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गुरु नानक जयंती 2025, तिथि, इतिहास, महत्व, उत्सव

गुरु नानक जयंती 2025, जिसे गुरपुरब के नाम से भी जाना जाता है, सिख धर्म का एक सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है, जो सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की जन्म वर्षगांठ को मनाता है। यह त्योहार न केवल गुरु नानक देव जी के जन्म का उत्सव है, बल्कि उनके जीवन के मूल्यों, शिक्षाओं और विरासत को भी जीवंत रूप से याद करने का अवसर प्रदान करता है। 2025 में, गुरु नानक जयंती बुधवार, 5 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी, जो हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार कर्तिक मास की पूर्णिमा तिथि पर आधारित है। यह तिथि प्राचीन काल से ही आध्यात्मिक महत्व रखती आई है, क्योंकि पूर्णिमा का दिन चंद्रमा की पूर्णता के साथ-साथ आंतरिक शांति और दिव्य प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। सिख समुदाय के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सिख धर्म की नींव को मजबूत करने वाले एक महान संत और दार्शनिक के अवतरण की स्मृति को ताजा करता है। गुरु नानक देव जी के संदेश ने न केवल सिखों को एकजुट किया, बल्कि पूरे विश्व में शांति, समानता और भक्ति के सिद्धांतों को फैलाया, जो आज भी प्रासंगिक हैं। इस त्योहार के दौरान, लाखों भक्त न केवल प्रार्थना करते हैं, बल्कि गुरु जी के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने दैनिक जीवन में नैतिकता और सेवा को अपनाने का संकल्प लेते हैं। यह दिन सिख इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो धार्मिक एकता और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देता है।

गुरु नानक जयंती 2025 हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार कर्तिक मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, जो प्रत्येक वर्ष थोड़ा भिन्न तिथि पर पड़ती है, लेकिन 2025 में यह 5 नवंबर को आ रही है। यह दिन सिखों के लिए अपार आध्यात्मिक महत्व रखता है, क्योंकि यह गुरु नानक देव जी की जन्म तिथि को चिह्नित करता है, जिन्होंने सिख धर्म की स्थापना की और एक ऐसे दर्शन को जन्म दिया जो जाति, धर्म और लिंग के भेदभाव को पूरी तरह नकारता है। 2025 में, यह गुरु नानक देव जी की 556वीं जन्म वर्षगांठ को चिह्नित करता है, जो उनके जीवन की लंबी यात्रा और प्रभाव को दर्शाता है। यह त्योहार शांति, एकता और दिव्य सत्य की स्मृति का प्रतीक है, जहां भक्त न केवल गुरु जी के जन्म को मनाते हैं, बल्कि उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं। गुरु नानक के शिक्षण लाखों लोगों को प्रेरित करते रहते हैं, जो जाति, संप्रदाय और धर्म के सामाजिक विभाजनों को समाप्त करने पर केंद्रित हैं। उनका प्रसिद्ध कथन “कोई हिंदू नहीं, कोई मुसलमान नहीं; सभी एक ईश्वर के बच्चे हैं” आज भी सामाजिक सद्भाव की मिसाल है। इस संदेश ने न केवल 15वीं शताब्दी के भारत में सुधार लाया, बल्कि आधुनिक विश्व में भी धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय एकता के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है। त्योहार के दौरान, सिख समुदाय के लोग अपने घरों और गुरुद्वारों को सजाते हैं, विशेष रूप से पीले और नारंगी रंगों से, जो समृद्धि और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक हैं। यह अवसर न केवल धार्मिक है, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध है, जहां पारंपरिक संगीत, नृत्य और कथा वाचन के माध्यम से गुरु जी की कहानियां साझा की जाती हैं।

गुरु नानक देव जी का जीवनी

गुरु नानक देव जी, सिख धर्म के संस्थापक और दस सिख गुरुओं में से पहले, का जन्म 15 अप्रैल 1469 को राय भोई की तलवंडी (अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब) में एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मेहता कलू और माता का नाम तriptा देवी था, जो एक धार्मिक और सादगीपूर्ण परिवार था। बचपन से ही उन्होंने गहन आध्यात्मिकता प्रदर्शित की और सामाजिक असमानताओं पर सवाल उठाए, जैसे कि जाति व्यवस्था और धार्मिक रूढ़िवाद जो उस समय समाज में प्रचलित थे। किशोरावस्था में ही वे स्कूल छोड़कर ध्यान और आत्मचिंतन में लीन हो गए, जो उनके आध्यात्मिक जागरण का प्रारंभिक संकेत था। एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार, 30 वर्ष की आयु में वे बेईन नदी में स्नान करने गए और तीन दिनों तक लापता रहे, जब वे लौटे तो उन्होंने घोषणा की कि उन्होंने ईश्वर का दर्शन प्राप्त किया है और अब वे एक ईश्वर के संदेश को फैलाने के लिए समर्पित हैं। उन्होंने भारत, तिब्बत, अरब, फारस और अन्य भूमियों में व्यापक यात्राएं कीं, जहां उन्होंने विभिन्न धर्मों के विद्वानों से बहस की और एक सार्वभौमिक सत्य की वकालत की। गुरु नानक ने 974 भजन रचे, जो बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किए गए और सिख धर्म के मूल ग्रंथ का आधार बने। उन्होंने करतारपुर साहिब (अब पाकिस्तान में) की स्थापना की, जो सिख समुदाय का पहला केंद्र था, जहां समानता और साझा भोजन की प्रथा शुरू हुई। 1539 में, 70 वर्ष की आयु में उन्होंने देह त्यागी, लेकिन उनकी शिक्षाएं शाश्वत बनी रहीं, जो शांति, सेवा, भक्ति और नैतिक जीवन की प्रेरणा देती हैं। गुरु नानक का जीवन एक क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रतीक है, जिसने मध्यकालीन भारत की धार्मिक और सामाजिक संरचना को चुनौती दी और एक नई आध्यात्मिक परंपरा की नींव रखी।

गुरु नानक देव जी का प्रारंभिक जीवन

गुरु नानक देव जी ने कम उम्र से ही सामाजिक अन्याय, रूढ़िवादी प्रथाओं और समाज में व्याप्त भेदभाव पर सवाल उठाए, जो उस समय के हिंदू और मुस्लिम समाजों में गहराई से जड़ें जमाए हुए थे। उनका जन्म एक खत्री परिवार में हुआ था, लेकिन उन्होंने कभी जातिगत गर्व नहीं किया; इसके विपरीत, वे सभी मनुष्यों की समानता पर जोर देते थे। बचपन में, वे अक्सर जंगलों में जाकर ध्यान लगाते थे और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते थे, जो उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता को दर्शाता था। एक बार, जब उनके पिता ने उन्हें व्यापार सिखाने के लिए 20 रुपये दिए, तो उन्होंने उन्हें एक साधु को दान कर दिया, कहते हुए कि सच्चा व्यापार सत्य और सेवा का है। इस घटना ने उनके परिवार को आश्चर्यचकित कर दिया, लेकिन यह उनके चरित्र की झलक थी। गुरु नानक ने भारत और विदेशी भूमियों, जिसमें तिब्बत, अरब, फारस, श्रीलंका और बांग्लादेश के क्षेत्र शामिल हैं, में व्यापक यात्रा की, जहां उन्होंने विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों से सीखा और अपने संदेश को साझा किया। इन यात्राओं को उदासियां कहा जाता है, जो लगभग 20 वर्षों तक चलीं और उन्हें हजारों अनुयायी मिले। उनका संदेश सिख धर्म की नींव रखता है, जो बाद के नौ गुरुओं द्वारा औपचारिक रूप दिया गया और गुरु ग्रंथ साहिब के रूप में संकलित हुआ। उनका आध्यात्मिक संदेश तीन मुख्य सिद्धांतों पर आधारित था, जो सिख जीवन का आधार बन गए:

  • नाम जपना: ध्यान और प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर को याद करना, जो आंतरिक शांति और दिव्य संबंध स्थापित करता है। यह सिद्धांत दैनिक जीवन में निरंतर भक्ति को प्रोत्साहित करता है, जैसे कि सुबह-शाम कीर्तन गाना।
  • किरत करना: कठिन परिश्रम से ईमानदार जीविका कमाना, जो आलस्य और अनैतिक साधनों को नकारता है। गुरु जी स्वयं खेती और व्यापार से जुड़े रहे, जो श्रम की गरिमा सिखाता है।
  • वंड छकना: अपनी संपत्ति और आशीर्वादों को दूसरों के साथ साझा करना, जो लंगर प्रथा का मूल है। यह सिद्धांत स्वार्थ को त्यागकर सामूहिक कल्याण को बढ़ावा देता है, जो आज भी सिख समुदाय की पहचान है।

ये सिद्धांत न केवल धार्मिक हैं, बल्कि व्यावहारिक जीवन दर्शन हैं जो आधुनिक समाज में भी लागू होते हैं।

गुरु नानक जयंती 2025 का उत्सव

गुरु नानक जयंती भारत भर और विश्व भर के सिख समुदायों में गहन भक्ति और उत्साह के साथ मनाई जाती है, जो धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयामों को समेटे हुए है। उत्सव आमतौर पर तीन दिनों तक चलते हैं, जो अखंड पाठ से शुरू होते हैं, जो गुरु ग्रंथ साहिब का 48 घंटे का निरंतर पाठ है। यह पाठ गुरुद्वारों में विशेष रूप से आयोजित किया जाता है, जहां स्वयंसेवक बारी-बारी से ग्रंथ का पाठ करते हैं, जो समुदाय की एकता और समर्पण को दर्शाता है। अखंड पाठ के दौरान, भक्त रात-दिन जागरण में भाग लेते हैं, प्रार्थनाएं करते हैं और गुरु जी की शिक्षाओं पर चिंतन करते हैं।

गुरपुरब से एक दिन पहले, नगर कीर्तन (धार्मिक जुलूस) निकाला जाता है, जो शहर की मुख्य सड़कों पर आयोजित होता है। जुलूस पंज प्यारे (पांच प्रियजनों) द्वारा नेतृत्व किया जाता है, जो खालसा परंपरा का प्रतीक हैं, और वे तलवारें या धार्मिक प्रतीक लिए होते हैं। जुलूस में भजन गायन, मार्शल आर्ट प्रदर्शन (गटका) और आध्यात्मिक जापों के साथ-साथ फूलों से सजी झांकियां होती हैं, जो गुरु नानक के जीवन की घटनाओं को दर्शाती हैं। महिलाएं और बच्चे भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, जो समानता के सिद्धांत को जीवंत बनाता है। यह जुलूस न केवल धार्मिक है, बल्कि सामाजिक संदेश भी देता है, जैसे कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय पर।

मुख्य दिन पर, भक्त गुरुद्वारों में इकट्ठा होते हैं, प्रार्थना अर्पित करने, भजनों (कीर्तन) सुनने और लंगर में भाग लेने के लिए, जो सभी के लिए खुला सामुदायिक भोजन है और समानता तथा विनम्रता का प्रतीक है। लंगर में हजारों लोग एक साथ भोजन करते हैं, बिना किसी भेदभाव के, जो गुरु नानक के संदेश को व्यावहारिक रूप देता है। प्रमुख गुरुद्वारे जैसे गोल्डन टेम्पल (अमृतसर), गुरुद्वारा बंगला साहिब (दिल्ली) और ननकाना साहिब (पाकिस्तान) में हजारों भक्तों द्वारा भव्य उत्सव आयोजित किए जाते हैं, जहां विशेष प्रकाश व्यवस्था, संगीत कार्यक्रम और व्याख्यान होते हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में, सरोवर के आसपास दीप जलाए जाते हैं और रात भर कीर्तन चलता है। दिल्ली में, बंगला साहिब गुरुद्वारा में विशेष लंगर आयोजन होते हैं, जबकि पाकिस्तान के ननकाना साहिब में अंतरराष्ट्रीय तीर्थयात्री आते हैं। ये उत्सव न केवल सिखों के लिए, बल्कि सभी धर्मों के लोगों के लिए खुले होते हैं, जो अंतरधार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, आधुनिक समय में वर्चुअल कीर्तन और ऑनलाइन प्रसारण के माध्यम से वैश्विक सिख समुदाय जुड़ता है।

गुरु नानक जयंती 2025 का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

गुरु नानक जयंती का उत्सव सदियों पुराना है, जो सिख गुरुओं द्वारा संस्थापक के जन्म को सम्मानित करने के लिए शुरू किया गया था और सिख परंपरा का अभिन्न हिस्सा बन गया। प्रारंभिक दिनों में, यह उत्सव छोटे समुदायिक सभाओं के रूप में मनाया जाता था, लेकिन समय के साथ यह एक बड़े पैमाने का त्योहार बन गया। अखंड पाठ और नगर कीर्तन की परंपरा समय के साथ विकसित हुई, जो शास्त्रों के सामूहिक पाठ और गुरु के शिक्षणों को जनता तक फैलाने पर जोर देती है। अखंड पाठ की शुरुआत गुरु नानक के समय से ही हुई, जब वे स्वयं ग्रंथों का पाठ करते थे, और यह परंपरा गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित गुरु ग्रंथ साहिब के साथ मजबूत हुई। नगर कीर्तन की प्रथा गुरु हरगोबिंद के समय से प्रचलित हुई, जो सिखों की सैन्य और आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती है। यह त्योहार गुरु गोबिंद सिंह जी, दसवें गुरु द्वारा 1699 में खालसा पंथ की स्थापना के बाद और अधिक प्रमुखता प्राप्त हुई, जब सिख समुदाय एक संगठित शक्ति के रूप में उभरा। खालसा की स्थापना ने गुरपुरब को एक सामूहिक पहचान दी, जहां पंज प्यारे की भूमिका केंद्रीय हो गई।

गुरपुरब उत्सव की निरंतरता सिख धर्म की अटूट आध्यात्मिक वंशावली और सामूहिक समुदाय जीवन (संगत और पंगत) पर उसके जोर को प्रतिबिंबित करती है। संगत का अर्थ है सत्संग, जहां भक्त एकत्र होकर चर्चा करते हैं, जबकि पंगत लंगर की पंक्ति को संदर्भित करता है, जो समानता सिखाता है। ऐतिहासिक रूप से, ये उत्सव मुगल काल में भी जारी रहे, भले ही सिखों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जो उनकी दृढ़ता को दर्शाता है। 19वीं शताब्दी में, ब्रिटिश काल में सिख राज्य के पतन के बाद भी यह परंपरा जीवित रही। आधुनिक भारत में, स्वतंत्रता के बाद यह राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हुआ, और 2019 में 550वीं जयंती पर विशेष आयोजन हुए। यह पृष्ठभूमि दर्शाती है कि कैसे गुरु नानक का संदेश कालातीत है और सिख इतिहास की रीढ़ बना हुआ है।

गुरु नानक देव जी के शिक्षण

गुरु नानक के शिक्षण शाश्वत और वैश्विक रूप से प्रासंगिक बने हुए हैं, जो न केवल सिख धर्म का आधार हैं, बल्कि मानवता के लिए एक सार्वभौमिक दर्शन प्रदान करते हैं। उनकी आध्यात्मिक दर्शन सार्वभौमिक भाईचारा और नैतिक अखंडता को बढ़ावा देता है, जो धार्मिक सीमाओं से परे जाता है। उनके छंद, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं, सिख दर्शन का मूल बनाते हैं और वैश्विक रूप से अनुयायियों का मार्गदर्शन करते हैं। ये छंद विभिन्न भाषाओं में रचे गए हैं, जैसे पंजाबी, ब्रज, संस्कृत और फारसी, जो उनकी व्यापक पहुंच को दर्शाते हैं। गुरु नानक ने कभी कोई लिखित ग्रंथ नहीं बनाया, लेकिन उनके शब्दों को भाई मरदाना जैसे साथियों ने संरक्षित किया। उनके प्रमुख शिक्षणों में शामिल हैं:

  • ईश्वर की एकता: केवल एक सार्वभौमिक सृष्टिकर्ता है, जो “एक ओंकार” के रूप में जाना जाता है। यह सिद्धांत बहुदेववाद को नकारता है और सभी धर्मों की एकता पर जोर देता है।
  • मानवता की समानता: सभी मनुष्य जाति, संप्रदाय, लिंग या धर्म की परवाह किए बिना समान हैं। गुरु जी ने महिलाओं को गुरुद्वारे में प्रवेश और कीर्तन गाने का अधिकार दिया, जो क्रांतिकारी था।
  • मानव सेवा: सच्ची पूजा दूसरों की सेवा में निहित है, न कि मूर्तिपूजा या तीर्थयात्रा में। सेवा को वे “सेवा” कहते थे, जो बिना स्वार्थ के की जाती है।
  • अंधविश्वास का त्याग: विश्वास सत्य में निहित होना चाहिए, न कि रीति-रिवाजों में। उन्होंने मृत्यु के बाद के कर्मकांडों को व्यर्थ बताया और जीवंत जीवन पर फोकस किया।
  • पर्यावरण का सम्मान: गुरु नानक ने वायु, जल और पृथ्वी को सृष्टि के पवित्र तत्वों के रूप में माना, जो प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी सिखाता है।
  • ईमानदार जीविका: धर्मसंगत साधनों से कमाना पूजा का कार्य है, जो भ्रष्टाचार और शोषण को रोकता है।

ये शिक्षण न केवल सैद्धांतिक हैं, बल्कि व्यावहारिक हैं, जो सिखों को एक नैतिक और सक्रिय जीवन जीने के लिए प्रेरित करते हैं। आधुनिक संदर्भ में, ये संदेश जलवायु परिवर्तन, सामाजिक न्याय और वैश्विक शांति के लिए प्रासंगिक हैं।

गुरु नानक जयंती 2025 गुरुद्वारों पर

गुरु नानक देव जी का जीवन कई पवित्र स्थलों से जुड़ा है जो अपार ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व रखते हैं, और ये गुरुद्वारे गुरु नानक जयंती के दौरान लाखों भक्तों का केंद्र बन जाते हैं। ये स्थल न केवल धार्मिक तीर्थ हैं, बल्कि गुरु जी की यात्राओं और शिक्षाओं के जीवंत साक्ष्य हैं। प्रत्येक गुरुद्वारा अपनी अनूठी कहानी रखता है और विशेष उत्सवों के दौरान अतिरिक्त सजावट और कार्यक्रमों से भर जाता है।

  • ननकाना साहिब (पाकिस्तान): गुरु नानक देव जी का जन्मस्थान, जहां उनका जन्मकुंड आज भी मौजूद है। यहां विशेष प्रार्थनाएं और झंडा चढ़ाई होती है, और भारतीय तीर्थयात्री करतारपुर कॉरिडोर के माध्यम से आते हैं।
  • गुरुद्वारा करतारपुर साहिब (पाकिस्तान): 1522 में गुरु नानक द्वारा स्थापित, जहां उन्होंने अपने अंतिम वर्ष बिताए और सिख समुदाय की नींव रखी। यह स्थल “गुरु की बेर” के पेड़ के लिए प्रसिद्ध है, और जयंती पर वैश्विक प्रसारण होते हैं।
  • गुरुद्वारा नानक झीरा साहिब (बिदर, कर्नाटक): उनके दक्षिणी यात्राओं से जुड़ा, जहां एक कुएं का पानी चमत्कारी माना जाता है। यहां स्थानीय उत्सवों में दक्षिण भारतीय परंपराएं मिश्रित होती हैं।
  • गोल्डन टेम्पल (अमृतसर): सबसे पवित्र सिख तीर्थ, जहां गुरु ग्रंथ साहिब स्थायी रूप से विराजमान है। जयंती पर यहां लाखों भक्त आते हैं, और अखंड पाठ के साथ-साथ प्रकाश दिवा जलाए जाते हैं।

ये गुरुद्वारे संरक्षण के प्रयासों से जुड़े हैं, जैसे यूनेस्को की मान्यता, और जयंती पर सुरक्षा और सुविधाओं की विशेष व्यवस्था की जाती है।

गुरु नानक जयंती 2025 का सामाजिक प्रासंगिकता

गुरु नानक का सामाजिक समानता, सहिष्णुता और विनम्रता का संदेश आधुनिक भारत में गहन प्रासंगिकता रखता है, जहां सामाजिक चुनौतियां अभी भी विद्यमान हैं। उनके शिक्षण जातिगत भेदभाव, लिंग असमानता और धार्मिक असहिष्णुता जैसी चुनौतियों का मुकाबला करते हैं, जो आज के समाज में विभाजन पैदा करती हैं। उदाहरण के लिए, लंगर प्रथा गरीबी और भूख के खिलाफ एक मजबूत हथियार है, जो कोविड-19 महामारी के दौरान लाखों लोगों को भोजन प्रदान करके साबित हुई। समुदाय सेवा (सेवा) और लंगर में प्रतिबिंबित समानता के सिद्धांत समावेशिता के प्रतीक बने हुए हैं, जो शहरीकरण और वैश्वीकरण के दौर में एकजुटता की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

भारत भर के सरकारी संस्थानों और शैक्षिक निकायों में गुरु नानक जयंती सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सेमिनारों और जागरूकता अभियानों के माध्यम से मनाई जाती है, जो अंतरधार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं। स्कूलों में बच्चों को गुरु जी की कहानियां पढ़ाई जाती हैं, जबकि विश्वविद्यालयों में उनके दर्शन पर शोध होते हैं। संस्कृति मंत्रालय और पंजाब सरकार नियमित रूप से गुरु नानक की विरासत से संबंधित विरासत परियोजनाओं को वित्तपोषित करती हैं, जिसमें ऐतिहासिक गुरुद्वारों का संरक्षण, सिख पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण और म्यूजियम स्थापना शामिल है। उदाहरण के लिए, 2025 में डिजिटल आर्काइव परियोजनाएं शुरू हो सकती हैं। ये प्रयास न केवल सांस्कृतिक धरोहर को बचाते हैं, बल्कि युवा पीढ़ी को गुरु नानक के संदेश से जोड़ते हैं, जो सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर फोकस करते हैं।

गुरु नानक का साहित्य और दर्शन पर प्रभाव

गुरु नानक के शिक्षण भारतीय आध्यात्मिक साहित्य का अभिन्न अंग हैं, जो भक्ति आंदोलन को नई दिशा प्रदान करते हैं। उनके छंद, जो पंजाबी, हिंदी, फारसी और संस्कृत में रचे गए हैं, गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं और सिख साहित्य का आधार हैं। ये भजन गहन दार्शनिक और नैतिक अंतर्दृष्टि प्रतिबिंबित करते हैं, जो भक्ति और सूफी परंपराओं को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, कबीर और अन्य भक्ति संतों ने गुरु नानक के विचारों से प्रेरणा ली, जबकि सूफी संतों के साथ उनकी बहसें एकता का संदेश देती हैं। जपजी साहिब, उनकी मुख्य रचना, 38 पौड़ियों में विभाजित है और आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन करती है।

जपजी साहिब में, गुरु नानक जोर देते हैं कि आध्यात्मिक मुक्ति सच्चे जीवित रहने से आती है, न कि मात्र रीति-रिवाजों से। उन्होंने कर्म, ध्यान और सेवा को मुक्ति का मार्ग बताया। उनका तर्क, नैतिकता और करुणा पर जोर भारत भर के सुधार आंदोलनों और दार्शनिकों को प्रभावित करता रहा है, जैसे कि आर्य समाज और ब्रह्म समाज। आधुनिक दार्शनिकों ने उनके विचारों को गांधीजी के अहिंसा सिद्धांत से जोड़ा। गुरु नानक का साहित्य न केवल धार्मिक है, बल्कि साहित्यिक मूल्यवान भी, जो कविता और संगीत के माध्यम से फैलता है।

गुरु नानक देव जी के पर्यावरण पर शिक्षण

गुरु नानक के शिक्षण सामाजिक न्याय से परे पर्यावरणीय जागररण तक विस्तारित होते हैं, जो उन्हें एक दूरदर्शी संत बनाते हैं। उन्होंने पृथ्वी को पोषण देने वाली मां के रूप में वर्णित किया, मनुष्यों को प्रकृति के साथ सद्भाव बनाए रखने का आग्रह किया। उनका भजन “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत” (वायु गुरु है, जल पिता है, और पृथ्वी महान मां है) पर्यावरणीय नैतिकता का एक प्रारंभिक अभिव्यक्ति माना जाता है, जो प्रकृति के तत्वों को पवित्र मानता है। इस भजन में वे प्रदूषण और शोषण के खिलाफ चेतावनी देते हैं, जो आज के जलवायु संकट से जुड़ता है।

आज, कई गुरुद्वारे गुरु नानक के पर्यावरणीय दृष्टिकोण के अनुरूप सतत प्रथाओं को अपना रहे हैं, जैसे सौर पैनल स्थापित करना, जैविक खेती को प्रोत्साहित करना और शून्य-अपशिष्ट सामुदायिक रसोइयां चलाना। गोल्डन टेम्पल में वर्षा जल संचयन और प्लास्टिक-मुक्त अभियान चलाए जाते हैं। सिख संगठन पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण करते हैं, जो गुरु जी के संदेश को व्यावहारिक बनाता है। ये प्रयास वैश्विक पर्यावरण आंदोलनों से जुड़ते हैं और सिख युवाओं को सक्रिय बनाते हैं।

गुरु नानक जयंती 2025 भारत में

2025 में, भारत भर में भव्य उत्सव आयोजित होंगे, जो सिख आबादी वाले राज्यों में विशेष रूप से भव्य होंगे। प्रमुख जुलूस, भक्ति संगीत कार्यक्रम और लंगर गुरुद्वारों में आयोजित किए जाएंगे, जहां लाखों लोग भाग लेंगे। पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र में विशेष व्यवस्थाएं अपेक्षित हैं, जहां बड़ी सिख आबादी रहती है। पंजाब में, अमृतसर से लेकर तरन तारन तक जुलूस निकलेंगे, जबकि हरियाणा के सिरसा और महाराष्ट्र के नांदेड़ में स्थानीय परंपराएं मिश्रित होंगी।

अमृतसर में गोल्डन टेम्पल को रोशनी, फूलों और निरंतर कीर्तनों से सजाया जाएगा, जहां रात भर अखंड पाठ और संगीत सत्र होंगे। दिल्ली में, गुरुद्वारा बंगला साहिब शांति और विनम्रता के गुरु नानक के संदेश पर जोर देते हुए सामुदायिक सेवा कार्यक्रमों की मेजबानी करेगा, जैसे कि रक्तदान शिविर और शिक्षा जागरूकता। अन्य शहरों जैसे लुधियाना, जालंधर और चंडीगढ़ में सांस्कृतिक मेलों का आयोजन होगा। ये उत्सव स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हैं और पर्यटन को प्रोत्साहित करते हैं।

गुरु नानक जयंती 2025 भारत और विश्व में observance

भारत सरकार गुरु नानक जयंती को राष्ट्रीय उत्सवों के साथ मनाती है, जिसमें छुट्टी घोषित की जाती है और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। 2019 में 550वीं जन्म वर्षगांठ को स्मारक सिक्कों और डाक टिकटों के जारी करने के साथ चिह्नित किया गया था, और 2025 में समान रूप से विशेष आयोजन हो सकते हैं। 2019 में उद्घाटित करतारपुर कॉरिडोर, सीमा-पार शांति का प्रतीक है, जो भारतीय तीर्थयात्रियों को पाकिस्तान के ननकाना साहिब तक वीजा-मुक्त पहुंच प्रदान करता है। इस कॉरिडोर ने हजारों तीर्थयात्रियों को जोड़ा और भारत-पाकिस्तान संबंधों में सकारात्मक कदम साबित हुआ।

वैश्विक रूप से, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में सिख समुदाय विशेष प्रार्थनाओं, परेडों और सेमिनारों का आयोजन करते हैं, जो गुरु नानक के सार्वभौमिक सद्भाव के संदेश को बढ़ावा देते हैं। टोरंटो और लंदन में बड़े जुलूस होते हैं, जबकि न्यूयॉर्क में सांस्कृतिक शो आयोजित होते हैं। संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को ने विश्व शांति और सामाजिक सुधार में उनके योगदान को मान्यता दी है, और 2025 में वैश्विक वेबिनार हो सकते हैं। ये observance सिख डायस्पोरा की एकता को मजबूत करते हैं।

गुरु नानक जयंती 2025 यूपीएससी

गुरु नानक देव जी का जीवन और संदेश मानवता को सत्य, सरलता और सेवा की ओर मार्गदर्शन करता रहता है, जो सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए प्रासंगिक है। उनके शिक्षण धार्मिक सीमाओं से परे जाते हैं और सार्वभौमिक शांति को बढ़ावा देते हैं, जो भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक अध्ययन के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए, गुरु नानक का जीवन सामाजिक सुधार, धार्मिक सहिष्णुता और नैतिक शासन के उदाहरण के रूप में महत्वपूर्ण है। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय (अमृतसर) और पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड जैसी संस्थाएं उनके दर्शन को अनुसंधान और शिक्षा के माध्यम से सक्रिय रूप से बढ़ावा देती हैं, जो शोध पत्रों और कोर्सों में उपयोगी हैं।

गुरु नानक जयंती का सार निस्वार्थ सेवा, दिव्य की स्मृति और लोगों में एकता में निहित है। जैसे ही भारत गुरु नानक जयंती 2025 मनाता है, राष्ट्र उनके शाश्वत संदेश को पुनः पुष्टि करता है- “एक ओंकार सतनाम”, एक ईश्वर है, और सत्य उसका नाम है। यह संदेश न केवल धार्मिक है, बल्कि राष्ट्रीय एकता और वैश्विक शांति के लिए प्रेरणा स्रोत है।

यह जानकारी एन. डी. टी. वी. और हिंदुस्तान टाइम्स से एकत्र की गई है।