भारत ने 16,000 फीट पर दुनिया की सबसे ऊंची मोनोरेल तैनात की
भारतीय सेना के गजराज कोर ने अरुणाचल प्रदेश के कामेंग सेक्टर में लगभग 16,000 फीट (करीब 4,880 मीटर) की भयानक ऊंचाई पर एक स्वदेशी हाई-एल्टीट्यूड मोनोरेल सिस्टम को सफलतापूर्वक विकसित और चालू कर दिया है, जो चीन के साथ विवादित वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैन्य लॉजिस्टिक्स में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो रहा है। यह सिस्टम 13 नवंबर 2025 को अनावरण किया गया और पूरी तरह से सेना के इंजीनियरों द्वारा डिजाइन व निर्मित किया गया है, जो हिमालयी इलाकों की कठोर चुनौतियों को दूर करने के लिए तैयार किया गया है।
जहां पारंपरिक परिवहन जैसे खच्चर, वाहन या पैदल कुली अक्सर असफल हो जाते हैं, वहां यह मोनोरेल सैनिकों को आवश्यक सामग्री जैसे राशन, गोला-बारूद और ईंधन को सुरक्षित पहुंचाने में मदद करेगा, जिससे फॉरवर्ड पोस्ट्स की आपूर्ति निश्चित हो जाएगी। गजराज कोर ने इसकी कार्यक्षमता को साबित करने के लिए एक वीडियो भी जारी किया है, जो इसकी मजबूती और दक्षता को दर्शाता है। यह उपलब्धि न केवल सैन्य क्षमताओं को मजबूत करती है, बल्कि भारत की इंजीनियरिंग क्षमता को वैश्विक स्तर पर चमकाती है।
चरम परिस्थितियों के लिए इंजीनियरिंग समाधान
गजराज कोर के इंजीनियरों द्वारा पूरी तरह से सोचा-समझा और विकसित यह मोनोरेल सिस्टम एक ही यात्रा में 300 किलोग्राम से अधिक का भार ढोने में सक्षम है, भले ही इलाका कितना भी खड़ी ढलान वाला, पथरीला या अस्थिर क्यों न हो। इसकी मजबूत संरचना मौसम की किसी भी मार झेलने लायक है, जो इसे 24 घंटे चालू रखती है—चाहे दिन हो या रात, ओले पड़ें, तूफान आए या घना बर्फीला अंधेरा छा जाए। रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, यह सिस्टम मिशन-क्रिटिकल सामान जैसे गोला-बारूद, राशन, ईंधन, इंजीनियरिंग उपकरण, भारी मशीनरी और असुविधाजनक आकार के सामान को आसानी से ले जा सकता है, जो अन्यथा खड़ी चढ़ाइयों और अस्थिर सतहों पर पहुंचाना लगभग असंभव होता है। एक रक्षा अधिकारी ने कहा, “यह सुविधा पूरी तरह से कार्यशील है, जो बिना एस्कॉर्ट के दिन-रात इस्तेमाल की जा सकती है, चाहे मौसम कैसा भी हो।”
कामेंग हिमालय क्षेत्र की भौगोलिक कठिनाइयां किसी से छिपी नहीं हैं—यहां ऊंची-ऊंची नंगी चट्टानें, शून्य से नीचे तापमान (कभी-कभी -20 डिग्री सेल्सियस तक), अनिश्चित मौसम परिवर्तन और भारी बर्फबारी आम हैं, जो अक्सर फॉरवर्ड पोस्ट्स को कई दिनों तक पूरी तरह अलग-थलग कर देती हैं। पारंपरिक परिवहन तरीके जैसे खच्चर या वाहन इन स्थितियों में जोखिम भरे साबित होते हैं, क्योंकि बर्फीले तूफानों में रास्ते बंद हो जाते हैं और जान-माल का खतरा बढ़ जाता है। कुली या पैदल तरीके से सामान पहुंचाना न केवल समय लेने वाला है, बल्कि सैनिकों की थकान और ऑक्सीजन की कमी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ाता है।
इस मोनोरेल ने इन सभी चुनौतियों का सामना करते हुए यात्रा के समय को आधे से भी कम कर दिया है और सैनिकों की शारीरिक थकान को काफी हद तक घटा दिया है, खासकर जहां हवा पतली होती है और हर कदम पर खतरा मंडराता है। सेना के इंजीनियरों ने इसे स्थानीय सामग्री का उपयोग करके बनाया है, जो इसकी रखरखाव को आसान और लागत प्रभावी बनाता है। इसके अलावा, सिस्टम की डिजाइन में सुरक्षा फीचर्स जैसे आपातकालीन ब्रेक और स्थिरता कंट्रोल शामिल हैं, जो चरम मौसम में भी दुर्घटनाओं को रोकते हैं।
LAC के साथ सामरिक महत्व
यह तैनाती LAC पर लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच आ रही है, जहां भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा साझा की जाती है, और पूर्वी क्षेत्र में कामेंग सेक्टर एक संवेदनशील बिंदु है। गजराज कोर, जिसे IV कोर के नाम से भी जाना जाता है और इसका मुख्यालय असम के तेजपुर में स्थित है, 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान फिर से गठित किया गया था, जब पूर्वी सीमा पर गंभीर चुनौतियां आई थीं। आज यह कोर पूर्वी क्षेत्र के संचालन की पूरी जिम्मेदारी संभालता है, जिसमें अरुणाचल प्रदेश के ऊंचे इलाकों की निगरानी और रक्षा शामिल है।
यह मोनोरेल सिस्टम न केवल लॉजिस्टिक्स को मजबूत करता है, बल्कि हेलीकॉप्टर लैंडिंग असंभव या असुरक्षित होने वाली स्थितियों में घायल सैनिकों को तेजी से निकालने में भी क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है। ऊंचाई और मौसम की वजह से हेलीकॉप्टर अक्सर उड़ान भरने में असमर्थ होते हैं, जबकि मैनुअल निकासी धीमी, थकाऊ और जानलेवा साबित होती है—कई बार घायलों को घंटों या दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। लेकिन यह सिस्टम एक सुरक्षित और तेज विकल्प प्रदान करता है, जो निकासी के समय को काफी कम कर देगा और सैनिकों को समय पर चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करेगा।
हाल के वर्षों में LAC पर बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के भारत के प्रयास तेज हो गए हैं, जैसे सिक्किम और अरुणाचल में रेल कनेक्टिविटी का विस्तार, जो सड़कों पर निर्भरता को कम करता है और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाता है। गजराज कोर ने पहले भी स्थानीय समुदायों के लिए ग्रेजियर हट्स और अन्य सहायता सुविधाएं विकसित की हैं, जो सीमावर्ती क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाती हैं। यह नवाचार सेना की गतिशीलता, जीवित रहने की क्षमता और संचालन समर्थन को नई ऊंचाइयों पर ले जाता है, खासकर जहां दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिस्टम भविष्य में अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है, जो भारत की रक्षा रणनीति को और मजबूत करेगा। कुल मिलाकर, यह तैनाती सैन्य तैयारियों को बढ़ावा देती है और संभावित संघर्षों में लचीलापन प्रदान करती है।
आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत स्वदेशी क्षमताओं का विस्तार
यह मोनोरेल सिस्टम भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल का एक जीवंत उदाहरण है, जो रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देती है, ताकि विदेशी निर्भरता कम हो और घरेलू उद्योग मजबूत हों। हाल के वर्षों में, भारत ने स्वदेशी रक्षा उत्पादन को 32% से बढ़ाकर 88% तक पहुंचा दिया है, जिसमें मिसाइलें, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां और तोपखाने जैसे क्षेत्र शामिल हैं। डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन), सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और निजी स्टार्टअप्स ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक तोप प्रणालियों जैसे उपकरण विकसित किए हैं, जो वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में अपनी प्रभावशीलता साबित कर चुके हैं। पिछले तीन वर्षों में 12,300 से अधिक रक्षा आइटमों का स्वदेशीकरण पूरा हो चुका है, और रक्षा क्षेत्र में 7,500 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित हुआ है, जो रोजगार सृजन और तकनीकी प्रगति को बढ़ावा दे रहा है।
आत्मनिर्भर भारत के दायरे में, भारत स्टील्थ तकनीक, रोबोटिक्स, ड्रोन और मानवरहित सिस्टम पर तेजी से काम कर रहा है, जो सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी, बचाव और लॉजिस्टिक्स को क्रांतिकारी रूप से बदल देंगे। उदाहरण के लिए, स्वदेशी ड्रोन और सेंसर सिस्टम LAC पर वास्तविक समय की जानकारी प्रदान कर रहे हैं, जबकि रोबोटिक वाहन खतरनाक इलाकों में सामग्री पहुंचा रहे हैं। गजराज कोर की यह मोनोरेल उपलब्धि सेना के इंजीनियरिंग कौशल का प्रतीक है, जो सीमित संसाधनों में नवाचार करने की क्षमता दिखाती है। सेना ने इसे पूरी तरह से इन-हाउस बनाया, बिना किसी विदेशी सहायता के, जो आत्मनिर्भरता की भावना को मजबूत करता है। भविष्य में, ऐसे और नवाचारों की उम्मीद है, जैसे हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन या स्मार्ट सप्लाई चेन सिस्टम, जो भारत को वैश्विक रक्षा बाजार में अग्रणी बनाएंगे। यह न केवल राष्ट्रीय गौरव का विषय है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को स्थापित करता है, जहां अन्य देश भी ऐसी तकनीकों से प्रेरणा ले सकते हैं।
