टैक्स गाइडवित्त

भारत में संपत्ति खरीद पर टीडीएस के लिए एक गाइड

घर खरीदना जीवन का बड़ा फैसला है। इसमें बचत लगती है, कर्ज जुड़ता है, कागज बनते हैं और कई बार परिवार की सालों की योजना पूरी होती है। लेकिन इसी खुशी के बीच एक छोटा सा कर नियम कई खरीदार भूल जाते हैं। यह नियम है संपत्ति खरीद पर स्रोत पर कर कटौती।अगर आप भारत में ₹५० लाख या उससे अधिक की अचल संपत्ति खरीद रहे हैं, तो कई मामलों में आपको विक्रेता को पूरा पैसा देने से पहले कर का एक हिस्सा काटना पड़ता है। निवासी विक्रेता के मामले में यह कटौती आम तौर पर एक प्रतिशत होती है। यह नियम धारा १९४-आईए के तहत आता है।

आप विषय-सूची खोल सकते हैं show

यह नियम कठिन नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। देर से कटौती, देर से जमा, गलत पैन, गलत प्रपत्र या अनिवासी विक्रेता के मामले में गलत धारा का इस्तेमाल खरीदार को परेशानी में डाल सकता है। इस गाइड में पूरी बात सरल भाषा में समझाई गई है। आप जानेंगे कि स्रोत कर कटौती कब लगेगी, कितनी कटेगी, किस मूल्य पर कटेगी, कौन जमा करेगा, कौन सा प्रपत्र भरना होगा, प्रपत्र १६बी क्यों जरूरी है, संयुक्त खरीदारों में क्या करना है और कौन सी गलतियां बचानी हैं।

संपत्ति खरीद पर स्रोत कर कटौती क्या है?

संपत्ति खरीद पर स्रोत कर कटौती का मतलब है कि खरीदार विक्रेता को भुगतान करते समय कर का हिस्सा काटता है। फिर वह काटी गई राशि सरकार के पास जमा करता है। यह राशि बाद में विक्रेता के कर खाते में दिखाई देती है। मान लें आपने ₹८० लाख का फ्लैट खरीदा। विक्रेता भारत का निवासी है। ऐसे मामले में सामान्य नियम के तहत आपको ₹८० हजार स्रोत कर कटौती करनी होगी। विक्रेता को ₹७९ लाख २० हजार मिलेंगे और ₹८० हजार सरकार के पास जमा होंगे।

कई खरीदार सोचते हैं कि यह काम विक्रेता करेगा। यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। इस नियम में जिम्मेदारी खरीदार की होती है। खरीदार ने सही समय पर कटौती नहीं की, तो ब्याज और शुल्क भी खरीदार पर आ सकते हैं। इसलिए घर खरीदते समय कर कटौती को आखिरी दिन का काम न मानें। जैसे आप कर्ज, रजिस्ट्री और स्टाम्प शुल्क की योजना बनाते हैं, वैसे ही स्रोत कर कटौती की योजना भी शुरुआत में बना लें।

मुख्य बिंदु आसान अर्थ
लागू धारा धारा १९४-आईए
कटौती की दर एक प्रतिशत
न्यूनतम सीमा ₹५० लाख या उससे अधिक
आधार मूल्य विक्रय मूल्य या स्टाम्प शुल्क मूल्य, जो अधिक हो
कटौती कौन करेगा खरीदार
कर जमा किसके नाम पर दिखेगा विक्रेता
टैन की जरूरत नहीं
पैन की जरूरत हां
पुराने मामलों का प्रपत्र प्रपत्र २६क्यूबी
नए ढांचे का प्रपत्र प्रपत्र १४१, अनुसूची ख

यह नियम कब लागू होता है?

धारा १९४-आईए तब लागू होती है जब खरीदार किसी निवासी विक्रेता से अचल संपत्ति खरीदता है। अचल संपत्ति में घर, फ्लैट, भवन, भूखंड, दुकान, कार्यालय या भवन का हिस्सा शामिल हो सकता है। ग्रामीण कृषि भूमि इस नियम से बाहर रखी गई है। यहां सबसे जरूरी बात है ₹५० लाख की सीमा। यह सीमा सिर्फ समझौते में लिखी कीमत पर नहीं देखी जाती। स्टाम्प शुल्क मूल्य भी देखा जाता है। दोनों में से जो अधिक हो, वही आधार बन सकता है।

उदाहरण के लिए, समझौते में कीमत ₹४८ लाख है। लेकिन स्टाम्प शुल्क विभाग के अनुसार मूल्य ₹५५ लाख है। ऐसे मामले में स्रोत कर कटौती लागू हो सकती है, क्योंकि अधिक मूल्य ₹५० लाख से ऊपर है। अगर विक्रेता अनिवासी भारतीय है, तो एक प्रतिशत वाला सरल नियम लागू नहीं होगा। ऐसे मामले में धारा १९५ देखनी पड़ती है। इसलिए सौदा तय करने से पहले विक्रेता की निवास स्थिति जरूर पूछें और लिखित में लें।

स्थिति कटौती लगेगी या नहीं वजह
फ्लैट ₹७० लाख का है हां सीमा ₹५० लाख से ऊपर है
विक्रय मूल्य ₹४८ लाख, स्टाम्प मूल्य ₹५५ लाख हां स्टाम्प मूल्य अधिक है
संपत्ति ₹४९ लाख, स्टाम्प मूल्य ₹४९.५ लाख नहीं दोनों मूल्य सीमा से कम हैं
ग्रामीण कृषि भूमि नहीं इस धारा से बाहर है
निवासी विक्रेता हां शर्तें पूरी हों तो
अनिवासी विक्रेता अलग नियम धारा १९५ देखनी होगी
वाणिज्यिक संपत्ति हां सीमा पूरी होने पर

आज के बाजार में यह नियम और जरूरी क्यों है?

भारत में संपत्ति की कीमतें धीरे-धीरे ऊपर जा रही हैं। कई शहरों में साधारण फ्लैट भी ₹५० लाख की सीमा पार कर रहे हैं। पहले यह नियम कई लोगों को बड़े शहरों या महंगी संपत्ति से जुड़ा लगता था। अब ऐसा नहीं है। रियल एस्टेट बाजार के हालिया आंकड़े बताते हैं कि उच्च मूल्य वाले घरों की मांग मजबूत है। शीर्ष शहरों में महंगे घरों की बिक्री बढ़ी है। इसका मतलब है कि स्रोत कर कटौती अब ज्यादा खरीदारों के लिए लागू हो सकती है।

मध्यम आय वाले परिवार भी अब ऐसी संपत्ति खरीद रहे हैं जिसकी कीमत ₹५० लाख से ज्यादा है। कर्ज, सह-खरीद, संयुक्त नाम और निर्माणाधीन परियोजनाएं इस नियम को और जरूरी बना देती हैं। कर विभाग भी अब डिजिटल मिलान पर ज्यादा निर्भर है। पैन, वार्षिक कर विवरण, चालान, प्रपत्र और प्रमाणपत्र आपस में मिलाए जाते हैं। अगर खरीदार ने गलत जानकारी भरी, तो विक्रेता को कर श्रेय नहीं मिलेगा और खरीदार को सुधार करना पड़ेगा।

बाजार संकेत खरीदार के लिए अर्थ
घरों की कीमतें बढ़ रही हैं अधिक सौदे ₹५० लाख से ऊपर जा रहे हैं
महंगे घरों की मांग बढ़ी है कर कटौती का दायरा बढ़ रहा है
बड़े शहरों में कीमतें ऊंची हैं मध्यम वर्ग भी इस नियम में आ रहा है
कर मिलान डिजिटल हो गया है पैन और वार्षिक कर विवरण मिलाना जरूरी है
संयुक्त स्वामित्व बढ़ा है कुल मूल्य का नियम समझना जरूरी है
नया प्रपत्र ढांचा आया है तारीख के अनुसार सही प्रपत्र चुनना जरूरी है
कर्ज आधारित खरीद आम है बैंक भुगतान में भी खरीदार जिम्मेदार रहता है

कटौती कितनी होगी और कैसे निकलेगी?

सामान्य तरीका बहुत सीधा है। विक्रय मूल्य और स्टाम्प शुल्क मूल्य की तुलना करें। दोनों में से जो अधिक है, उसी पर एक प्रतिशत स्रोत कर कटौती करें। अगर संपत्ति ₹७५ लाख की है, तो कटौती ₹७५ हजार होगी। अगर विक्रय मूल्य ₹४८ लाख है लेकिन स्टाम्प शुल्क मूल्य ₹५२ लाख है, तो कटौती ₹५२ हजार होगी।

अगर विक्रेता पैन नहीं देता, तो मामला गंभीर हो जाता है। ऐसी स्थिति में बीस प्रतिशत तक कटौती करनी पड़ सकती है। इसलिए पैन को छोटी बात न मानें। यह सौदे की शुरुआती जांच का हिस्सा होना चाहिए। किश्तों में भुगतान हो रहा है तो हर भुगतान की तारीख और राशि अलग से लिखें। निर्माणाधीन फ्लैट में यह बहुत काम आता है। एक किश्त भूलने से ब्याज और विलंब शुल्क लग सकता है।

उदाहरण आधार राशि कटौती दर कटौती राशि
विक्रय मूल्य ₹६० लाख ₹६० लाख एक प्रतिशत ₹६० हजार
विक्रय मूल्य ₹४८ लाख, स्टाम्प मूल्य ₹५५ लाख ₹५५ लाख एक प्रतिशत ₹५५ हजार
विक्रय मूल्य ₹१ करोड़ ₹१ करोड़ एक प्रतिशत ₹१ लाख
विक्रेता पैन नहीं देता लागू आधार बीस प्रतिशत तक बहुत अधिक
किश्त ₹१० लाख, कुल सौदा ₹८० लाख मौजूदा भुगतान एक प्रतिशत ₹१० हजार

विक्रय मूल्य में कौन से शुल्क जुड़ सकते हैं?

कई खरीदार सिर्फ मूल फ्लैट मूल्य पर कर कटौती निकालते हैं। यह गलती हो सकती है। कई परियोजनाओं में बिल्डर अलग-अलग नाम से शुल्क जोड़ता है। जैसे पार्किंग, क्लब सदस्यता, रखरखाव अग्रिम, बिजली और पानी सुविधा शुल्क। अगर ये शुल्क संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़े हैं, तो ये विक्रय मूल्य का हिस्सा माने जा सकते हैं। इसलिए बिल्डर की लागत पत्रक को ध्यान से पढ़ें। सिर्फ बुकिंग पत्र या विज्ञापन में लिखी कीमत पर भरोसा न करें।

पुरानी संपत्ति खरीदते समय भी यह बात लागू हो सकती है। कभी-कभी फर्निशिंग, सुविधा शुल्क या अन्य रकम सौदे में जोड़ी जाती है। हर रकम का उद्देश्य स्पष्ट रखें। बेहतर तरीका यह है कि भुगतान से पहले एक छोटा हिसाब बनाएं। कुल मूल्य, स्टाम्प शुल्क मूल्य, अतिरिक्त शुल्क, कटौती आधार और कटौती राशि अलग-अलग लिखें। इससे बाद में सुधार की जरूरत कम होती है।

शुल्क का प्रकार आधार में शामिल हो सकता है
मूल संपत्ति मूल्य हां
वाहन खड़ा करने का शुल्क हां
क्लब सदस्यता शुल्क हां
रखरखाव अग्रिम हां
बिजली या पानी सुविधा शुल्क हां
अग्रिम शुल्क हां
ऐसे ही अन्य हस्तांतरण संबंधी शुल्क हां

₹५० लाख की सीमा को सही तरीके से कैसे समझें?

संयुक्त सौदों में सबसे ज्यादा गलती होती है। मान लें पति और पत्नी मिलकर ₹८२ लाख का फ्लैट खरीदते हैं। दोनों का हिस्सा ₹४१ लाख है। कई लोग सोचते हैं कि हर हिस्से की रकम ₹५० लाख से कम है, इसलिए स्रोत कर कटौती नहीं लगेगी। यह सोच सुरक्षित नहीं है। कुल विचार राशि को देखना जरूरी है। अगर कुल संपत्ति मूल्य ₹५० लाख या उससे अधिक है, तो नियम लागू हो सकता है। यही बात कई विक्रेताओं वाले मामलों में भी लागू हो सकती है।

उदाहरण के लिए, दो भाई ₹९० लाख की संपत्ति बेच रहे हैं। हर भाई का हिस्सा ₹४५ लाख है। फिर भी कुल सौदा ₹९० लाख का है। खरीदार को स्रोत कर कटौती नियम जरूर देखना चाहिए। संयुक्त खरीदार और संयुक्त विक्रेता वाले मामलों में प्रपत्र भी सावधानी से भरें। पैन, हिस्सा, भुगतान और चालान सही न हो तो कर श्रेय गलत व्यक्ति के खाते में जा सकता है।

मामला सही तरीका
एक खरीदार, एक विक्रेता कुल मूल्य देखें
दो खरीदार, एक विक्रेता कुल संपत्ति मूल्य देखें
एक खरीदार, दो विक्रेता कुल भुगतान देखें
हर खरीदार का हिस्सा ₹५० लाख से कम फिर भी कुल मूल्य देखें
हर विक्रेता का हिस्सा ₹५० लाख से कम फिर भी कुल सौदा देखें
संयुक्त स्वामित्व हिस्सों के साथ कुल मूल्य भी मिलाएं
किश्तों में भुगतान कुल सौदा और भुगतान तारीख दोनों देखें

खरीदार को कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए?

खरीदार को इस धारा में टैन लेने की जरूरत नहीं होती। पैन से काम हो जाता है। लेकिन पैन सही होना चाहिए। खरीदार और विक्रेता दोनों के पैन में नाम, संख्या और श्रेणी ठीक होनी चाहिए। सिर्फ फोन पर मिला पैन नंबर काफी नहीं है। पैन कार्ड की प्रति लें। नाम की वर्तनी मिलाएं। अगर विक्रेता का नाम समझौते में अलग और पैन में अलग है, तो पहले यह अंतर साफ करें।

विक्रेता से निवास स्थिति भी लिखित में लें। अगर विक्रेता अनिवासी निकला, तो मामला बदल जाएगा। ऐसे मामलों में धारा १९५ और कम कटौती प्रमाणपत्र जैसी बातें देखनी पड़ सकती हैं। भुगतान के समय विक्रेता को साफ बताएं कि स्रोत कर कटौती अलग जाएगी। समझौते या भुगतान तालिका में शुद्ध भुगतान और कर कटौती को अलग दिखाना बेहतर रहता है।

कदम क्या करना है
पहला विक्रेता का पैन लें
दूसरा विक्रेता निवासी है या अनिवासी, यह पूछें
तीसरा विक्रय मूल्य और स्टाम्प मूल्य मिलाएं
चौथा अतिरिक्त शुल्क जोड़ें
पांचवां कटौती राशि निकालें
छठा विक्रेता को शुद्ध भुगतान करें
सातवां कर सरकार के पास जमा करें
आठवां सही प्रपत्र भरें
नौवां प्रमाणपत्र विक्रेता को दें
दसवां सभी कागज संभालकर रखें

पुराने प्रपत्र २६क्यूबी और नए प्रपत्र १४१ को कैसे समझें?

वर्ष २०२६ में यह हिस्सा खास ध्यान मांगता है। पुराने ढांचे में अचल संपत्ति खरीद पर स्रोत कर कटौती के लिए प्रपत्र २६क्यूबी भरा जाता था। बहुत से लोग आज भी इसी नाम से खोज करते हैं। नए कानून के तहत १ अप्रैल २०२६ या उसके बाद भुगतान या जमा की घटना होने पर प्रपत्र १४१ का ढांचा देखा जाना चाहिए। अचल संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े मामले इसमें अनुसूची ख के तहत आते हैं।

यहां तारीख बहुत अहम है। अगर कर कटौती की घटना ३१ मार्च २०२६ तक हो चुकी है, तो पुराना ढांचा लागू रह सकता है, भले ही जमा बाद में किया गया हो। अगर घटना १ अप्रैल २०२६ या बाद की है, तो नया ढांचा लागू हो सकता है। व्यावहारिक सलाह सरल है। भुगतान या जमा की तारीख देखें। फिर पोर्टल पर उपलब्ध सही प्रपत्र चुनें। पुराने नाम और नए ढांचे को मिलाकर समझें, लेकिन दाखिल करते समय ताजा पोर्टल निर्देश ही मानें।

बिंदु पुराना ढांचा नया ढांचा
इस्तेमाल का क्षेत्र अचल संपत्ति पर स्रोत कर कटौती अचल संपत्ति पर स्रोत कर कटौती
पुराना प्रपत्र प्रपत्र २६क्यूबी लागू नहीं
नया प्रपत्र लागू नहीं प्रपत्र १४१
नई अनुसूची लागू नहीं अनुसूची ख
तारीख आधार भुगतान या जमा की घटना भुगतान या जमा की घटना
३१ मार्च २०२६ तक पुराना ढांचा लागू लागू नहीं
१ अप्रैल २०२६ से लागू नहीं नया ढांचा देखें
सुधार पुराने मामले पुराने ढांचे में सुधरेंगे नए ढांचे में सुधार देखें

स्रोत कर कटौती कब जमा करनी होती है?

स्रोत कर कटौती भुगतान या खाते में जमा, जो पहले हो, उस समय करनी होती है। इसका मतलब है कि रजिस्ट्री की तारीख हमेशा निर्णायक नहीं होती। कई बार भुगतान पहले हो जाता है और रजिस्ट्री बाद में होती है। कटौती होने के बाद कर को कटौती वाले महीने के आखिरी दिन से तीस दिनों के भीतर सरकार के पास जमा करना होता है। उदाहरण के लिए, आपने १२ जुलाई २०२६ को भुगतान किया और कर काटा। जुलाई महीने का अंत ३१ जुलाई है। ऐसे में भुगतान और दाखिल प्रक्रिया ३० अगस्त तक पूरी कर देनी चाहिए।

निर्माणाधीन संपत्ति में यह और जरूरी है। अलग-अलग महीनों में कई किश्तें जाती हैं। हर किश्त के साथ अलग तारीख और अलग कटौती हो सकती है। इसलिए एक भुगतान तालिका रखें। अगर समय सीमा छूट गई, तो ब्याज, शुल्क और सुधार प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है। छोटी राशि की कटौती भी देर होने पर परेशानी बना सकती है।

काम समय सीमा
कटौती करना भुगतान या खाते में जमा, जो पहले हो
कर जमा करना कटौती वाले महीने के अंत से तीस दिन के भीतर
पुराने ढांचे में प्रपत्र २६क्यूबी के साथ
नए ढांचे में प्रपत्र १४१ के साथ
प्रमाणपत्र देना तय समय में
देर से कटौती ब्याज लग सकता है
देर से जमा अधिक ब्याज लग सकता है
देर से विवरण दैनिक शुल्क लग सकता है

प्रपत्र १६बी क्या है और विक्रेता को क्यों चाहिए?

प्रपत्र १६बी विक्रेता के लिए बेहद जरूरी है। यह प्रमाण देता है कि खरीदार ने कर काटकर सरकार के पास जमा किया है। पुराने २६क्यूबी ढांचे में खरीदार ट्रेसिज पोर्टल से यह प्रमाणपत्र डाउनलोड करता है और विक्रेता को देता है। विक्रेता को यह प्रमाणपत्र लेकर अपने वार्षिक कर विवरण में कटौती मिलानी चाहिए। अगर राशि, पैन या नाम में अंतर है, तो कर श्रेय अटक सकता है।

यह भी समझ लें कि प्रपत्र १६बी से विक्रेता का अंतिम कर काम खत्म नहीं होता। संपत्ति बेचने पर पूंजीगत लाभ बन सकता है। विक्रेता को अपनी खरीद लागत, सुधार लागत, धारण अवधि और छूट नियमों के अनुसार अंतिम कर निकालना होगा। अगर कटौती अंतिम कर से ज्यादा हुई है, तो विक्रेता रिटर्न में वापसी मांग सकता है। अगर अंतिम कर ज्यादा बनता है, तो बाकी कर देना होगा।

बिंदु आसान अर्थ
प्रपत्र १६बी स्रोत कर कटौती प्रमाणपत्र
कौन देता है खरीदार
किसे मिलता है विक्रेता
कहां से मिलता है ट्रेसिज पोर्टल
क्यों जरूरी है विक्रेता को कर श्रेय का प्रमाण
मिलान कहां होगा वार्षिक कर विवरण और कर सूचना विवरण
गलती हो तो सुधार अनुरोध करना पड़ सकता है
बिना प्रमाणपत्र विक्रेता को परेशानी हो सकती है

संयुक्त खरीदार और संयुक्त विक्रेता में क्या सावधानी रखें?

संयुक्त खरीदार और संयुक्त विक्रेता में क्या सावधानी रखें?

संयुक्त मामलों में हिसाब और प्रपत्र दोनों साफ होने चाहिए। अगर दो खरीदार और दो विक्रेता हैं, तो भुगतान किसने किया, किसे दिया, किस हिस्से पर दिया और किस पैन से कर जमा हुआ, यह सब स्पष्ट होना चाहिए। पुराने ढांचे में कई बार हर खरीदार-विक्रेता संयोजन के लिए अलग विवरण देना पड़ता था। नए ढांचे में भी हर कटौतीकर्ता की जिम्मेदारी अलग रह सकती है। इसलिए संयुक्त सौदों को सामान्य सौदे की तरह हल्के में न लें।

एक छोटा उदाहरण लें। दो खरीदार मिलकर दो विक्रेताओं से संपत्ति खरीदते हैं। अगर कुल सौदा ₹९० लाख का है, तो स्रोत कर कटौती का नियम देखना पड़ेगा। इसके बाद हर हिस्से का सही मिलान जरूरी है। गलत पैन, गलत हिस्सा या गलत भुगतान तारीख से विक्रेता को कर श्रेय नहीं मिलेगा। बाद में सुधार संभव हो सकता है, लेकिन समय और मेहनत दोनों लगते हैं।

स्थिति ध्यान रखने वाली बात
एक खरीदार, एक विक्रेता सरल मामला
दो खरीदार, एक विक्रेता हर खरीदार का हिस्सा साफ रखें
एक खरीदार, दो विक्रेता विक्रेता वार जानकारी सही दें
दो खरीदार, दो विक्रेता कई संयोजन बन सकते हैं
पुराना प्रपत्र खरीदार-विक्रेता संयोजन के अनुसार
नया प्रपत्र हर कटौतीकर्ता की अलग जिम्मेदारी
पैन गलती कर श्रेय अटक सकता है
हिस्सा गलत सुधार लंबा हो सकता है

गृह ऋण लेने पर स्रोत कर कटौती कैसे संभालें?

गृह ऋण लेने से खरीदार की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। बैंक विक्रेता या बिल्डर को भुगतान कर सकता है, लेकिन स्रोत कर कटौती का दायित्व खरीदार से जुड़ा रहता है। अगर बैंक पूरी राशि विक्रेता को भेज देता है और कर कटौती नहीं होती, तो बाद में खरीदार को अपनी जेब से कर जमा करना पड़ सकता है। इसलिए बैंक को पहले ही बताएं कि विक्रेता को शुद्ध राशि जानी है और कर कटौती अलग जमा होगी।

निर्माणाधीन संपत्ति में बिल्डर बार-बार भुगतान मांगता है। हर मांग पर्ची में देखें कि कुल सौदा ₹५० लाख से ऊपर है या नहीं। अगर हां, तो हर भुगतान पर स्रोत कर कटौती की योजना बनाएं। एक अलग फाइल बनाएं। उसमें बैंक स्वीकृति पत्र, भुगतान पर्ची, चालान, बिल्डर की मांग पर्ची और प्रमाणपत्र रखें। बाद में यह फाइल बहुत काम आती है।

भुगतान स्रोत खरीदार को क्या करना चाहिए
अपनी बचत से भुगतान पहले कटौती करें, फिर शुद्ध भुगतान दें
बैंक से ऋण भुगतान बैंक को शुद्ध भुगतान ढांचा बताएं
बिल्डर की मांग पर्ची कर हिस्सा अलग निकालें
बुकिंग राशि कुल सौदा सीमा पार करता है या नहीं देखें
निर्माणाधीन किश्त हर किश्त पर कटौती देखें
अंतिम किश्त पहले की किश्तों का मिलान करें
संयुक्त ऋण खरीदारों का हिस्सा लिखें
बैंक पत्र रिकॉर्ड में रखें

अनिवासी विक्रेता से संपत्ति खरीदते समय क्या बदलता है?

अगर विक्रेता अनिवासी भारतीय है, तो एक प्रतिशत वाला साधारण नियम लागू नहीं होता। ऐसे मामलों में धारा १९५ देखी जाती है। यह धारा ज्यादा जटिल है, क्योंकि इसमें पूंजीगत लाभ, निवास स्थिति, छूट और प्रमाणपत्र की भूमिका हो सकती है। कई खरीदार यहां गलती करते हैं। वे हर संपत्ति सौदे में एक प्रतिशत काटकर निश्चिंत हो जाते हैं। अनिवासी विक्रेता के मामले में ऐसा करना जोखिम भरा हो सकता है।

ऐसे सौदे में पहले विक्रेता से लिखित निवास घोषणा लें। पैन, पासपोर्ट और कर निवास से जुड़े दस्तावेज देखें। अगर विक्रेता कम या शून्य कटौती प्रमाणपत्र दे रहा है, तो उसकी वैधता जांचें। इस तरह के मामलों में कर सलाहकार से बात करना बेहतर है। सौदा बड़ा होता है और गलत कटौती से मांग, ब्याज और कानूनी परेशानी बन सकती है।

स्थिति सही नियम
निवासी विक्रेता धारा १९४-आईए
अनिवासी विक्रेता धारा १९५
निवास स्थिति साफ नहीं लिखित घोषणा लें
कम कटौती प्रमाणपत्र उपयोगी हो सकता है
गलत धारा खरीदार को जोखिम
विदेशी बैंक भुगतान अलग जांच जरूरी
पूंजीगत लाभ सही हिसाब जरूरी
विशेषज्ञ सलाह बेहतर विकल्प

पैन न देने पर क्या होगा?

पैन इस पूरी प्रक्रिया की रीढ़ है। अगर विक्रेता पैन नहीं देता, तो कटौती दर बहुत बढ़ सकती है। ₹८० लाख की संपत्ति पर सामान्य कटौती ₹८० हजार होगी। पैन न होने पर यह राशि ₹१६ लाख तक जा सकती है। इससे विक्रेता भी परेशान होगा और खरीदार का भुगतान ढांचा भी बिगड़ेगा। इसलिए सौदा पक्का करने से पहले पैन को साफ करें। पैन कार्ड की प्रति लें। नाम और संख्या मिलाएं।

अगर संयुक्त विक्रेता हैं, तो हर विक्रेता का पैन लें। अगर संयुक्त खरीदार हैं, तो हर खरीदार का पैन सही भरें। एक गलत पैन पूरे सौदे में सुधार की जरूरत पैदा कर सकता है। पैन में छोटी वर्तनी की गलती भी परेशानी दे सकती है। इसलिए समझौते, पैन, बैंक विवरण और प्रपत्र में नाम मिलना चाहिए।

पैन स्थिति असर
सही पैन दिया सामान्य एक प्रतिशत कटौती
पैन नहीं दिया बीस प्रतिशत तक कटौती
गलत पैन दिया कर श्रेय गलत हो सकता है
नाम मेल नहीं खाता सुधार की जरूरत
पैन निष्क्रिय है दाखिल में दिक्कत
खरीदार का पैन गलत चालान समस्या
संयुक्त विक्रेता सभी के पैन जरूरी
पैन प्रति नहीं ली जांच कमजोर रह जाती है

देर, ब्याज और दंड से कैसे बचें?

कर कटौती में देर छोटी बात नहीं है। अगर खरीदार ने कर काटा ही नहीं, तो एक तरह का ब्याज लग सकता है। अगर काट लिया पर सरकार के पास जमा नहीं किया, तो ब्याज की दर अधिक हो सकती है। देर से विवरण देने पर दैनिक शुल्क लग सकता है। प्रमाणपत्र न देने पर भी दंड का जोखिम हो सकता है। गंभीर चूक में और कार्रवाई भी हो सकती है।

सुरक्षित तरीका बहुत सरल है। भुगतान तारीख लिखें। उसी दिन कर कटौती का हिसाब बनाएं। अगले दिन या जल्द से जल्द चालान प्रक्रिया शुरू करें। आखिरी दिन तक इंतजार न करें। अगर गलती हो गई है, तो उसे छिपाएं नहीं। पोर्टल पर सुधार प्रक्रिया देखें। जरूरत हो तो कर सलाहकार की मदद लें।

गलती संभावित असर
कर कटौती नहीं की ब्याज लग सकता है
काटकर जमा नहीं किया अधिक ब्याज लग सकता है
विवरण देर से दिया दैनिक शुल्क लग सकता है
प्रमाणपत्र नहीं दिया दैनिक दंड लग सकता है
गलत पैन भरा सुधार की जरूरत
गलत राशि भरी कर श्रेय अटक सकता है
रसीद नहीं रखी प्रमाण में दिक्कत
तारीख गलत लिखी समय सीमा बिगड़ सकती है

खरीदार के लिए व्यवहारिक जांच सूची

खरीदार को शुरुआत से ही फाइल बनानी चाहिए। इसमें विक्रय समझौता, पैन प्रतियां, निवास घोषणा, स्टाम्प मूल्य प्रमाण, भुगतान रसीद, बैंक पत्र, चालान और प्रमाणपत्र रखें। अगर बिल्डर परियोजना है, तो लागत पत्रक और मांग पर्चियां भी रखें। अगर पुरानी संपत्ति है, तो विक्रेता के स्वामित्व दस्तावेज और भुगतान रसीद रखें।

डिजिटल प्रति भी रखें। कागजी प्रति भी रखें। कर जांच कई साल बाद भी आ सकती है। उस समय पुरानी ईमेल और रसीदें खोजने में परेशानी होती है। सबसे अच्छा तरीका है कि हर भुगतान के साथ एक पंक्ति लिखें: तारीख, कुल भुगतान, कटौती, शुद्ध भुगतान, चालान और प्रमाणपत्र स्थिति।

चरण क्या जांचें
सौदा तय होने से पहले विक्रेता पैन और निवास स्थिति
समझौता बनने से पहले विक्रय मूल्य और स्टाम्प मूल्य
भुगतान से पहले कटौती आधार और राशि
बैंक भुगतान से पहले शुद्ध भुगतान योजना
दाखिल के समय सही प्रपत्र और सही तारीख
दाखिल के बाद स्वीकृति संख्या
प्रमाणपत्र चरण विक्रेता को प्रमाणपत्र
रिकॉर्ड चरण सभी कागज सुरक्षित

विक्रेता के लिए व्यवहारिक जांच सूची

विक्रेता को भी सक्रिय रहना चाहिए। सिर्फ पैसा मिल गया, इसका मतलब कर काम खत्म नहीं हुआ। खरीदार ने कर काटा है या नहीं, कितना काटा है और किस पैन पर जमा किया है, यह देखना जरूरी है। प्रमाणपत्र मिलने के बाद राशि को वार्षिक कर विवरण से मिलाएं। अगर राशि दिखाई नहीं देती, तो खरीदार से तुरंत बात करें। देर होने पर सुधार लंबा हो सकता है।

संपत्ति बेचने पर पूंजीगत लाभ बन सकता है। विक्रेता को खरीद लागत, सुधार लागत, धारण अवधि और उपलब्ध छूट के आधार पर कर निकालना चाहिए। अगर स्रोत कर कटौती अंतिम कर से ज्यादा है, तो वापसी मिल सकती है। अगर अंतिम कर ज्यादा है, तो बाकी कर देना होगा।

विक्रेता का काम क्यों जरूरी
सही पैन दें कर श्रेय सही मिलेगा
निवास स्थिति बताएं सही धारा लागू होगी
प्रमाणपत्र लें कटौती का प्रमाण मिलेगा
वार्षिक कर विवरण मिलाएं श्रेय जांच सकेंगे
पूंजीगत लाभ निकालें अंतिम कर पता चलेगा
छूट देखें कर बचत हो सकती है
गलत श्रेय पर बोलें समय पर सुधार होगा
रिटर्न सही भरें नोटिस से बचेंगे

आम गलतियां जिनसे बचना चाहिए

सबसे आम गलती है विक्रेता को पूरा पैसा दे देना। फिर खरीदार को बाद में अपनी जेब से स्रोत कर जमा करना पड़ सकता है। इसे शुरुआत में ही रोकें। दूसरी गलती है स्टाम्प शुल्क मूल्य को नजरअंदाज करना। अगर स्टाम्प मूल्य ज्यादा है, तो वही आधार बन सकता है। इसलिए रजिस्ट्री से पहले यह मूल्य जानना जरूरी है।

तीसरी गलती अनिवासी विक्रेता के मामले में होती है। हर मामले में एक प्रतिशत लागू नहीं होता। निवास स्थिति साफ किए बिना भुगतान न करें। चौथी गलती है संयुक्त स्वामित्व में हिस्से देखकर सीमा से बचने की कोशिश करना। कुल मूल्य का नियम देखें।

गलती सही तरीका
विक्रेता को पूरा पैसा दे देना पहले कर काटें
सिर्फ समझौता मूल्य देखना स्टाम्प मूल्य भी देखें
पार्किंग शुल्क छोड़ देना पूरा लागत पत्रक पढ़ें
अनिवासी विक्रेता पर एक प्रतिशत काटना धारा १९५ जांचें
गलत पैन भरना पैन प्रति से मिलाएं
संयुक्त सौदे में हिस्सा देखकर बचना कुल मूल्य देखें
प्रमाणपत्र न देना समय पर दें
स्वीकृति संख्या खो देना रिकॉर्ड में रखें

अलग-अलग स्थितियों के उदाहरण

पहला उदाहरण सरल है। आपने ₹६५ लाख का फ्लैट खरीदा और विक्रेता निवासी है। आपको ₹६५ हजार स्रोत कर कटौती करनी होगी। दूसरा उदाहरण थोड़ा अलग है। समझौता मूल्य ₹४८ लाख है, लेकिन स्टाम्प शुल्क मूल्य ₹५५ लाख है। यहां उच्च मूल्य के कारण कटौती लागू हो सकती है।

तीसरा उदाहरण संयुक्त खरीदार का है। पति और पत्नी ₹९० लाख का घर खरीदते हैं। दोनों का हिस्सा अलग हो सकता है, फिर भी कुल मूल्य ₹५० लाख से अधिक है। चौथा उदाहरण अनिवासी विक्रेता का है। विक्रेता विदेश में रहता है। यहां एक प्रतिशत वाला सरल नियम नहीं मानना चाहिए। धारा १९५ और विशेषज्ञ सलाह जरूरी हो सकती है।

स्थिति सही समझ
₹६५ लाख का पुराना फ्लैट एक प्रतिशत कटौती
₹४८ लाख विक्रय मूल्य, ₹५५ लाख स्टाम्प मूल्य ₹५५ लाख आधार
₹९० लाख का संयुक्त फ्लैट कुल मूल्य देखें
₹१ करोड़ की संपत्ति, अनिवासी विक्रेता धारा १९५ देखें
पैन नहीं दिया उच्च कटौती जोखिम
बिल्डर किश्तों में भुगतान हर किश्त देखें
बैंक ऋण से भुगतान खरीदार जिम्मेदार
ग्रामीण कृषि भूमि सामान्य धारा लागू नहीं

अंतिम विचार

भारत में संपत्ति खरीद पर स्रोत कर कटौती कोई डराने वाला नियम नहीं है। लेकिन इसे हल्के में लेना ठीक नहीं। अगर आप ₹५० लाख या उससे अधिक की अचल संपत्ति खरीद रहे हैं, तो यह नियम आपके सौदे का जरूरी हिस्सा हो सकता है। सबसे पहले विक्रेता की निवास स्थिति जानें। फिर पैन लें। विक्रय मूल्य और स्टाम्प शुल्क मूल्य की तुलना करें। अतिरिक्त शुल्कों को देखें। भुगतान से पहले कटौती करें। सही प्रपत्र से राशि जमा करें। फिर विक्रेता को प्रमाणपत्र दें।

अगर सौदा संयुक्त है, बिल्डर किश्तों में भुगतान मांग रहा है, बैंक कर्ज शामिल है या विक्रेता अनिवासी है, तो विशेषज्ञ सलाह लेना समझदारी है। थोड़ी सी सावधानी बाद की बड़ी परेशानी से बचा सकती है। घर खरीदना पहले ही बड़ा फैसला है। कर कटौती सही रखेंगे, तो सौदा साफ, सुरक्षित और कम तनाव वाला रहेगा।

पूछे जाने वाले सवाल

क्या कटौती रजिस्ट्री की तारीख पर होती है?

जरूरी नहीं। कटौती भुगतान या खाते में जमा, जो पहले हो, उस समय होती है। रजिस्ट्री बाद में हो सकती है।

क्या बुकिंग राशि पर भी कटौती करनी पड़ सकती है?

हां, अगर कुल संपत्ति सौदा ₹५० लाख या उससे अधिक है, तो बुकिंग राशि या अग्रिम भुगतान पर भी नियम देखना चाहिए।

क्या खरीदार को टैन लेना होगा?

नहीं। इस धारा में खरीदार अपने पैन से काम कर सकता है। टैन लेने की जरूरत नहीं होती।

क्या ग्रामीण कृषि भूमि पर यह कटौती लगती है?

नहीं। ग्रामीण कृषि भूमि इस धारा से बाहर है। लेकिन भूमि की श्रेणी और स्थान दस्तावेज से जांचें।

क्या दुकान या कार्यालय खरीदने पर भी यह नियम लागू हो सकता है?

हां। अगर अचल संपत्ति है, विक्रेता निवासी है और मूल्य सीमा पूरी होती है, तो वाणिज्यिक संपत्ति पर भी यह नियम लागू हो सकता है।

क्या पुराने प्रपत्र २६क्यूबी का महत्व खत्म हो गया है?

नहीं। पुराने मामलों और आम खोज व्यवहार में यह नाम अब भी जरूरी है। ३१ मार्च २०२६ तक की घटना वाले मामलों में पुराना ढांचा लागू रह सकता है।

नए प्रपत्र १४१ में अचल संपत्ति कहां आती है?

नए ढांचे में अचल संपत्ति हस्तांतरण अनुसूची ख में आता है। दाखिल करते समय ताजा पोर्टल निर्देश देखें।