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“हॉटस्पॉट्स को सुलझाना”: चीन ने ट्रंप के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम के दावे को दोहराया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार किए गए दावों की तरह ही चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भी यह दावा किया है कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिनों के तीव्र सैन्य संघर्ष के दौरान बीजिंग ने दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करवाई।
बीजिंग में आयोजित एक उच्च-स्तरीय संगोष्ठी में उनकी इस घोषणा ने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया है कि “ऑपरेशन सिंदूर” को रोकने और परमाणु टकराव से बचाने वाले असली शक्ति-संतुलनकर्ता कौन थे। भारत ने इस दावे को सख्ती से खारिज करते हुए, अपने पुराने रुख को दोहराया है कि किसी तीसरे पक्ष को द्विपक्षीय विवादों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

चिंगारी: पहलगाम आतंक हमला

यह संकट 22 अप्रैल 2025 को शुरू हुआ जब जम्मू-कश्मीर के भारतीय प्रशासन वाले इलाके में स्थित खूबसूरत पर्यटन केंद्र पहलगाम में पांच सशस्त्र आतंकवादियों ने गोलियां चला दीं।
इस हमले में 26 हिंदू पर्यटकों की मौत हो गई — इसे क्षेत्र में निर्दोष नागरिकों पर वर्षों में सबसे भीषण हमलों में से एक माना गया।
द रेजिस्टेंस फ्रंट नामक संगठन, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी समूह लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक छद्म रूप माना जाता है, ने प्रारंभ में जिम्मेदारी ली, पर बाद में दावा किया कि उनका अकाउंट हैक किया गया था।
पाकिस्तान ने इसे “फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन” बताया, जबकि भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क जैसे LeT और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) को जिम्मेदार ठहराया।

इस नरसंहार के बाद नियंत्रण रेखा (LoC) पर पहले से नाजुक शांति पूरी तरह टूट गई। भारत ने प्रतिक्रिया स्वरूप सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया—इससे तनाव और बढ़ गया और दोनों देशों ने एक-दूसरे के लिए अपने हवाई क्षेत्र बंद कर दिए। सीमावर्ती झड़पें शुरू हो गईं, जबकि खुफिया जानकारी ने आसन्न भारतीय हमले की चेतावनी दी।

ऑपरेशन सिंदूर का आगाज़

भारत की प्रतिक्रिया तेज़ और निर्णायक रही। 7 मई को “ऑपरेशन सिंदूर” शुरू हुआ—”सिंदूर” यानी विवाह की शक्ति का हिंदू प्रतीक, जो दृढ़ता और संकल्प को दर्शाता है।
रात 1:05 बजे, भारतीय मिसाइलों और लोइटरिंग म्यूनिशन्स ने पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (PoK) और पंजाब प्रांत में नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक प्रहार किए।
इन लक्ष्यों में LeT का मुरीदके मुख्यालय, JeM का बहावलपुर परिसर, और कोटली, मुज़फ्फराबाद, व सियालकोट के ठिकाने शामिल थे जहाँ हिज़बुल मुजाहिद्दीन सक्रिय था।

भारतीय अधिकारियों ने इसे “केंद्रित, संतुलित और गैर-विस्फोटक (non-escalatory)” कार्रवाई बताया।
उनका दावा था कि इसमें 100 से अधिक आतंकियों को मारा गया, जबकि किसी भी नागरिक या पाकिस्तानी सैन्य परिसंपत्ति को निशाना नहीं बनाया गया।
राफेल जेट, ब्रह्मोस मिसाइलें, और इजरायली स्कायस्ट्राइकर ड्रोन भारतीय हवाई क्षेत्र से ही लॉन्च किए गए और उन्होंने चीन-निर्मित पाकिस्तानी रक्षा प्रणालियों को जैम कर दिया।

पाकिस्तान ने इसे “नागरिक क्षेत्रों पर युद्धक कार्रवाई” बताया, हताहतों की रिपोर्ट दी और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई।
इसके बाद पाकिस्तान ने राजौरी और पुंछ जैसे भारतीय सीमावर्ती कस्बों पर गोले बरसाए, जिनमें बच्चे समेत कई नागरिक मारे गए और स्कूल व गुरुद्वारे क्षतिग्रस्त हुए।

बढ़ता तनाव: ड्रोन, मिसाइलें और हवाई संघर्ष

इसके बाद इतिहास में पहली बार परमाणु संपन्न राष्ट्रों के बीच प्रमुख ड्रोन युद्ध देखा गया।
पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई में मोर्टार, ड्रोन और मिसाइलों से अमृतसर, जम्मू और सिर्सा जैसे भारतीय ठिकानों को निशाना बनाया।
भारत की S-400 प्रणालियों ने युद्ध का पहला वास्तविक इस्तेमाल किया और अधिकांश मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर दिया, जबकि भारतीय SEAD मिशनों ने लाहौर के पाकिस्तानी रडार तंत्र को निष्क्रिय कर दिया।

7 और 8 मई को हुई हवाई झड़पों में 72 भारतीय बनाम 42 पाकिस्तानी विमान भिड़े—द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सबसे बड़ी हवाई मुठभेड़।
पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने पांच भारतीय विमान गिराए, जिनमें राफेल भी शामिल था, जिसे चीनी J-10 जेट से लॉन्च PL-15 मिसाइलों ने निशाना बनाया।
भारत ने केवल इतना कहा कि “हानियां युद्ध का हिस्सा हैं।”
बठिंडा और पंपोर में राफेल और सुखोई-30 के मलबे दिखाई दिए।

9–10 मई तक दोनों देशों ने एक-दूसरे के वायु ठिकानों को निशाना बनाया।
भारत ने नूर खान, रफीक़ी और भोलारी एयरबेस पर ब्रह्मोस और स्कैल्प मिसाइलों से हमले किए।
पाकिस्तान ने ऑपरेशन बुनयान-उन-मरसोस चलाते हुए दावा किया कि उसने उधमपुर और पठानकोट सहित 26 भारतीय ठिकानों पर प्रहार किए हैं।
साइबर हमलों ने भारतीय नेटवर्क बाधित किए, हालांकि वास्तविक क्षति पर विवाद बना रहा।

एलओसी पर गोलाबारी जारी रही—कुपवाड़ा, उरी और सांबा में दर्जनों लोग मारे गए।
पाकिस्तानी हमलों में 21 नागरिक और 13 भारतीय सैनिकों की जान गई, जबकि भारत की तरफ से 21 नागरिक और 8 सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई।
नूर खान एयरबेस के पास हुए धमाकों से संदेह हुआ कि पाकिस्तान की परमाणु कमान इकाई खतरे में है, जिससे वैश्विक चिंता बढ़ी।

युद्धविराम: द्विपक्षीय या मध्यस्थता से?

10 मई की शाम 5 बजे आईएसटी पर डीजीएमओ हॉटलाइन के जरिये युद्धविराम की घोषणा हुई—यह पाकिस्तान की पहल थी।
भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने पुष्टि की कि यह निर्णय सीधा सैन्य-सेन्य संपर्क के माध्यम से हुआ था और थोड़े समय बाद वाणिज्यिक उड़ानें पुनः प्रारंभ हुईं।

इसके तुरंत बाद बाहरी दावों का दौर शुरू हुआ।
राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा—
“लंबी वार्ताओं के बाद भारत और पाकिस्तान ने पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमति की है।”
उन्होंने दावा किया कि उन्होंने मॉदी और शहबाज़ शरीफ दोनों पर टैरिफ दबाव डालकर परमाणु युद्ध टाल दिया,
और कई वैश्विक मंचों पर इसे दोहराया, भले ही भारत ने बार-बार इनकार किया।

अमेरिकी सीनेटर जेडी वेंस और मार्को रुबियो ने दोनों पक्षों से बातचीत की, जबकि सऊदी अरब, ईरान, यूएई, ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र ने भी संयम की अपील की।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शरीफ ने ट्रंप की प्रशंसा की, जबकि भारत ने जोर दिया कि “किसी तीसरे पक्ष की भागीदारी नहीं थी।”

ट्रंप की जिद और बयानबाज़ी

मई के बाद से ट्रंप लगातार खुद को “शांति निर्माता” बताने में जुटे रहे।
जून में उन्होंने पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर की मेज़बानी की और दावा किया कि “व्यापार दबाव” ने युद्ध को रोका।
अक्टूबर 2025 में उन्होंने इस संकट की तुलना रूस-यूक्रेन युद्ध से की और कहा कि उन्हें “नोबेल पुरस्कार” मिलना चाहिए।

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कॉल में स्पष्ट किया कि युद्धविराम भारत और पाकिस्तान के डीजीएमओ स्तर पर हुई समझौता वार्ता से हुआ, किसी बाहरी दखल के बिना।
भारतीय विपक्ष (कांग्रेस) ने भाजपा सरकार की चुप्पी की आलोचना की, पर नई दिल्ली ने अपने “द्विपक्षीय निर्णय” पर दृढ़ रुख बनाए रखा।

वांग यी की प्रतिध्वनि

30 दिसंबर 2025 को बीजिंग में आयोजित सिम्पोज़ियम ऑन इंटरनेशनल सिचुएशन एंड चाइना’ज़ फॉरेन रिलेशंस में
वांग यी ने चीन को “वैश्विक संकट विजेता” के रूप में पेश करते हुए कहा —
“टिकाऊ शांति के लिए हमने पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव में मध्यस्थता की,”
साथ ही म्यांमार, ईरान परमाणु, फिलिस्तीन-इज़राइल और कंबोडिया-थाईलैंड उदाहरण भी गिनाए।

बीजिंग के सरकारी बयान में यह भी उल्लेख था कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने मई 2025 की कॉल्स में चीन को “मध्यस्थता प्रयासों” के लिए धन्यवाद दिया था।
पर यह ट्रंप के पुराने दावे की झलक थी — चीन भी अब “शांति निर्माता” की छवि गढ़ना चाहता है, खासकर अमेरिका से प्रतिस्पर्धा के दौर में।
हालाँकि भारत के विश्लेषक कहते हैं कि बीजिंग का यह दावा प्रो-पाकिस्तान झुकाव को छुपाने का प्रयास है—
क्योंकि पाकिस्तान के 81% हथियार चीन से आयातित हैं और “सिंदूर” ऑपरेशन के दौरान बीजिंग ने इस्लामाबाद को तकनीकी खुफिया मदद दी थी।

भारत की सख्त प्रतिक्रिया

नई दिल्ली ने फौरन प्रतिक्रिया दी —
“किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं थी। पाकिस्तान ने डीजीएमओ वार्ता के माध्यम से युद्धविराम का अनुरोध किया था।”
विदेश मंत्रालय के मई ब्रीफ़िंग में भी यही रुख दर्शाया गया था।
पूर्व विदेश सचिव मिस्री के युद्धविराम पश्चात नोट्स में भी किसी बाहरी हस्तक्षेप को खारिज किया गया था।
भारतीय विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने वांग यी के दावे को “अजीब” और “राजनयिक अतिशयोक्ति” बताया, जैसे पूर्व में ट्रंप के दावों को खारिज किया गया था।

रणनीतिक पृष्ठभूमि: पाकिस्तान का चीनी जीवनरेखा

चीन के लिए पाकिस्तान का महत्व बहुत गहरा है।
वह उसका सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है और “सिंदूर” संघर्ष के दौरान कई चीनी प्रणालियों का “रियल टाइम फील्ड टेस्ट” हुआ।
भारतीय रक्षा रिपोर्टों के अनुसार, चीनी J-10 लड़ाकू विमान, HQ-9 एंटी-मिसाइल सिस्टम, और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर समर्थन ने पाकिस्तान की मदद की।
भारतीय विश्लेषकों ने इसे सन त्ज़ू की “उधारी तलवार” रणनीति (Borrowed Knife) बताया — यानी दूसरे के हाथ से प्रहार करना।

युद्धविराम के बाद वांग यी ने संवाद की बात जरूर की लेकिन पाकिस्तान की “संप्रभुता” का बचाव भी किया।
भारत इसे एक कथानक युद्ध (narrative warfare) मानता है — जहां चीन खुद को शांति स्थापित करने वाला दिखाते हुए परोक्ष रूप से प्रॉक्सी खतरे को बढ़ावा देता है।

वैश्विक प्रतिक्रिया और भू-राजनीतिक अर्थ

ट्रंप के दावे पाकिस्तान में सराहे गए लेकिन पश्चिम में उनका मज़ाक भी उड़ाया गया।
अब वांग यी का दावा बहुध्रुवीय विश्व-राजनीति की खींचतान को और तेज़ करता है —
जहाँ अमेरिका अपनी टैरिफ पॉलिसी से दबाव डालता है और चीन “कूटनीतिक मध्यस्थता” के ज़रिये संतुलन साधने की कोशिश करता है।

दोनों दावे ही भारत की सिमला समझौते आधारित द्विपक्षीय नीति को चुनौती देते हैं।
युद्धविराम कायम तो है, पर LoC पर छिटपुट फायरिंग जारी है।
इस संकट ने दक्षिण एशिया की परमाणु सुरक्षा सीमाओं की कमजोरियों को उजागर किया और दिखाया कि ड्रोन प्रौद्योगिकी ने अगली पीढ़ी के युद्ध को कैसे बदल दिया है।

कई रणनीतिक विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि ऐसे “मध्यस्थता मिथक” (mediation myths) भरोसे की नींव को कमजोर करते हैं।
भारत के लिए इन दावों को खारिज करना उसकी राष्ट्रीय स्वायत्तता और रणनीतिक आत्मनिर्भरता की रक्षा का हिस्सा है—
खासकर ऐसे समय में जब वह चीन के साथ सीमा समझौतों और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं दोनों में उलझा हुआ है।
वहीं पाकिस्तान ने “यौम-ए-तशक्कुर” (कृतज्ञता दिवस) मनाकर इस संकट के अंत का जश्न मनाया।

आगे का रास्ता: नाज़ुक शांति

2025 के अंत में वांग यी के बयान ने फिर यह रेखांकित कर दिया कि भारत-पाकिस्तान संबंधों की अस्थिरता अब भी कायम है।
आतंकवाद की जड़ें बनी हुई हैं, और कश्मीर अब भी सुलगता हुआ मुद्दा है।
वास्तविक शांति तभी संभव है जब जवाबदेही और द्विपक्षीय संवाद को प्राथमिकता दी जाएगी—
ना कि बाहरी शक्तियों द्वारा “श्रेय की राजनीति” खेली जाएगी।

भारत के लिए ऑपरेशन सिंदूर ने एक नए दमन प्रतिरोध प्रतिरूप (deterrence paradigm) को जन्म दिया,
जहाँ सटीकता और नियंत्रण, अति-विस्तार से अधिक महत्वपूर्ण साबित हुए।
पर अमेरिका और चीन के दावे यह भी दिखाते हैं कि महाशक्ति-प्रतिस्पर्धा अब दक्षिण एशिया की शांतिरचना तक पहुँच चुकी है।
भविष्य की स्थिरता इस “उधार ली गई महिमा” पर नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान की द्विपक्षीय दृढ़ता पर निर्भर करेगी।