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H-1B वीजा शुल्क में बढ़ोतरीः जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने H-1B वीजा पर भारतीयों से घर लौटने की अपील की

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एच-1बी वीजा शुल्क में अचानक और भारी वृद्धि की घोषणा के बाद पूरी टेक्नोलॉजी और आईटी इंडस्ट्री में सदमा फैल गया है। यह घोषणा शुक्रवार को की गई थी, जिसमें ट्रंप ने दो कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें से एक “ट्रंप गोल्ड कार्ड” की स्थापना और दूसरा एच-1बी वीजा के लिए 100,000 डॉलर का शुल्क शामिल है। नई नियमों के तहत, विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने वाली कंपनियों को अब हर नए एच-1बी आवेदन के लिए यह एकमुश्त 100,000 डॉलर का भुगतान करना होगा, जो पहले 1,000 से 5,000 डॉलर के बीच था। यह शुल्क 21 सितंबर 2025 से प्रभावी हो गया है और केवल नए आवेदनों पर लागू होता है, मौजूदा वीजा धारकों या पहले से दाखिल आवेदनों पर नहीं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह कदम अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करने और विदेशी श्रमिकों को कम वेतन पर नियुक्त करने की प्रथा को रोकने के लिए उठाया गया है, क्योंकि एच-1बी कार्यक्रम की आलोचना होती रही है कि यह अमेरिकी श्रमिकों के लिए नौकरियां छीनता है। घोषणा के तुरंत बाद, भ्रम और अफरा-तफरी फैल गई, क्योंकि शुरुआत में यह स्पष्ट नहीं था कि क्या यह शुल्क मौजूदा वीजा धारकों या नवीनीकरण पर भी लागू होगा, जिससे कई लोग छुट्टियां रद्द करके अमेरिका लौटने लगे। व्हाइट हाउस ने शनिवार को स्पष्ट किया कि यह केवल नए पेटिशन पर लागू है और मौजूदा धारकों को यात्रा करने या लौटने में कोई समस्या नहीं होगी। इस बदलाव से पहले, एच-1बी वीजा 1990 में राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश के समय शुरू हुआ था, जो कंपनियों को विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को छह साल तक अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है, लेकिन अब न्यूनतम वार्षिक वेतन को भी बढ़ाया जा रहा है ताकि यह अमेरिकी श्रमिकों के बराबर हो। घोषणा के बाद, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, मेटा, एप्पल और गूगल जैसी बड़ी टेक कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को तुरंत अमेरिका लौटने की सलाह दी, क्योंकि इन कंपनियों में हजारों एच-1बी धारक काम करते हैं—उदाहरण के लिए, अमेज़न के पास 14,000 से ज्यादा एच-1बी कर्मचारी हैं। अब, जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने भी भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को सलाह दी है कि वे भारत लौटकर अपना जीवन दोबारा बनाएं और इस संकट को अवसर में बदलें। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर साझा किए गए एक विस्तृत पोस्ट में वेम्बू ने भारत विभाजन की ऐतिहासिक घटना से तुलना की, जहां लाखों लोगों को अपना सब कुछ छोड़ना पड़ा था लेकिन उन्होंने दोबारा संघर्ष करके सफलता हासिल की। उन्होंने अपने सिंधी दोस्तों की कहानियां साझा कीं, जिनके परिवारों ने विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आकर नई शुरुआत की और आज समृद्ध हैं, यह बताते हुए कि वर्तमान स्थिति भी वैसी ही चुनौतीपूर्ण हो सकती है लेकिन इससे मजबूती मिलेगी। वेम्बू ने जोर दिया कि डर में जीने की बजाय साहसिक फैसला लें, क्योंकि भारत अब पहले से कहीं ज्यादा विकसित है और यहां स्टार्टअप, टेक हब और निवेश के अवसर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।

वेम्बू खुद अमेरिका में काम कर चुके हैं और फिर भारत लौटकर जोहो को एक वैश्विक सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (सास) कंपनी बना चुके हैं, जो अब अरबों डॉलर की कंपनी है और दुनिया भर में लाखों ग्राहकों को सेवा देती है। उन्होंने सुझाव दिया कि वर्तमान वीजा संकट भारतीय प्रतिभाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है, जहां वे अपने वैश्विक अनुभव का उपयोग भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में कर सकते हैं। वेम्बू ने कहा कि आज का भारत 1990 या 2000 के दशक से बहुत अलग है, जहां डिजिटल इकोनॉमी, ई-कॉमर्स, फिनटेक और एआई जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास हो रहा है, और वैश्विक कंपनियां जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न भारत में बड़े आरएंडडी सेंटर स्थापित कर रही हैं। जो लोग यह जोखिम उठाने को तैयार हैं, वे अंततः इससे लाभान्वित होंगे, क्योंकि वापसी से न केवल व्यक्तिगत विकास होगा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा। इस अपील ने सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा छेड़ दी है, जहां कई भारतीय पेशेवरों ने अपनी कहानियां साझा कीं कि कैसे वे अमेरिका में संघर्ष कर रहे हैं और भारत लौटने पर विचार कर रहे हैं। वेम्बू की सलाह का आधार यह है कि एच-1बी वीजा पर निर्भर रहना अब जोखिम भरा हो गया है, और भारत में अब स्टार्टअप इकोसिस्टम इतना मजबूत है कि यहां यूनिकॉर्न कंपनियां और निवेशक आसानी से उपलब्ध हैं।

श्रीधर वेम्बू का पूरा पोस्ट यहां पढ़ें

मैंने अपने सिंधी दोस्तों से इतनी कहानियां सुनी हैं कि कैसे उनके परिवारों को विभाजन के दौरान सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा। उन्होंने अपना जीवन दोबारा बनाया और सिंधी समुदाय ने भारत में अच्छा प्रदर्शन किया है। मैं दुखी होकर कह रहा हूं, लेकिन अमेरिका में एच-1बी वीजा पर रहने वाले भारतीयों के लिए यह वही समय हो सकता है। घर लौट आइए। अपना जीवन दोबारा बनाने में 5 साल लग सकते हैं, लेकिन इससे आप मजबूत बनेंगे। डर में न जिएं। साहसिक कदम उठाएं। आप सफल होंगे। इस पोस्ट में वेम्बू ने आगे जोड़ा कि विभाजन की तरह यह स्थिति भी अस्थायी है, लेकिन इससे सीख लेकर आगे बढ़ना जरूरी है, और भारत अब उन अवसरों से भरा है जो पहले नहीं थे, जैसे कि बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे टेक हब जहां स्टार्टअप्स फल-फूल रहे हैं।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है

वीजा शुल्क में यह वृद्धि कुशल पेशेवरों की रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा दे सकती है, जो भारत के घरेलू टेक और स्टार्टअप इकोसिस्टम को और मजबूत बनाएगी, क्योंकि अनुमान है कि 2027 तक लगभग 2,20,000 भारतीय प्रोफेशनल्स घर लौट सकते हैं। 2025 में भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, जहां कैपिटल मार्केट का विस्तार हो रहा है, वेंचर कैपिटल निवेश रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है, और वैश्विक कंपनियां जैसे कि इंटेल, आईबीएम और सिस्को यहां बड़े पैमाने पर आरएंडडी हब स्थापित कर रही हैं, जो महत्वाकांक्षी ग्रेजुएट्स के लिए उपजाऊ जमीन प्रदान करती है जो पहले अमेरिका को सफलता का एकमात्र रास्ता मानते थे। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे 8,000-12,000 नए स्टार्टअप्स शुरू हो सकते हैं, टेक पेटेंट फाइलिंग में 15-20% की वृद्धि हो सकती है, और भारत की जीडीपी में सालाना 3-4 बिलियन डॉलर का सीधा योगदान हो सकता है। इसके अलावा, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की गति 3-5 साल तेज हो सकती है, क्योंकि लौटने वाले पेशेवर अपने अमेरिकी अनुभव से एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में नवाचार लाएंगे। भारत में पहले से ही 245 बिलियन डॉलर का आईटी सेक्टर है, जो इस रिवर्स ब्रेन गेन से और मजबूत होगा, खासकर ऐसे समय में जब चीन और भारत जैसे देश वैश्विक टैलेंट हब बनने की दौड़ में हैं। हालांकि, भारतीय आईटी कंपनियां जैसे टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएलटेक और विप्रो को शुरुआती चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि उनका 55-85% राजस्व अमेरिका से आता है और नई वीजा फीस से उनके लाभ में 7-15% की कटौती हो सकती है, साथ ही 150-550 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इन कंपनियों को अब अमेरिका में लोकल हायरिंग बढ़ानी पड़ सकती है या ऑफशोर मॉडल पर ज्यादा फोकस करना पड़ सकता है, जैसे कि भारत से ही काम करवाना। डॉक्टरों को इस शुल्क से छूट मिलने की संभावना है, जो मेडिकल क्षेत्र के लिए बड़ी राहत है, क्योंकि भारतीय डॉक्टर अमेरिका में 6% चिकित्सक कार्यबल का हिस्सा हैं। कुल मिलाकर, यह बदलाव भारत के लिए ‘रिवर्स ब्रेन गेन’ का सुनहरा अवसर बन सकता है, जहां वापस लौटने वाले पेशेवर वैश्विक अनुभव के साथ नवाचार को बढ़ावा देंगे, और राज्य जैसे केरल, बिहार और अन्य में पहले से ही 40,000 से ज्यादा प्रोफेशनल्स की वापसी देखी जा रही है। इस स्थिति से भारत की अर्थव्यवस्था को लंबे समय में फायदा होगा, लेकिन कंपनियों को अपनी रणनीति बदलनी होगी ताकि वे एल-1 या ओ-1 जैसे वैकल्पिक वीजा विकल्पों का उपयोग कर सकें, जिनकी फीस कम है।