त्यौहार

‘हरित’ दिवाली के बावजूद दिल्ली में जहरीली धुंध

भारत की राजधानी दिल्ली मंगलवार सुबह जहरीली धुंध की मोटी चादर में लिपटी हुई दिखाई दी, जब हिंदू त्योहार दिवाली के बाद हवा की गुणवत्ता तेजी से बिगड़ गई। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश के बावजूद, जिसमें कम प्रदूषण फैलाने वाले ‘ग्रीन पटाखों’ का सीमित इस्तेमाल करने को कहा गया था, लोग सोमवार रात देर तक आतिशबाजी करते रहे। इस अवहेलना ने शहर की हवा को और अधिक जहरीला बना दिया, जिससे सांस लेना मुश्किल हो गया।​

दिवाली का यह पर्व न केवल हिंदुओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि सिख और जैन समुदाय भी इसे उत्साह से मनाते हैं। त्योहार की रात को प्रकाश और खुशियों का प्रतीक माना जाता है, लेकिन इस बार पटाखों के धुएं ने खुशियां धुंध में बदल दीं। विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली की हवा पहले से ही प्रदूषित थी, और दिवाली की आतिशबाजी ने इसे ‘गंभीर’ स्तर तक पहुंचा दिया। शहर के अधिकांश इलाकों में दृश्यता कम हो गई, और लोग घरों में कैद हो गए।​

अदालत का आदेश और पटाखों का अनियंत्रित इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह 2020 से लागू पूर्ण पटाखा प्रतिबंध को कुछ हद तक ढीला किया, लेकिन सख्त शर्तों के साथ। केवल NEERI (नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट) द्वारा प्रमाणित ‘ग्रीन पटाखे’ ही बेचने और फोड़ने की अनुमति दी गई, जो पारंपरिक पटाखों से 30-50% कम प्रदूषण फैलाते हैं। इनमें कम रासायनिक पदार्थ होते हैं, जो ध्वनि और राख को भी न्यूनतम रखते हैं। कोर्ट ने QR कोड वाली पैकेजिंग अनिवार्य की, ताकि नकली पटाखों को रोका जा सके।​

बिक्री केवल नामित दुकानों पर 18 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक सीमित रखी गई, और फोड़ने का समय भी तय किया गया – शनिवार से मंगलवार तक सुबह 6 से 7 बजे और शाम 8 से 10 बजे तक। पुलिस गश्त और निगरानी की व्यवस्था की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर यह आदेश पूरी तरह लागू नहीं हो सका। बीबीसी और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बाजारों में पारंपरिक पटाखे खुले आम बिक रहे थे, और रात 12 बजे के बाद भी आतिशबाजी की आवाजें गूंजती रहीं। व्यापारियों ने बताया कि इस साल ग्रीन पटाखों की मांग बढ़ी, लेकिन कुल बिक्री में पारंपरिक वाले भी शामिल थे, जिससे प्रदूषण नियंत्रण की कोशिशें नाकाम रहीं।​

आलोचकों का मानना है कि ग्रीन पटाखे भले ही कम हानिकारक हों, लेकिन वे भी PM2.5, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य जहरीले गैसों को हवा में छोड़ते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि ऐसी छूट से लोगों में प्रदूषण के प्रति जागरूकता कम हो सकती है, जो पिछले कुछ वर्षों में बढ़ रही थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विपक्षी नेता शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की, “सरकार ने पटाखे जलाने के अधिकार को सांस लेने के अधिकार पर तरजीह दी है।”​

साल भर बनी रहने वाली प्रदूषण की समस्या

दिल्ली में हवा की खराब गुणवत्ता कोई नई बात नहीं है; यह साल भर बनी रहती है। मुख्य कारणों में वाहनों से निकलने वाला धुआं शामिल है, जहां शहर में 1 करोड़ से अधिक गाड़ियां हैं, जो रोजाना लाखों लीटर ईंधन जलाती हैं। धूल भरी सड़कें, निर्माण कार्य और ध्वस्तीकरण से उड़ने वाली मिट्टी भी हवा को प्रदूषित करती है। इसके अलावा, औद्योगिक इकाइयां और कोयला आधारित बिजली संयंत्र आसपास के क्षेत्रों से धुआं लाते हैं।​

दिवाली से पहले ही, पिछले एक सप्ताह से AQI 300 के ऊपर था, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। मंगलवार सुबह शहर का औसत AQI 350 से 442 तक पहुंच गया, जो IQAir के अनुसार दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में दिल्ली को शीर्ष पर ले आया। 38 निगरानी स्टेशनों में से 36 ‘रेड जोन’ में थे, जहां AQI 300 से ऊपर था। सबसे प्रभावित इलाके द्वारका (417), आशोक विहार (404), वजीरपुर (423), आनंद विहार (360), बवाना (445), ITO (347), लोधी रोड (327), नॉर्थ कैंपस (363) और इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (313) रहे।​

AQI मुख्य रूप से PM2.5 कणों पर आधारित होता है, जो 2.5 माइक्रोन से छोटे होते हैं और फेफड़ों में घुसकर सांस की बीमारियां, हृदय रोग, कैंसर और यहां तक कि मौत का कारण बन सकते हैं। श्रेणियां इस प्रकार हैं 0-50 अच्छा, 51-100 संतोषजनक, 101-200 मध्यम, 201-300 खराब, 301-400 बहुत खराब, और 401-500 गंभीर। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देशों के मुताबिक, 24 घंटे में PM2.5 की सीमा 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होनी चाहिए, लेकिन दिल्ली में यह 488 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया – यानी 32 गुना अधिक। बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा रोगियों के लिए यह खासतौर पर घातक है।​

सर्दियों में प्रदूषण का और बिगड़ना: मौसमी और मानवीय कारक

सर्दियों का मौसम दिल्ली के लिए प्रदूषण का सबसे कठिन समय होता है। अक्टूबर-नवंबर से ठंड बढ़ने पर हवा की गति कम हो जाती है, जिससे प्रदूषक निचली वायुमंडल में फंस जाते हैं। तापमान उलटा (टेम्परेचर इन्वर्शन) होने से ठंडी हवा नीचे जम जाती है, और प्रदूषण ऊपर नहीं उठ पाता। मिश्रित परत (मिक्सिंग हाइट) की ऊंचाई घटकर 200-300 मीटर रह जाती है, जबकि गर्मियों में यह 2 किलोमीटर तक होती है।​

पड़ोसी राज्यों पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान पराली (फसल अवशेष) जलाते हैं, जो दिल्ली तक धुआं ला देता है। इस साल अक्टूबर में ही पराली जलाने की घटनाएं 50% बढ़ गईं, जिससे PM2.5 का स्तर तेजी से चढ़ा। दिवाली के पटाखों ने इस धुएं को और गहरा कर दिया। इसके अलावा, कोयला जलाने वाले संयंत्र, ट्रक ट्रैफिक और घरेलू ईंधन का इस्तेमाल भी योगदान देता है। विशेषज्ञों के अनुसार, दिवाली के बाद का यह प्रदूषण पीक 2021 के बाद सबसे ऊंचा है, जब AQI 500 के करीब पहुंचा था।​

मौसम विभाग ने अनुमान लगाया है कि अगले कुछ दिनों में हवा की गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ से ‘खराब’ के बीच रहेगी, AQI 201-400 के दायरे में। कम हवा और नमी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।​

ग्रीन पटाखों पर बहस और जागरूकता की चुनौतियां

2020 से दिल्ली-NCR में दिवाली पर पटाखा प्रतिबंध था, ताकि प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। लेकिन जमीनी स्तर पर प्रवर्तन कमजोर रहा, और दुकानें चोरी-छिपे पटाखे बेचती रहीं। इस साल की छूट को कुछ लोग सांस्कृतिक अधिकारों से जोड़ते हैं, लेकिन पर्यावरणविद् इसे गलत कदम मानते हैं। ग्रीन पटाखों का विकास राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा किया गया, जो ध्वनि को 110 डेसिबल तक सीमित रखते हैं और बैरियम नाइट्रेट जैसे हानिकारक रसायनों को हटाते हैं। फिर भी, वे भी प्रदूषण फैलाते हैं, और पूर्ण प्रतिबंध ही समाधान है।​

विशेषज्ञ चिंतित हैं कि ऐसी छूट से वर्षों की जागरूकता अभियान बेकार हो जाएंगे। स्कूलों और मीडिया के माध्यम से चले कैंपेन ने लोगों को मास्क और एयर प्यूरीफायर के प्रति जागरूक किया, लेकिन अब फिर से पुरानी आदतें लौट रही हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी समस्या है; संसद को सौंपी रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण मंत्रालय ने पिछले साल के 100 मिलियन डॉलर बजट का केवल 20% इस्तेमाल किया। जबकि बीजिंग ने समान चुनौतियों का सामना करते हुए कड़े उपायों से सुधार किया, दिल्ली में अभी भी वही पुरानी समस्या बनी हुई है।​

सरकारी कदम और GRAP का क्रियान्वयन

दिवाली से पहले ही प्रदूषण बढ़ने पर रविवार को ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के दूसरे चरण को सक्रिय किया गया। इसमें डीजल जनरेटर, कोयला और लकड़ी जलाने पर पूर्ण पाबंदी लगा दी गई। निर्माण कार्यों को सीमित किया गया, और पुराने वाहनों पर सख्ती बरती जा रही है। दिल्ली सरकार कृत्रिम वर्षा (आर्टिफिशियल रेन) की योजना बना रही है, जिसमें क्लाउड सीडिंग तकनीक से बादलों को बारिश के लिए प्रेरित किया जाएगा। यह उपाय प्रदूषकों को जमीन से नीचे धोने में मदद करता है, जैसा कि 2023 में परीक्षण में सफल रहा था।​

अधिकारियों ने सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने और कार पूलिंग की अपील की है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि ये अस्थायी उपाय हैं; स्थायी समाधान के लिए पराली जलाने पर वैकल्पिक तकनीकें जैसे बेलर मशीनें प्रदान करना, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन और उद्योगों में फिल्टर लगाना जरूरी है।​

निवासियों का दैनिक संघर्ष और स्वास्थ्य जोखिम

मंगलवार सुबह नोएडा के निवासी और बीबीसी संवाददाता विकास पांडे ने अपने अनुभव साझा किया। सुबह 6 बजे घर से निकलते ही जलते कोयले जैसी तेज गंध महसूस हुई। हवा धुएं से भरी थी, दृश्यता इतनी कम कि ऊंची इमारतें धुंध में गुम हो गईं। मुंह में राख का कड़वा स्वाद आया, और दिल्ली पहुंचते ही स्थिति और खराब हो गई। पर्यटक वेदांत पचखंडे ने कहा, “मैंने कभी ऐसा नहीं देखा; प्रदूषण के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा।”​

दिल्ली के 3 करोड़ से अधिक निवासी अब इस smog के आदी हो चुके हैं, लेकिन स्वास्थ्य प्रभाव गंभीर हैं। घनी आबादी वाले इलाकों जैसे आनंद विहार और ग्रामीण बाहरी क्षेत्रों में स्थिति एक समान है। लोग बाहर निकलने से कतरा रहे हैं; बच्चे स्कूल न जाने पर मजबूर हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं: N95 मास्क पहनें, घरों में एयर प्यूरीफायर चलाएं, खिड़कियां बंद रखें, और ज्यादा पानी पिएं। लंबे समय तक एक्सपोजर से सांस की बीमारियां, ब्रोंकाइटिस और हृदयाघात का खतरा बढ़ जाता है। WHO के अनुसार, भारत में प्रदूषण से毎年 20 लाख मौतें होती हैं, जिनमें दिल्ली का बड़ा हिस्सा है।​

निवासी परास त्यागी ने बताया, “बाहर कदम रखना असंभव है; धुंध हर जगह फैली हुई है।” ऐतिहासिक स्थल जैसे लाल किला और अक्षरधाम भी काले धुएं में ढके नजर आ रहे हैं, जो सांस्कृतिक धरोहर को नुकसान पहुंचा रहा है।​

भविष्य की चुनौतियां और दीर्घकालिक समाधान

दिल्ली का प्रदूषण केवल दिवाली तक सीमित नहीं; यह सर्दी भर बनी रहने वाली समस्या है। विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत है। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, मेट्रो विस्तार, और किसानों को पराली प्रबंधन के लिए सब्सिडी देना महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार है, लेकिन सुधार संभव है अगर सब मिलकर प्रयास करें।

यह जानकारी बी. बी. सी. और एन. डी. टी. वी. से ली गई है।