मुख्य न्यायाधीश पर हमले पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा-अदालतें धार्मिक विचारों के लिए नहीं
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में 6 अक्टूबर 2025 को एक चौंकाने वाली घटना घटी, जब एक वृद्ध वकील ने चीफ जस्टिस बीआर गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की। यह घटना धार्मिक संवेदनाओं से जुड़ी एक पुरानी टिप्पणी से प्रेरित बताई जा रही है, जो अदालत की गरिमा पर सवाल खड़े कर रही है। चीफ जस्टिस गवई, जो अगले महीने रिटायर हो रहे हैं, ने इस दौरान अपनी शांति बनाए रखी और कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया। पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठ वकीलों ने इसकी कड़ी निंदा की है, जबकि हमलावर वकील राकेश किशोर को बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने तुरंत निलंबित कर दिया।
घटना का पूरा विवरण: अदालत में कैसे हुई यह घटना
यह घटना सुप्रीम कोर्ट की कोर्ट नंबर 1 में सुबह करीब 11:35 बजे हुई, जब उल्लेख घड़ी (mentioning hours) चल रही थी। 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर, जो दिल्ली बार काउंसिल से नामांकित हैं (नामांकन नंबर D/1647/2009), ने डैक की ओर बढ़े। उन्होंने अपने स्पोर्ट्स शूज उतारे और चीफ जस्टिस गवई की ओर फेंकने का प्रयास किया। गनीमत रही कि जूता बेंच तक नहीं पहुंचा; कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह चीफ जस्टिस और एक अन्य जज के पास से गुजरते हुए पीछे गिर गया या किसी टेबल पर आ गिरा। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत किशोर को पकड़ लिया और बाहर ले गए।
किशोर ने बाहर जाते हुए नारे लगाए, “हम सनातन धर्म का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे” या “सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान।” चीफ जस्टिस गवई ने इस दौरान पूर्ण संयम बरता। उन्होंने वकीलों से कहा, “इससे विचलित न हों, आप भी न विचलित हों और मामले को आगे बढ़ाएं।” बाद में, उन्होंने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि किशोर के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न की जाए, और यहां तक कि उनका जूता लौटा दिया गया। दिल्ली पुलिस को भी इसकी सूचना दी गई, जिसके बाद किशोर को रिहा कर दिया गया। प्रत्यक्षदर्शी वकीलों ने बताया कि चीफ जस्टिस पर कुछ नहीं गिरा, उन्होंने सिर्फ आवाज सुनी। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि हाथ में जूता था या शायद रोल किया हुआ कागज, लेकिन अधिकांश स्रोत इसे जूता ही मानते हैं।
यह घटना सुप्रीम कोर्ट में सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर करती है, खासकर जब यह एक वकील द्वारा की गई। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन ने बयान जारी कर इसकी निंदा की और कहा कि यह कानूनी पेशे की गरिमा के विरुद्ध है तथा संवैधानिक मूल्यों—सभ्यता, अनुशासन और संस्थागत अखंडता—के खिलाफ है। वकीलों ने किशोर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया।
मुकुल रोहतगी की विस्तृत प्रतिक्रिया: अदालतें धार्मिक मंच नहीं
पूर्व अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने एनडीटीवी को दिए विशेष इंटरव्यू में इस घटना को “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” बताया। उन्होंने कहा कि यह किसी असंतुष्ट मुवक्किल का मामला नहीं है जो 20 साल से मुकदमे लड़ रहा हो, बल्कि एक वकील का है, जो और भी गंभीर है। रोहतगी ने अनुमान लगाया कि किशोर या तो धार्मिक कट्टरपंथी हैं, जो एक महीने पहले चीफ जस्टिस की किसी टिप्पणी से प्रभावित हुए, या फिर अदालत को धार्मिक या राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि किशोर बाहर जाते हुए सनातन धर्म के खिलाफ कुछ न होने की बात कह रहे थे, जो अदालत में अस्वीकार्य है।
रोहतगी ने जोर दिया, “कानून की अदालतें धार्मिक विचारों को प्रचारित करने के लिए नहीं बनी हैं। चाहे वकील करे या कोई और, यह पूरी तरह गलत है।” उन्होंने इसे “पूरी तरह असमझने योग्य” और कानून के अनुसार आपराधिक अवमानना का सबसे गंभीर रूप बताया, जो छह महीने की सजा का प्रावधान रखता है। रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में पिछली हिंसक घटनाओं का जिक्र किया: लगभग 20 साल पहले एक समान घटना हुई थी, और 15-16 साल पहले किसी ने डैक पर जज पर चाकू से हमला करने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं हर 20 साल में एक बार होती हैं, इसलिए सुरक्षा कड़ी रखनी चाहिए ताकि असंतुष्ट तत्व सफल न हों।
जब पूछा गया कि हमलावर को माफ करना सही था, तो रोहतगी ने कहा कि “उदाहरण के तौर पर सजा मिलनी चाहिए थी,” लेकिन चीफ जस्टिस के फैसले को उनकी “परिपक्वता” का प्रतीक माना। उन्होंने जोड़ा कि चीफ जस्टिस के करियर में शायद उन्होंने कई तर्कहीन लोगों को देखा होगा, इसलिए उन्होंने कार्रवाई न करने का फैसला किया। रोहतगी की यह प्रतिक्रिया न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा पर जोर देती है।
अभिषेक मनु सिंघवी की निंदा: लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ पर हमला
कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की, इसे न्यायपालिका की नींव पर प्रहार बताया। एनडीटीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि इसमें मनोविश्लेषण की जरूरत नहीं; यह किसी व्यक्ति—जज ए, जज बी या चीफ जस्टिस एक्स/वाई—के बारे में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ की संस्था के बारे में है। सिंघवी ने कहा कि इसकी प्रतीकात्मकता बहुत गंभीर है, जब आप संस्था को उसके आधार से ही निशाना बनाते हैं। उन्होंने जोर दिया कि इसकी बिना शर्त, सर्वसम्मति से, विचारधारा या शर्तों के बिना निंदा होनी चाहिए, क्योंकि यह संस्था को पक्षपाती मुद्दों और राजनीति से ऊपर रखने के मूल सिद्धांत पर चोट करता है।
सिंघवी ने वकील होने के नाते इसकी और कड़ी आलोचना की “किसी व्यक्ति के लिए यह बुरा है, लेकिन वकील के लिए पूरी तरह असमझने योग्य।” उन्होंने कहा कि वकीलों को पेशेवर जिम्मेदारी से आगे बढ़कर किसी कारण से जुड़ना नहीं चाहिए; वे व्यक्ति या संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं और वहीं रुकना होता है। यही कारण है कि वकीलों के लिए सख्त नियम हैं, और यह अपराध को “सौ गुना बढ़ा देता है।” सोशल मीडिया पर भी सिंघवी ने लिखा, “यह गहराई से विचलित करने वाला और पूरी तरह निंदनीय है। चीफ जस्टिस पर जूता फेंकना व्यक्ति पर नहीं, संस्था की प्रतिष्ठा पर हमला है। ऐसे वकील को सख्त सजा मिलनी चाहिए।”
बार काउंसिल की कार्रवाई: राकेश किशोर निलंबित
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने घटना के कुछ घंटों बाद ही राकेश किशोर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने पत्र जारी कर कहा कि किशोर का आचरण पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानकों तथा अदालत की गरिमा के विरुद्ध है। निलंबन अवधि में किशोर किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल या प्राधिकरण में पेश नहीं हो सकेंगे। बीसीआई ने अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की और 15 दिनों में कारण बताओ नोटिस जारी किया। सभी अदालतों और बार एसोसिएशनों को सूचित किया गया, और किशोर के पहचान पत्र अमान्य कर दिए गए। यह कार्रवाई एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत की गई, जो अदालत में गरिमा बनाए रखने पर जोर देता है।
राकेश किशोर का बचाव: कोई पछतावा नहीं, भगवान का आदेश
निलंबित वकील राकेश किशोर ने अपना कार्य उचित ठहराया और कहा कि उन्हें “कोई पछतावा नहीं।” एएनआई को दिए बयान में उन्होंने कहा, “मैंने यह नहीं किया; भगवान ने किया। चीफ जस्टिस ने सनातन धर्म का मजाक उड़ाया। यह सर्वशक्तिमान का आदेश था, एक क्रिया की प्रतिक्रिया।” किशोर ने बताया कि वे 16 सितंबर 2025 को दायर एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) की सुनवाई से आहत हुए, जहां चीफ जस्टिस ने कहा था, “जाओ और मूर्ति से प्रार्थना करो कि वह अपना सिर खुद बहाल कर ले।” उन्होंने अदालत पर सनातन धर्म से जुड़े मामलों में पूर्वाग्रह का आरोप लगाया, जैसे नूपुर शर्मा केस में “आपने वातावरण खराब कर दिया” जैसी टिप्पणियां। किशोर ने कहा कि वे नशे में नहीं थे; यह उनकी प्रतिक्रिया थी। उन्होंने जोड़ा, “जल्लीकट्टू जैसे मामलों में राहत मिलती है, लेकिन सनातन से जुड़े मुद्दों में मजाक उड़ाया जाता है।”
चीफ जस्टिस गवई की प्रतिक्रिया और स्पष्टीकरण
चीफ जस्टिस गवई ने घटना के बाद कहा कि वे विचलित नहीं हुए और वकीलों को भी न होने को कहा। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि कुछ उनके डैस्क पर नहीं गिरा; उन्होंने सिर्फ आवाज सुनी। पिछले महीने, उन्होंने अपनी टिप्पणियों पर स्पष्ट किया था कि वे गलत समझी गईं और वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उनका समर्थन किया, कहा कि सोशल मीडिया पर गलत सूचना फैली, और चीफ जस्टिस सभी धार्मिक स्थलों का सम्मान करते हैं। मेहता ने कहा, “न्यूटन का नियम कहता है हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है, लेकिन सोशल मीडिया पर असमान प्रतिक्रिया।”
जावरी मंदिर केस का पृष्ठभूमि: धार्मिक संवेदना का केंद्र
यह विवाद मध्य प्रदेश के खजुराहो में जावरी मंदिर के भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त मूर्ति को बहाल करने की याचिका से शुरू हुआ। याचिकाकर्ता राकेश डालाल ने कहा कि मूर्ति मुगल आक्रमणों में क्षतिग्रस्त हुई, लेकिन सरकार ने बहाली नहीं की। चीफ जस्टिस गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की बेंच ने 16 सितंबर को याचिका खारिज कर दी, कहा कि खजुराहो पुरातात्विक स्थल है और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की अनुमति जरूरी। बेंच ने टिप्पणी की, “तुम भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो, तो जाओ और अब देवता से पूछो।” एएसआई ने कहा कि क्षतिग्रस्त मूर्ति को बदलना संरक्षण नियमों के खिलाफ है।
इस टिप्पणी से सोशल मीडिया पर विवाद फैला, जहां चीफ जस्टिस पर हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगा। वकील विनीत जिंदल ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर टिप्पणियां वापस लेने की मांग की, कहा कि यह अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के तहत संरक्षित अधिकार पर चोट है। जिंदल ने कहा कि अदालतें याचिकाओं को स्वीकार या खारिज कर सकती हैं, लेकिन धार्मिक संवेदनाओं का ध्यान रखना चाहिए। यह केस दिखाता है कि धार्मिक मामलों में न्यायिक टिप्पणियां कैसे विवादास्पद हो सकती हैं।
अन्य प्रतिक्रियाएं और व्यापक प्रभाव
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह सोशल मीडिया की गलत सूचना का नतीजा है। वकील रवि शंकर झा जैसे प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि किशोर ने हाथ उठाकर संकेत दिया कि उन्होंने फेंका। अंस तनवीर ने चीफ जस्टिस की शांति की तारीफ की। पूर्व वकील एसोसिएशन ने कहा कि चीफ जस्टिस की उदारता सराहनीय है, जिन्होंने पुलिस कार्रवाई न कराई।
यह घटना न्यायपालिका में धार्मिक हस्तक्षेप, सुरक्षा और सोशल मीडिया के प्रभाव पर बहस छेड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतें धार्मिक मामलों में संवेदनशील रहें, लेकिन वकीलों को पेशेवर सीमाओं का पालन करना चाहिए। ऐसी घटनाएं लोकतंत्र की मजबूती के लिए खतरा हैं, और सख्त दिशानिर्देशों की जरूरत है। चीफ जस्टिस गवई की परिपक्वता ने तनाव कम किया, लेकिन यह सवाल उठाता है कि क्या न्यायिक प्रक्रिया में धार्मिक भावनाओं को संतुलित किया जा सकता है।
यह जानकारी एन. डी. टी. वी. और बी. बी. सी. से ली गई है।
