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“हम हफ्तों में कैंसर का इलाज कर रहे हैं”: एआई सिंथेटिक प्रोटीन बनाता है जो ट्यूमर का शिकार करते हैं जबकि पारंपरिक तरीकों में वर्षों लगते हैं

कैंसर के इलाज के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति आ रही है, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से व्यक्तिगत इम्यून थेरेपी को बहुत तेजी से तैयार किया जा रहा है। यह नई तकनीक एआई का उपयोग करके ऐसे सिंथेटिक प्रोटीन डिजाइन करती है जो इम्यून सिस्टम को प्रशिक्षित करके कैंसर सेल्स पर सटीक हमला करने में सक्षम बनाते हैं। पारंपरिक तरीकों में प्राकृतिक इम्यून मैच ढूंढने की प्रक्रिया में कई साल लग जाते हैं, क्योंकि इसमें रोगी के ट्यूमर से मेल खाने वाले प्राकृतिक इम्यून सेल्स या प्रोटीन की खोज करनी पड़ती है, जो दुर्लभ और जटिल होती है। लेकिन अब, एआई-आधारित यह विधि पूरे प्रक्रिया को महज हफ्तों में पूरा कर देती है, जिससे वैज्ञानिक सिंथेटिक प्रोटीन बनाकर इम्यून सेल्स को सीधे कैंसर के निशानों पर निर्देशित कर पा रहे हैं। यह प्रगति कैंसर रिसर्च और इलाज में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, क्योंकि यह न केवल समय बचाती है बल्कि इलाज को अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी बनाती है। NY-ESO-1 जैसे कैंसर-टेस्टिस एंटीजन (CTA) पर आधारित यह तकनीक पहले से ही विभिन्न कैंसर प्रकारों में इम्यून रिस्पॉन्स को उत्तेजित करने के लिए जानी जाती है, और एआई इसे और आगे ले जा रही है।

इम्यून सिस्टम को तेजी से प्रशिक्षित करने का तरीका

साइंस जर्नल में हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण रिसर्च से कैंसर इलाज में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। डेनमार्क की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ डेनमार्क (DTU) और अमेरिका की स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एक एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया है जो विशेष रूप से कैंसर प्रोटीन जैसे NY-ESO-1 को निशाना बनाता है। NY-ESO-1 एक कैंसर-टेस्टिस एंटीजन है जो कई प्रकार के ट्यूमर में पाया जाता है, जैसे कि मेलानोमा, ब्रेस्ट कैंसर, लंग कैंसर और सरकोमा में, और यह इम्यून सिस्टम को सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रोटीन की खासियत यह है कि यह सामान्य ऊतकों में नहीं पाया जाता, लेकिन कैंसर सेल्स में दोबारा व्यक्त होता है, जिससे यह इम्यून थेरेपी के लिए आदर्श लक्ष्य बनता है। एआई की मदद से वैज्ञानिकों ने एक मिनीबाइंडर प्रोटीन डिजाइन किया है जो NY-ESO-1 की संरचना से मजबूती से जुड़ता है और इम्यून सिस्टम की क्षमता को बढ़ाता है, ताकि यह कैंसर सेल्स को बेहतर ढंग से पहचान सके और उन पर हमला कर सके। इस प्रक्रिया में एआई कंप्यूटर मॉडल्स का उपयोग करके प्रोटीन की 3D संरचना का विश्लेषण करती है और ऐसे सिंथेटिक संस्करण बनाती है जो प्राकृतिक प्रोटीन से अधिक स्थिर और प्रभावी होते हैं।

इस विधि में, एआई-डिजाइन किए गए प्रोटीन को इम्यून सेल्स, खासकर टी सेल्स, में डाला जाता है, जिससे IMPAC-T सेल्स नामक संशोधित सेल्स बनते हैं। ये IMPAC-T सेल्स NY-ESO-1 से चिह्नित कैंसर सेल्स को पहचानने और उन्हें नष्ट करने में बेहद कुशल साबित हुए हैं। लैबोरेटरी टेस्ट में, इन सेल्स ने कैंसर सेल्स को प्रभावी ढंग से खत्म किया, जबकि स्वस्थ सेल्स पर कोई असर नहीं पड़ा। रिसर्च में शामिल पोस्टडॉक्टरल रिसर्चर क्रिस्टोफर हौरम जोहानसन ने बताया कि एआई से बने ये मिनीबाइंडर लैब में असाधारण प्रदर्शन दिखा रहे हैं, और ये पारंपरिक तरीकों से ज्यादा तेजी से काम करते हैं। इसके अलावा, NY-ESO-1 पर आधारित इम्यून रिस्पॉन्स पहले से ही विभिन्न कैंसर प्रकारों में देखी गई है, जैसे कि गैस्ट्रिक कैंसर में 9.7-11.1% मामलों में, एसोफेजियल कैंसर में 3.9-29.4% में, और मेलानोमा में 9.4% में, जो इसकी उपयोगिता को और मजबूत बनाती है।

डिजिटल ब्लूप्रिंट से कैंसर से लड़ाई

यह एआई सिस्टम केवल ज्ञात कैंसर निशानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रिसिजन मेडिसिन के लिए पूरी तरह नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। वैज्ञानिकों ने इस प्लेटफॉर्म को एक मेटास्टेटिक मेलानोमा पेशेंट के पहले से अज्ञात टार्गेट पर परीक्षण किया, जहां सिस्टम ने सफलतापूर्वक मिनीबाइंडर तैयार किए। यह दिखाता है कि एआई पहले से अटार्गेटेबल कैंसर के लिए भी थेरेपी डिजाइन कर सकता है, जैसे कि दुर्लभ म्यूटेशंस वाले ट्यूमर में। NY-ESO-1 की खोज 1997 में हुई थी, और तब से यह कैंसर इम्यूनोथेरेपी का एक प्रमुख लक्ष्य बना हुआ है, क्योंकि यह स्पॉन्टेनियस ह्यूमरल और सेल्युलर इम्यून रिस्पॉन्स को ट्रिगर करता है।

यह क्षमता कैंसर इलाज को पूरी तरह बदल देती है, क्योंकि अब हर पेशेंट के अनोखे कैंसर मार्कर के आधार पर कस्टम थेरेपी बनाई जा सकती है। डिजिटल मॉडल्स और कंप्यूटेशनल सिमुलेशन की मदद से वैज्ञानिक मौजूदा डेटा की सीमाओं को पार कर जाते हैं और इम्यून सेल उपलब्धता की समस्या को हल करते हैं। DTU के एसोसिएट प्रोफेसर टिमोथी पी. जेनकिंस ने कहा कि यह प्लेटफॉर्म इम्यून सिस्टम के लिए नए टूल्स प्रदान करता है, जो कैंसर सेल्स को लक्षित करने वाली मॉलिक्यूलर कीज को अविश्वसनीय गति से डिजाइन करता है। इसके अलावा, NY-ESO-1 पर आधारित वैक्सीन्स और थेरेपीज, जैसे कि डेंड्राइटिक सेल-आधारित वैक्सीन्स, पेप्टाइड वैक्सीन्स और वायरल वैक्सीन्स, पहले से ही क्लिनिकल ट्रायल्स में हैं, जो सॉलिड ट्यूमर के खिलाफ प्रभावी साबित हो रही हैं।

सुरक्षा बढ़ाने के लिए स्मार्ट स्क्रीनिंग

नई इम्यून थेरेपी विकसित करने में सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वे स्वस्थ सेल्स पर अनजाने में हमला न करें। कैंसर मार्कर अक्सर सामान्य ऊतकों में मौजूद प्रोटीन से मिलते-जुलते होते हैं, जिससे ऑटोइम्यून रिएक्शन या गंभीर साइड इफेक्ट्स का खतरा बढ़ जाता है। इस समस्या को हल करने के लिए रिसर्च टीम ने एक “वर्चुअल सेफ्टी चेक” सिस्टम लागू किया है, जो एआई-आधारित सिमुलेशन पर आधारित है।

“कैंसर इलाज में सटीकता अत्यंत आवश्यक है,” DTU की प्रोफेसर साइन रेकर हैड्रुप ने कहा। इस सिस्टम में, कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से हर मिनीबाइंडर को स्वस्थ सेल्स पर मौजूद pMHCs (पेप्टाइड-मेजर हिस्टोकोम्पैटिबिलिटी कॉम्प्लेक्स) के व्यापक रेंज के खिलाफ टेस्ट किया जाता है। यह पूर्व स्क्रीनिंग हानिकारक डिजाइनों को लैब टेस्टिंग से पहले ही हटा देती है, जिससे थेरेपी की सुरक्षा बढ़ जाती है। डिजाइन चरण में क्रॉस-रिएक्शन की भविष्यवाणी करके, वैज्ञानिक अधिक सुरक्षित और प्रभावी इलाज विकसित कर पाते हैं, जो क्लिनिकल सेटिंग्स में महत्वपूर्ण है। NY-ESO-1 की इम्यूनोजेनिसिटी के कारण, इस पर आधारित थेरेपीज में ऑफ-टार्गेट इफेक्ट्स को कम करने के लिए चेकपॉइंट इनहिबिटर्स के साथ कॉम्बिनेशन भी टेस्ट किए जा रहे हैं।

लैब से पेशेंट तक का सफर

लैब रिजल्ट्स बेहद आशाजनक हैं, लेकिन रिसर्च से क्लिनिकल एप्लीकेशन तक का सफर सावधानीपूर्वक तय करना जरूरी है। जेनकिंस का अनुमान है कि इंसानों में क्लिनिकल ट्रायल्स शुरू होने में करीब पांच साल लगेंगे, क्योंकि सुरक्षा और प्रभावकारिता के लिए व्यापक टेस्टिंग की आवश्यकता है। एक बार ट्रायल्स शुरू होने पर, इलाज का प्रोटोकॉल मौजूदा तरीकों से मिलता-जुलता होगा, जैसे कि कुछ ब्लड कैंसर के लिए इस्तेमाल होने वाले CAR-T थेरेपी में, जहां पेशेंट के इम्यून सेल्स को निकालकर लैब में मॉडिफाई किया जाता है और फिर वापस डाला जाता है।

हालांकि, नई एआई विधि इस प्रक्रिया को और सरल तथा व्यक्तिगत बनाती है। डिजिटल टूल्स की मदद से हर पेशेंट के ट्यूमर मार्कर के लिए परफेक्ट मैच डिजाइन किया जा सकता है, जो सॉलिड ट्यूमर के इलाज को क्रांतिकारी बना सकता है, जहां पारंपरिक इम्यून थेरेपी की सफलता सीमित रही है। यह प्रगति उन कैंसरों के इलाज का रास्ता खोलती है जो पहले अनुपचारित माने जाते थे, और दुर्लभ म्यूटेशंस को भी लक्षित करती है। उदाहरण के लिए, NY-ESO-1 पर आधारित एडॉप्टिव टी सेल थेरेपी ने सरकोमा और मेलानोमा में ट्यूमर बर्डन को 50% तक कम किया है, हालांकि अभी पूर्ण नियंत्रण की चुनौती बनी हुई है।

प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी में नया युग

कैंसर-टार्गेटिंग प्रोटीन को शुरू से डिजाइन करने की क्षमता इम्यूनोथेरेपी में एक निर्णायक मोड़ है। यह ब्रेकथ्रू साबित करता है कि डिजिटल ब्लूप्रिंट से फंक्शनल इम्यून थेरेपी तक का सफर महज हफ्तों में पूरा किया जा सकता है। रिसर्च टीम द्वारा विकसित सिंथेटिक मिनीबाइंडर प्राकृतिक रिसेप्टर्स की तरह कार्य करते हैं और टी सेल्स को उनके निशानों तक सटीक ढंग से निर्देशित करते हैं, जिससे एंटी-ट्यूमर रिस्पॉन्स मजबूत होती है।

लैब सेटिंग्स में टेस्टेड ये इंजीनियर्ड इम्यून सेल्स पारंपरिक तरीकों से बने सेल्स जितने ही प्रभावी हैं, लेकिन विकास प्रक्रिया तेज और सुरक्षित है। निरंतर सुधार के साथ, एआई-पावर्ड तरीके व्यक्तिगत कैंसर इलाज को अधिक सुलभ, सटीक और तेजी से उपलब्ध करा सकते हैं। इम्यूनोथेरेपी का भविष्य अब जैविक समझ से आगे बढ़कर डिजिटल इनोवेशन पर आधारित है, जहां NY-ESO-1 जैसे एंटीजन को वैक्सीन्स, एडॉप्टिव थेरेपी और कॉम्बिनेशन ट्रीटमेंट्स में इस्तेमाल किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, क्लिनिकल ट्रायल्स में NY-ESO-1 वैक्सीन्स ने 57% पेशेंट्स में एंटीजन-स्पेसिफिक टी सेल्स उत्पन्न किए हैं, हालांकि ट्यूमर इम्यून एवेजन को दूर करने के लिए और रिफाइनमेंट की जरूरत है।

जैसे-जैसे कैंसर इलाज में एआई का एकीकरण बढ़ता है, यह प्रिसिजन मेडिसिन के भविष्य पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। आने वाले सालों में ये प्रगतियां ऑन्कोलॉजी और पेशेंट केयर के क्षेत्र को कैसे बदलेंगी?