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जगद्धात्री पूजा 2025: तिथि, समय, शुभ मुहूर्त, महत्व और अनुष्ठान

हिंदू धर्म में देवी दुर्गा के अनेक रूपों की पूजा प्राचीन काल से की जाती रही है, और इनमें से एक प्रमुख रूप है देवी जगदधात्री का। पवित्र ग्रंथों जैसे उपनिषदों और कात्यायनी तंत्र में मां जगदधात्री को “जगत की धात्री” या “विश्व की पालक” के रूप में वर्णित किया गया है, जो सारी सृष्टि का पालन-पोषण, संरक्षण और संतुलन बनाए रखती हैं। उनका स्वरूप अत्यंत शांत, कोमल और सात्विक माना जाता है, जिसमें चार भुजाएं हैं—दोनों ऊपरी भुजाओं में शंख और चक्र, तथा निचली भुजाओं में धनुष और बाण धारण किए होते हैं। यह रूप शक्ति, धैर्य, संयम और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक है, जो भक्तों को अहंकार, अज्ञान और नकारात्मक भावनाओं पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। हिंदू कथाओं और तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, मां जगदधात्री की पूजा विशेष रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर की जाती है, जो त्रेता युग की शुरुआत से जुड़ी मानी जाती है। इस वर्ष, 2025 में भक्तगण 31 अक्टूबर को देवी जगदधात्री पूजा का उत्सव मनाएंगे, जो पश्चिम बंगाल के चंदननगर, कृष्णनगर और कोलकाता जैसे क्षेत्रों में विशेष उत्साह के साथ आयोजित होता है। यह पूजा न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का माध्यम भी है, जहां भव्य पंडाल, रंग-बिरंगी सजावट और पारंपरिक नृत्य-गीतों का आयोजन होता है।​

जगदधात्री पूजा 2025: तिथि और समय

2025 में जगदधात्री पूजा का मुख्य दिन शुक्रवार, 31 अक्टूबर को निर्धारित है, जो हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि से संबद्ध है। नवमी तिथि की शुरुआत 30 अक्टूबर 2025 को सुबह 10:06 बजे होगी और यह 31 अक्टूबर को सुबह 10:03 बजे तक चलेगी। यह तिथि अक्षय नवमी के रूप में भी जानी जाती है, जो शुभ कार्यों और आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष मानी जाती है। पश्चिम बंगाल में यह पूजा दशहरा या काली पूजा के ठीक बाद आयोजित की जाती है, और कभी-कभी सातमी, अष्टमी तथा नवमी को शामिल कर तीन दिनों का उत्सव बनाया जाता है। हालांकि, मुख्य पूजा नवमी तिथि पर ही केंद्रित रहती है, जहां भक्त देवी के स्वरूप पर ध्यान लगाते हैं। क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण तिथि में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए भक्तों को स्थानीय पंचांग या ज्योतिषी से पुष्टि कर लेनी चाहिए। चंदननगर जैसे स्थानों पर पूजा की तैयारी सप्ताह भर पहले से शुरू हो जाती है, जिसमें मूर्ति निर्माण, पंडाल सज्जा और सामुदायिक भोज की व्यवस्था शामिल होती है। यह तिथि न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भक्तों को उपवास, प्रार्थना और सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है।​

जगदधात्री पूजा 2025: शुभ मुहूर्त

जगदधात्री पूजा के लिए शुभ मुहूर्त का निर्धारण चोघड़िया मुहूर्त प्रणाली के आधार पर किया जाता है, जो तांत्रिक परंपरा से प्रेरित है और पूजा की सिद्धि सुनिश्चित करती है। 2025 में प्रमुख शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:​

  • लाभ चोघड़िया (सुबह): सुबह 07:11 बजे से 08:36 बजे तक—यह समय नई शुरुआत और लाभकारी कार्यों के लिए आदर्श है।
  • अमृत चोघड़िया (सुबह): सुबह 08:36 बजे से 10:00 बजे तक—इसमें पूजा से अमृत तुल्य फल प्राप्त होते हैं।
  • शुभ चोघड़िया (दोपहर): सुबह 11:25 बजे से दोपहर 12:49 बजे तक—शुभ कार्यों की सफलता के लिए सर्वोत्तम।
  • लाभ चोघड़िया (शाम): शाम 08:14 बजे से 09:50 बजे तक—प्रदोष काल में आरती और भजन के लिए उपयुक्त।​

ये मुहूर्त सूर्योदय के बाद या प्रदोष काल (सूर्यास्त से डेढ़ घंटे पहले) में पूजा करने के लिए चुने जाते हैं, जो देवी की कृपा प्राप्ति में सहायक होते हैं। तांत्रिक विधि के अनुसार, इन समयों में पूजन से बाधाएं दूर होती हैं और सिद्धियां प्राप्त होती हैं। यदि स्थानीय परिस्थितियां अनुकूल न हों, तो ज्योतिष विशेषज्ञ से वैकल्पिक मुहूर्त की सलाह ली जा सकती है। चंदननगर और कृष्णनगर में इन मुहूर्तों के दौरान सामूहिक पूजा आयोजित की जाती है, जहां हजारों भक्त एकत्र होते हैं। यह प्रणाली प्राचीन ग्रंथों जैसे काल विवेक से ली गई है, जो पूजा को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाती है।​

जगदधात्री पूजा 2025: महत्व

हिंदू धर्म में जगदधात्री पूजा का गहन महत्व है, क्योंकि यह देवी जगदधात्री को विश्व की आधारशिला और संरक्षक के रूप में स्थापित करती है। चार भुजाओं वाली यह देवी सिंह पर विराजमान होती हैं, और उनके नीचे हाथी राक्षस का चित्रण अहंकार पर विजय का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर के वध के बाद देवताओं में अहंकार उत्पन्न हो गया था। तब देवी जगदधात्री ने धरती पर अवतार लिया और उनकी शक्ति की परीक्षा ली, ताकि वे अपनी भूलों को समझ सकें और विनम्रता सीखें। एक अन्य प्रसिद्ध कथा में, देवी ने कारिंद्रासुर नामक हाथी रूप वाले राक्षस का संहार किया, जो सृष्टि की रक्षा का संदेश देती है। तब से देवता और मनुष्य उनकी पूजा करते आ रहे हैं, जो अहंकार मुक्ति और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक है।​

यह पूजा मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के चंदननगर, कृष्णनगर, हूगली और कोलकाता में उत्साहपूर्वक मनाई जाती है, जहां भव्य जुलूस, पारंपरिक संगीत, धुनुची नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। परंपरा की जड़ें 18वीं शताब्दी में नादिया जिले के कृष्णनगर राजा कृष्णचंद्र राय से जुड़ी हैं। किंवदंती है कि राजनीतिक अशांति के कारण दुर्गा पूजा बाधित हो गई थी, तब राजा को देवी जगदधात्री के दर्शन हुए। प्रायश्चित के रूप में उन्होंने इस पूजा की शुरुआत की, जो धीरे-धीरे पूर्वी भारत में फैल गई। आज यह उत्सव सामुदायिक सद्भाव और कला का प्रतीक है, जहां पंडालों को फूलों, लाइट्स और थीम-आधारित सजावट से सजाया जाता है। 2025 में कई पंडालों का थीम “सहनशीलता और आशा” पर आधारित होगा, जो देवी के पालनकर्ता स्वरूप को प्रतिबिंबित करेगा। पूजा से सौभाग्य, समृद्धि, शांति और चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति होती है, साथ ही नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा मिलती है। यह अवसर भक्तों को विनम्रता, भक्ति और सामूहिक एकता की शिक्षा देता है।​

जगदधात्री पूजा 2025: विधि

मां जगदधात्री की पूजा तांत्रिक परंपरा के अनुसार की जाती है, जो सूर्योदय के बाद सुबह या प्रदोष काल में प्रारंभ होनी चाहिए। सबसे पहले, पूजा स्थल की शुद्धि करें और घर के उत्तर दिशा में पीले वस्त्र पर देवी जगदधात्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजारी उत्तरमुखी होकर पूजन करे। पूजा करने वाले को पीले वस्त्र धारण करने चाहिए, जो देवी के सात्विक स्वरूप का प्रतीक हैं। एक कलश लें, उसमें जल भरें, चना दाल मिलाएं, नारियल से ढकें और देवी के पास स्थापित करें—यह सृष्टि के पालन का प्रतीक है। दीपक घी और हल्दी के मिश्रण से प्रज्वलित करें, जो शुद्धता और प्रकाश का संदेश देता है।​

कपूर की आरती करें, पीले फूल, चंदन, दूर्वा, जल, सिंदूर, फल, मिठाई और लाल वस्त्र अर्पित करें। चंदी पाठ का वाचन करें, जो देवी की महिमा का वर्णन करता है। उसके बाद, देवी और परिवारजनों को हल्दी का तिलक लगाएं। भोग में दूध, शहद, फल और मिठाई चढ़ाएं, जो पोषण का प्रतीक हैं। मुख्य मंत्र “ॐ परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चंडिका नमोस्तु ते॥” का 108 बार जाप करें और देवी के स्वरूप—शांत सिंह पर विराजमान, चार भुजाओं वाली—पर ध्यान लगाएं। पूजा में षोडश उपचार (16 प्रकार के आचार) का पालन करें, जिसमें स्नान, वस्त्र, पुष्प आदि शामिल हैं। कुछ स्थानों पर कुमारी पूजा (कन्या पूजन) और बलिदान (बकरी या गन्ना/कद्दू का प्रतीकात्मक बलि) भी किया जाता है, लेकिन आधुनिक समय में अहिंसक विकल्प अपनाए जाते हैं।​

पूजा के बाद संकल्प लें कि सद्कार्य करेंगे, और शाम को धार्मिक सभाओं, भजन-कीर्तन या धुनुची नृत्य में भाग लें। विजय क्रिया के रूप में विसर्जन करें, जहां मूर्ति को नदी या जलाशय में विसर्जित किया जाता है। बेलूर मठ जैसे स्थानों पर पूजा को तीन खंडों (पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न) में बांटा जाता है, उसके बाद होम, पुष्पांजलि और आरती होती है। यह विधि शुद्धता, भक्ति और सामूहिक भागीदारी पर जोर देती है, जो जीवन में संतुलन, शांति और बाधा-मुक्ति प्रदान करती है। पूजा से पहले उपवास रखें और समापन पर प्रसाद वितरण करें, जो सामुदायिक बंधन को मजबूत करता है।