शी की बैठक पर सभी की नजर, दक्षिण कोरिया के लिए रवाना हुए ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुधवार को दक्षिण कोरिया के लिए रवाना हो रहे हैं, जहां चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी महत्वपूर्ण बैठक का इंतजार है। यह बैठक दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं—अमेरिका और चीन—के बीच छिड़े तीखे व्यापार युद्ध को थामने का एक बड़ा अवसर साबित हो सकती है। ट्रंप का यह दो दिवसीय दौरा दक्षिण कोरिया में अमेरिका के एक प्रमुख और विश्वसनीय सहयोगी देश के रूप में हो रहा है, जो उनकी एशिया यात्रा का तीसरा महत्वपूर्ण चरण है। इससे पहले, मलेशिया में आयोजित क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन में ट्रंप की खूब तारीफ हुई, जहां विभिन्न एशियाई नेताओं ने उनकी कूटनीतिक भूमिका की सराहना की। जापान की प्रधानमंत्री सानाे ताकाइची ने तो उन्हें “शांति निर्माता” तक करार दिया, जो ट्रंप की एशियाई कूटनीति की सफलता का प्रतीक है। लेकिन वैश्विक स्तर पर सभी की नजरें गुरुवार को होने वाली ट्रंप-शी मुलाकात पर केंद्रित हैं, जो छह लंबे वर्षों बाद दोनों नेताओं की पहली आमने-सामने की बैठक होगी।
यह बैठक केवल एक औपचारिक चर्चा नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता का एक निर्णायक मोड़ हो सकती है। अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध ने न केवल वैश्विक बाजारों को हिला दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को भी गंभीर संकट में डाल दिया है। कंपनियां, निवेशक और उपभोक्ता सभी इस युद्ध से प्रभावित हुए हैं, जहां टैरिफ की बढ़ती लागत ने उत्पाद कीमतों को ऊंचा कर दिया और आर्थिक विकास को धीमा कर दिया। रॉयटर्स और एसोसिएटेड प्रेस (एपी) की ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, बीजिंग और वाशिंगटन के वार्ताकारों ने एक प्रारंभिक “ढांचा” पर सहमति जताई है, जो व्यापार बाधाओं को कम करने और बाजार पहुंच बढ़ाने पर आधारित है। अब ट्रंप और शी को एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) शिखर सम्मेलन के साइडलाइन पर ग्योंग्जू शहर में इस ढांचे को अंतिम रूप देकर हस्ताक्षर करने हैं। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के विश्लेषक विलियम यांग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “ट्रंप-शी शिखर सम्मेलन से पहले दोनों देशों के बीच एक स्पष्ट विसंगति नजर आ रही है।” अमेरिका किसी भी तरह के व्यापार सौदे को हासिल करने के लिए उत्सुक है, ताकि ट्रंप इसे अपनी व्यक्तिगत और राजनीतिक जीत के रूप में घोषित कर सकें। वहीं, चीन का फोकस आपसी विश्वास को मजबूत करने, लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों—like तकनीकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा अधिकार—को संभालने और द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को धीरे-धीरे स्थिर करने पर है। विश्व बैंक की 2025 की आर्थिक रिपोर्ट के मुताबिक, यह युद्ध वैश्विक जीडीपी को 1.5 प्रतिशत तक प्रभावित कर चुका है, इसलिए इस बैठक का परिणाम निवेशकों के लिए राहत का संकेत हो सकता है।
जटिल व्यापार संबंध: दक्षिण कोरिया और जापान के साथ गहराती साझेदारी
ट्रंप बुशान शहर में उतरेंगे, जो टोक्यो में बिताए दो दिनों के दौरे से ताजा लौटने के बाद होगा। टोक्यो में जापान की नई कंजर्वेटिव प्रधानमंत्री सानाे ताकाइची ने द्विपक्षीय संबंधों को “स्वर्ण युग” का नाम दिया, जो अमेरिका-जापान सैन्य और आर्थिक गठबंधन की मजबूती को दर्शाता है। ताकाइची की सरकार, जो हाल ही में सत्ता में आई है, ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के अनुरूप व्यापार समझौतों पर जोर दे रही है। डोनाल्ड ट्रंप दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्युंग के साथ ग्योंग्जू में शिखर सम्मेलन करेंगे—यह उनकी दूसरी आमने-सामने की बैठक होगी, जो वाशिंगटन में मात्र दो महीने पहले हुई मुलाकात के बाद आ रही है। इस दौरान चर्चा मुख्य रूप से व्यापार मुद्दों पर केंद्रित रहेगी, क्योंकि अमेरिका और दक्षिण कोरिया—दोनों प्रमुख आर्थिक साझेदार—अभी भी एक व्यापक सौदे पर गतिरोध का सामना कर रहे हैं।
जुलाई 2025 में ट्रंप ने घोषणा की थी कि वाशिंगटन ने दक्षिण कोरियाई आयात पर लगाए गए शुल्कों को 15 प्रतिशत तक कम करने पर सहमति दी है, बदले में सियोल ने 350 अरब डॉलर के बड़े निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। यह निवेश दक्षिण कोरिया की सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्रीज में अमेरिकी बाजारों को मजबूत करने के लिए होगा। हालांकि, ऑटोमोबाइल क्षेत्र पर लगे ऊंचे शुल्क—जो 25 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं—अभी भी बरकरार हैं, और दोनों सरकारें निवेश प्रतिबद्धता की संरचना, जैसे कि समयसीमा, क्षेत्र-विशिष्ट आवंटन और पर्यावरणीय शर्तों पर बंटी हुई हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेन्ट ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार किया कि “इस सौदे में बहुत सारी बारीकियां और तकनीकी विवरण सुलझाने बाकी हैं,” और उन्होंने इसे “जटिल” करार दिया। ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट करके बातचीत में किसी भी “अड़चन” से इनकार किया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। ब्लूमबर्ग की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण कोरिया अमेरिका का सातवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जहां 2024 में द्विपक्षीय व्यापार 170 अरब डॉलर से अधिक रहा। यह साझेदारी न केवल आर्थिक है, बल्कि सुरक्षा के मोर्चे पर भी मजबूत है, खासकर उत्तर कोरिया के खतरे के बीच। कोरियन इकोनॉमिक डेली की रिपोर्ट्स बताती हैं कि दक्षिण कोरिया के निर्यात का 20 प्रतिशत अमेरिका जाता है, इसलिए टैरिफ में कमी से स्थानीय उद्योगों को बड़ी राहत मिलेगी।
विरोध प्रदर्शन: ट्रंप की नीतियों पर स्थानीय असंतोष
ट्रंप के दौरे का स्वाग करने के लिए ग्योंग्जू में कार्यकर्ता एंटी-ट्रंप प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं, जो अमेरिकी नेता की व्यापक शुल्क नीतियों की कड़ी निंदा करेंगे। इन शुल्कों ने वैश्विक व्यापार युद्ध को भड़काया, जिसका असर दक्षिण कोरिया जैसे देशों पर भी पड़ा। प्रदर्शनकारी ट्रंप की “लोभी निवेश मांगों” के खिलाफ उतरेंगे, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को अमेरिकी हितों के अधीन करने जैसी लगती हैं। कोरियन हेराल्ड और योनहाप न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये प्रदर्शन पर्यावरण संरक्षण, श्रम अधिकारों और स्वतंत्र व्यापार पर केंद्रित होंगे। दक्षिण कोरिया में अमेरिकी निवेश निश्चित रूप से बढ़ा है—2024 में 50 अरब डॉलर से अधिक—लेकिन कई नागरिक समूह इसे “शोषणकारी” मानते हैं, क्योंकि यह स्थानीय नौकरियों और संसाधनों पर दबाव डालता है। प्रदर्शनकारी संगठन, जैसे कि कोरियन कन्फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन्स (KCTU), ने चेतावनी दी है कि ट्रंप की नीतियां वैश्विक असमानता को बढ़ावा दे रही हैं। इतिहास गवाह है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी एशियाई देशों में ऐसे विरोध हुए थे, और इस बार भी सुरक्षा बलों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
डीएमजेड पर किम जोंग उन से संभावित मुलाकात: कूटनीतिक रोमांच की ऊंचाई
इस दौरे को और अधिक रोमांचक बनाने वाली खबर यह है कि ट्रंप ने कोरियाई प्रायद्वीप पर रहते हुए उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन को मुलाकात का औपचारिक न्योता दिया है। दोनों नेताओं की आखिरी मुलाकात 2019 में डीमिलिटराइज्ड जोन (DMZ) पर हुई थी, जो दशकों से दो कोरियाओं को अलग करने वाली तनावपूर्ण कोल्ड वॉर सीमा है। DMZ दुनिया की सबसे खतरनाक सीमाओं में से एक है, जहां माइनफील्ड्स, बैरियर और सैन्य चौकियां तैनात हैं। ट्रंप ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि वह किम से मिलना “बहुत पसंद करेंगे” और यहां तक सुझाव दिया कि प्रतिबद्धताएं (सैंक्शन्स) जैसे संवेदनशील मुद्दे चर्चा का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन उत्तर कोरिया ने इस न्योते पर अभी तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। सियोल के अधिकारी इसकी संभावना को लेकर बंटे हुए हैं—कुछ इसे कूटनीतिक सफलता मानते हैं, जबकि अन्य जोखिम भरा बताते हैं।
किम जोंग उन ने पिछले महीने एक भाषण में कहा था कि ट्रंप से उनकी मुलाकातों की “मीठी और सकारात्मक यादें” हैं। उन्होंने वार्ता के लिए खुलापन जताया, लेकिन शर्त रखी कि अमेरिका अपनी “भ्रमपूर्ण” मांग छोड़ दे, जिसमें प्योंगयांग को अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त करने की बात है। एनके न्यूज के संस्थापक और विशेषज्ञ चाड ओ’कैरोल ने एएफपी को दिए इंटरव्यू में कहा, “ट्रंप ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है कि वह मिलना चाहते हैं। अब गेंद पूरी तरह किम जोंग उन के पाले में है।” हालांकि, वर्तमान किम 2019 वाले किम से काफी अलग हैं। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान दोनों के बीच चली कूटनीतिक “मोहब्बत” के बाद, उत्तर कोरिया ने अपनी स्थिति मजबूत की है। रूस से मिले महत्वपूर्ण समर्थन ने इसे नई ताकत दी है—उत्तर कोरिया ने हजारों सैनिकों को मॉस्को की सेनाओं के साथ यूक्रेन युद्ध में लड़ने के लिए भेजा, बदले में हथियार, तकनीक और आर्थिक सहायता प्राप्त की।
कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल यूनिफिकेशन के वरिष्ठ विश्लेषक हॉन्ग मिन ने एएफपी को बताया, “उत्तर कोरिया के पास अब समय का फायदा है और वह पहले जितना अलग-थलग नहीं रहा। व्यक्तिगत संबंधों को दिखाने वाला कोई आश्चर्यजनक घटनाक्रम—जैसे DMZ पर अचानक मुलाकात—संभव है, लेकिन परमाणुकरण (डिन्यूक्लियराइजेशन) जैसी ठोस वार्ता या परिणाम वाली बातचीत की उम्मीद नहीं की जा सकती।” सीएनएन और बीबीसी की ताजा रिपोर्ट्स से सत्यापित है कि उत्तर कोरिया की रूस के साथ बढ़ती सैन्य साझेदारी ने इसकी कूटनीतिक अलगाव को कम किया है। 2025 में उत्तर कोरिया ने कई मिसाइल परीक्षण किए, जो अमेरिकी प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठाते हैं। यह दौरा न केवल व्यापार पर केंद्रित है, बल्कि पूर्वी एशिया की समग्र सुरक्षा वास्तुकला को भी प्रभावित करेगा। यदि ट्रंप-किम मुलाकात होती है, तो यह वैश्विक मीडिया का केंद्र बिंदु बन जाएगी, लेकिन विशेषज्ञ चेताते हैं कि बिना ठोस प्रगति के यह केवल प्रतीकात्मक रहेगी। दक्षिण कोरिया की सरकार ने कहा है कि वह किसी भी कूटनीतिक कदम का स्वाग करेगी, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सतर्क रहेगी।
यह जानकारी एन. डी. टी. वी. और द हिंदू से ली गई है।
