटिंग से सज्जित घर
ये चंद्र घर सोलर पैनल से लैस होंगे, जो कांच की सतह पर एम्बेडेड होकर अपनी ऊर्जा खुद पैदा करेंगे, और चंद्रमा के 14 दिनों के लंबे दिन का फायदा उठाएंगे। इंटीरियर की सभी फिटिंग्स, जैसे फर्नीचर, दीवारें और उपकरण, चंद्र सतह से इकट्ठी सामग्री का उपयोग करके 3D प्रिंट की जाएंगी, जो लागत और लॉजिस्टिक्स को सरल बनाएगा। प्रवेश द्वार के लिए विशाल गैस पाइपों का उपयोग किया जाएगा, जो कांच को फूंकने के बाद ही repurposed होकर एंट्रेंस बन जाएंगे।
स्काईपोर्ट्स के मुताबिक, चंद्रमा की वैक्यूम स्थिति गोले बनाने को आसान बनाती है, क्योंकि बाहरी दबाव की कमी से कम बल की जरूरत पड़ती है। निर्माण के दौरान आर्गन गैस (एक नोबल गैस जो गैर-प्रतिक्रियाशील है) का उपयोग फूंकने के लिए किया जाएगा, जो शुरुआत में पृथ्वी से भेजा जाएगा लेकिन बाद में स्थानीय रूप से उत्पादित हो सकेगा। यह विधि पारंपरिक तरीकों जैसे पूर्व-निर्मित पार्ट्स, इन्फ्लेटेबल सिस्टम या जटिल असेंबली से श्रेष्ठ है, जो श्रम-गहन और समय लेने वाली हैं। इसके बजाय, यह चंद्र संसाधनों पर निर्भर इन-सिटू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देता है, जो आर्थिक विकास और स्पिन-ऑफ टेक्नोलॉजीज पैदा कर सकता है।
बहु-स्तरीय गोले: ऑक्सीजन, खेती और इकोसिस्टम का निर्माण
भविष्य की योजनाओं में इन गोले को बहु-परतों में डिजाइन किया जाएगा, जहां बाहरी परतें विकिरण और उल्कापिंड सुरक्षा के लिए होंगी, और बीच में आर्गन जैसी गैस की परतें दबाव बनाए रखेंगी, ठीक पृथ्वी पर डबल-ग्लेज्ड विंडोज की तरह। एक परत गर्म और दूसरी ठंडी रखकर संघनन (कंडेंसेशन) पैदा किया जा सकेगा, जो पानी चक्र को चलाने में मदद करेगा। इससे अंतरिक्ष यात्री सब्जियां, फसलें और पौधे उगा सकेंगे, जो न केवल भोजन प्रदान करेंगे बल्कि ऑक्सीजन उत्पादन वाले इकोसिस्टम का निर्माण करेंगे, जैसा कि ECLSS (एनवायरनमेंटल कंट्रोल एंड लाइफ सपोर्ट सिस्टम) में एकीकृत होगा।
विकास टीम को उम्मीद है कि इतने बड़े गोले से सोलर एनर्जी के माध्यम से पर्याप्त बिजली पैदा हो सकेगी, जो पूरे सिस्टम को स्व-निर्भर बना देगी, जिसमें वेस्ट मैनेजमेंट, थर्मल कंट्रोल और कम्युनिकेशन शामिल हैं। बाहरी परत को स्पिनिंग (घुमावदार) बनाकर उल्कापिंड प्रभाव को फैलाया जा सकेगा, जो सपाट सतहों की तुलना में बेहतर सुरक्षा देगा। नासा की NIAC रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दृष्टिकोण चंद्रमा पर स्व-निर्भर ऑफ-वर्ल्ड हैबिटेट्स की नई युग की शुरुआत कर सकता है, जो मानवता के लिए लाभकारी होगा।
परीक्षण चरण और भविष्य की महत्वाकांक्षाएं: स्पेस स्टेशन से चंद्रमा तक
फूंक मारने की तकनीक का पहला परीक्षण जनवरी 2026 में थर्मल वैक्यूम चैंबर में होगा, जहां चंद्र स्थितियों की नकल की जाएगी। इसके बाद माइक्रो-ग्रेविटी टेस्ट्स होंगे, और अंततः इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर आजमाया जाएगा, जहां वजनहीनता में गोले बनाने की संभावना जांच ली जाएगी। अगले 2-3 वर्षों में चंद्रमा पर ही प्रोटोटाइप टेस्ट हो सकते हैं। स्काईपोर्ट्स फेज I रिजल्ट्स को सितंबर 2025 के NIAC सिम्पोजियम में प्रस्तुत किया जाएगा, जहां फिलाडेल्फिया में वैज्ञानिक चर्चा होगी।
डॉ. बर्मुडेज का विजन है कि चंद्रमा पर पूरे ‘गोले शहर’ बनें, जहां ये संरचनाएं कांच के पुलों से जुड़ी हों, और इन्हें मंगल या अंतरिक्ष कक्षा में भी तैनात किया जा सके। उन्होंने अपनी आर्किटेक्चर पृष्ठभूमि से प्रेरित होकर चंद्रमा या मंगल पर संरचनाएं डिजाइन की हैं। “पृथ्वी को कभी पूरी तरह दोहराया नहीं जा सकता, लेकिन यह डिजाइन कुछ ऐसा करीब लाता है, जो मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से आरामदायक हो,” उन्होंने कहा। यह विचार 2023 में जर्मनी के आलेन यूनिवर्सिटी के लेजर-झुलसाई चंद्र ईंटों के सुझाव से आगे बढ़ता है, लेकिन कांच के गोले अधिक लचीले और बड़े पैमाने के हैं।
आर्टेमिस मिशन से जुड़ाव: नासा का बड़ा विजन और चुनौतियां
नासा के आर्टेमिस प्रोग्राम के तहत अगले 5 वर्षों में पुरुषों को चंद्रमा पर भेजने की योजना है, और वर्तमान में उपयुक्त हैबिटेट्स की खोज चल रही है, जहां 30 दिनों तक के मिशनों के लिए सुरक्षित आधार की जरूरत है। डॉ. बर्मुडेज ने चेतावनी दी, “हम समय से दौड़ रहे हैं, क्योंकि आर्टेमिस तेजी से प्रगति कर रहा है।” यह प्रोजेक्ट आर्टेमिस बेस कैंप के हिस्से के रूप में फिट हो सकता है, जहां सर्फेस हैबिटेट, प्रेशराइज्ड रोवर और लूनर टेरेन व्हीकल जैसे तत्व शामिल हैं।
नासा स्पेस टेक्नोलॉजी मिशन डायरेक्टोरेट के क्लेटन टर्नर ने कहा, “हमारे अगले कदम और बड़ी छलांगें नवाचार पर टिकी हैं। NIAC से जन्मे विचार गहरे अंतरिक्ष की खोज, लो-अर्थ ऑर्बिट में कार्य और पृथ्वी की रक्षा को बदल सकते हैं – छोटे रोबोट्स से लेकर फंगस-आधारित हैबिटेट्स तक।” चुनौतियां बेशक हैं, जैसे चंद्र धूल की विषाक्तता, निर्माण के दौरान धूल उड़ना जो सैटेलाइट्स को नुकसान पहुंचा सकता है, और लॉन्च पैड्स की जरूरत, लेकिन यह प्रोजेक्ट इन्हें हल करने की दिशा में कदम है।
अन्य शोधों से तुलना और वैश्विक महत्व
यह अध्ययन 2023 के जर्मन शोध से प्रेरित है, जहां लेजर से चंद्र धूल की ईंटें बनाने का प्रस्ताव था, लेकिन कांच के गोले अधिक टिकाऊ और पारदर्शी हैं। नासा की डिस्क्रिप्शन में कहा गया है, “यह इन-सिटू पिघलाने और बड़े गोले संरचना का निर्माण मौजूदा विधियों से अलग है, जो स्पेस एक्सप्लोरेशन को बदल देगा।” यह अवधारणा चंद्रमा पर मानव उपनिवेशण को आसान बनाएगी, आर्थिक विकास को बढ़ावा देगी और पृथ्वी से परे जीवन की नई संभावनाएं खोलेगी, जो नासा, एयरोस्पेस समुदाय और पूरी मानवता के लिए एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकती है। द टेलीग्राफ और यूनिवर्स टुडे जैसी रिपोर्ट्स से सत्यापित यह जानकारी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के भविष्य को आकार दे रही है।
