परंपरा तोड़ते हुए रविवार को पेश होगा आम बजट 2026,के बाद पहली बार 1999
रविवार को “Union Budget 2026 Sunday” पेश होना केवल एक तारीख नहीं है। यह बताता है कि सरकार अब बजट को परंपरा से ज्यादा “निष्पादन-समयसीमा” और “नीति-पूर्वानुमेयता” की कसौटी पर रख रही है। 2026-27 के लिए संदेश साफ है: आर्थिक सर्वे के संकेतों से लेकर बजट के फैसलों तक, सरकार बाजार, राज्यों और करदाताओं के लिए समय पर दिशा तय करना चाहती है।
भारत के बजट को अक्सर “एक दिन का बड़ा इवेंट” समझ लिया जाता है। असल में बजट एक साल भर की आर्थिक कहानी की शुरुआत है, जिसमें सरकार यह तय करती है कि पैसा कहाँ जाएगा, कर प्रणाली कैसे बदलेगी, कर्ज कितना लिया जाएगा, और विकास के लिए किस तरह का जोखिम उठाया जाएगा। इस बार बहस का केंद्र “रविवार” है, क्योंकि 1 फरवरी की तारीख स्थिर रहने पर बजट 2026 रविवार को पड़ रहा है। यह दुर्लभ है, और इसी दुर्लभता को मीडिया और बाजार दोनों एक संकेत की तरह पढ़ते हैं।
“पहला” जैसी हेडलाइन-भाषा अपनी जगह है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सरकार बजट प्रक्रिया को एक “हमेशा चालू” प्रशासनिक मशीन की तरह चलाना चाहती है, और अगर हाँ, तो इससे नीति-निर्माण, संसद, बाजार और आम जनता पर क्या असर पड़ेगा। 1999 में बजट का समय बदलना (5 बजे से 11 बजे) और 2017 में बजट की तारीख आगे करना (फरवरी अंत से 1 फरवरी) पहले ही दिखा चुका है कि भारत बजट को अपनी विकास रणनीति के अनुसार ढाल सकता है। अब “रविवार” उसी दिशा का अगला मनोवैज्ञानिक और संस्थागत संकेत बनता दिख रहा है।
Union Budget 2026 Sunday: परंपरा, समय और “प्रशासनिक अनुशासन” की नई परिभाषा

बजट को लेकर भारत में दो तरह की परंपराएँ रही हैं। पहली औपनिवेशिक विरासत वाली, जहाँ बजट का समय और प्रक्रिया अंग्रेजी शासन के तौर-तरीकों से मेल खाती थी। दूसरी स्वतंत्र भारत की, जहाँ संसद, मीडिया और जनता ने बजट को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक चर्चा का मंच बनाया। 1999 का बदलाव महत्वपूर्ण इसलिए माना जाता है क्योंकि उसने बजट को “आम नागरिक के समय” के करीब लाने की कोशिश की। 2017 का बदलाव इसलिए अहम रहा क्योंकि उसने बजट को “निष्पादन की घड़ी” से जोड़ दिया, ताकि 1 अप्रैल से पहले मंत्रालयों के पास योजनाओं को लागू करने का अधिक समय रहे।
अब 2026 में, जब 1 फरवरी रविवार को पड़ रहा है, सरकार के सामने एक विकल्प था: तारीख बदलकर परंपरा निभाई जाए या तारीख स्थिर रखकर “निष्पादन-पूर्वानुमेयता” का संकेत दिया जाए। अगर सरकार तारीख स्थिर रखती है, तो यह संदेश जाता है कि बजट अब परंपरा का कैदी नहीं है, बल्कि एक तय समय पर आर्थिक दिशा घोषित करने का उपकरण है। आधुनिक प्रशासन में यह बहुत बड़ा संकेत है, क्योंकि बाजार और निवेशक “नीति के आश्चर्य” से ज्यादा “नीति की पठनीयता” को महत्व देते हैं।
यह बदलाव एक और व्यापक ट्रेंड से जुड़ता है: सरकारें अब अपने बड़े फैसले ऐसे डिज़ाइन कर रही हैं कि सूचना-चक्र (news cycle) और बाजार-चक्र (market cycle) दोनों को मैनेज किया जा सके। रविवार को बजट होने पर देश को एक “इंटरप्रिटेशन विंडो” मिल जाती है। सोमवार को बाजार खुलने से पहले विश्लेषक, उद्योग और आम लोग बजट को समझने का समय पाते हैं। इससे अचानक प्रतिक्रिया की जगह अपेक्षाकृत व्यवस्थित प्रतिक्रिया बनती है। यही कारण है कि “रविवार” एक प्रतीक है, और प्रतीक अक्सर नीति की दिशा बताने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
नीचे बजट प्रक्रिया के कुछ निर्णायक मोड़ों का तुलनात्मक सार है, ताकि यह साफ हो सके कि 2026 का “रविवार” किस लंबी कहानी का हिस्सा है।
| निर्णायक मोड़ | क्या बदला | नीति-स्तर पर असर |
| 1999 | बजट प्रस्तुति का समय 5 बजे से 11 बजे | प्रक्रिया का “डेमोक्रेटिक टाइमिंग” की ओर झुकाव |
| 2017 | बजट तारीख 1 फरवरी | निष्पादन के लिए समय बढ़ा, विभागों की योजना-क्षमता बढ़ी |
| 2026 | 1 फरवरी रविवार होने पर भी बजट उसी दिन | तारीख की स्थिरता, नीति-पूर्वानुमेयता, संचार-रणनीति का संकेत |
“पहला” की बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भारत बजट को ‘कैलेंडर-स्थिरता’ के जरिए संस्थागत भरोसे का प्रतीक बना रहा है। एक देश की वित्तीय प्रणाली में भरोसा अक्सर छोटे-छोटे संकेतों से बनता है, और यह उन्हीं संकेतों में से एक है।
आर्थिक संदर्भ 2026: ग्रोथ की अपेक्षा, फिस्कल दबाव और भरोसे की राजनीति
बजट 2026-27 ऐसे समय आएगा जब भारत की आर्थिक कहानी दो धाराओं में बह रही है। पहली धारा कहती है कि भारत की विकास क्षमता मजबूत है, घरेलू मांग और निवेश के सहारे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है। दूसरी धारा कहती है कि सरकार को एक साथ कई दबाव संभालने होंगे, जैसे राजकोषीय घाटा, कर्ज की लागत, महँगाई का जोखिम, रोजगार की जरूरत, और वैश्विक अनिश्चितता।
यहाँ “Union Budget 2026 Sunday” की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण बनती है क्योंकि यह बजट केवल नए ऐलानों का दस्तावेज़ नहीं होगा, बल्कि राजकोषीय विश्वसनीयता का टेस्ट भी होगा। पिछले बजटों में सरकार ने घाटा घटाने की दिशा दिखाई है, साथ ही पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) को विकास-इंजन की तरह प्रस्तुत किया है। इस रणनीति का लाभ यह है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक परिसंपत्तियों पर खर्च बढ़ने से मध्यम अवधि में उत्पादकता और निजी निवेश को भी गति मिल सकती है। जोखिम यह है कि अगर राजस्व अनुमान चूकते हैं या ब्याज खर्च बढ़ता है, तो सरकार के पास सामाजिक क्षेत्र या टैक्स राहत के लिए “फिस्कल स्पेस” कम रह जाती है।
2025-26 के बजट अनुमानों को “बेसलाइन” मानें, क्योंकि 2026-27 में बहस इन्हीं के आसपास घूमेगी। यह बेसलाइन बताती है कि सरकार विकास के लिए पूंजीगत व्यय बढ़ाना चाहती है और साथ ही घाटा घटाने का वादा भी निभाना चाहती है।
| संकेतक (बेसलाइन संदर्भ) | स्तर/रुझान | 2026-27 के लिए संकेत |
| कुल सरकारी व्यय | बड़ा और विस्तारशील | खर्च की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान अपेक्षित |
| कैपेक्स | उच्च प्राथमिकता | इंफ्रा, रेलवे, ऊर्जा, शहरी परियोजनाओं पर फोकस रहने की संभावना |
| राजकोषीय घाटा | घटाने का लक्ष्य | बाजार भरोसा, बॉन्ड यील्ड और रेटिंग सेंटिमेंट पर असर |
| बाजार से कर्ज | बड़ा आकार | बॉन्ड मार्केट में मांग, ब्याज लागत और निवेशकों का भरोसा निर्णायक |
यहाँ नीति-निर्माताओं के सामने “ट्रेड-ऑफ” साफ है। अगर सरकार कैपेक्स को तेज़ रखती है, तो उसे या तो राजस्व बढ़ाना होगा, या अन्य खर्चों में अनुशासन दिखाना होगा, या निजी निवेश को इतना आकर्षित करना होगा कि सरकार के खर्च से कई गुना आर्थिक गतिविधि बने। दूसरी ओर, अगर सरकार घाटा तेजी से घटाती है, तो उसे बड़े खर्चों की रफ्तार नियंत्रित करनी पड़ सकती है, जिसका राजनीतिक और आर्थिक दोनों असर होगा।
यही कारण है कि बजट का दिन, समय, और प्रस्तुति शैली भी अब “मैक्रो संकेत” बनते जा रहे हैं। रविवार को बजट का निर्णय अगर सचमुच लिया जाता है, तो यह संदेश होगा कि सरकार फिस्कल कैलेंडर को भी एक विश्वसनीयता-उपकरण मान रही है। यह खास तौर पर तब अहम है जब वैश्विक निवेशक किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था में “नीति-स्थिरता” और “फिस्कल पाथ” को एक साथ देखते हैं।
नीति के बड़े मोर्चे: टैक्स सरलीकरण, टैरिफ संकेत और ‘निष्पादन’ का दबाव
बजट 2026-27 की नीतिगत बहस तीन बड़े मोर्चों पर केंद्रित रहने की संभावना है। पहला मोर्चा टैक्स प्रणाली का है, जहाँ करदाता सरल नियम, कम अनुपालन बोझ, और स्थिरता चाहते हैं। दूसरा मोर्चा टैरिफ और व्यापार नीति का है, जहाँ उद्योग अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता और इनपुट लागत को लेकर स्पष्टता चाहता है। तीसरा मोर्चा निष्पादन का है, जहाँ सरकार को यह दिखाना होगा कि घोषित खर्च वास्तव में जमीन पर उतर रहा है।
टैक्स नीति में सबसे बड़ा तनाव यह है कि सरकार को राजस्व भी चाहिए और करदाताओं को राहत भी। भारत जैसे देश में, जहाँ कर-आधार बढ़ाने का लक्ष्य लंबे समय से चर्चा में है, बजट अक्सर “रेट बदलने” से ज्यादा “नियम बदलने” का मंच बन जाता है। यदि सरकार नियमों को सरल बनाती है, विवाद कम करती है, और अनुपालन लागत घटाती है, तो यह अर्थव्यवस्था की उत्पादकता पर भी असर डालता है। लेकिन नियम बदलना तभी सफल होता है जब स्थिरता बनी रहे। बार-बार बदलाव से भरोसा कमजोर पड़ता है। इसलिए 2026-27 में टैक्स मोर्चे पर “बदलाव” से ज्यादा “पठनीयता” की मांग बढ़ेगी।
टैरिफ और कस्टम ड्यूटी की चर्चा अलग तरह का दबाव पैदा करती है। उद्योग चाहता है कि इनपुट पर ड्यूटी संरचना सरल हो ताकि लागत अनुमान और सप्लाई चेन योजना आसान बने। सरकार चाहती है कि घरेलू उद्योग को रणनीतिक संरक्षण मिले और उत्पादन बढ़े। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं। टैरिफ सरलीकरण का मतलब यह भी हो सकता है कि कुछ क्षेत्रों को अधिक प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़े। दूसरी तरफ, अधिक संरक्षण का मतलब यह हो सकता है कि उपभोक्ताओं को महंगा सामान मिले और निर्यात प्रतिस्पर्धा घटे। इसलिए बजट 2026-27 का टैरिफ खंड असल में भारत की औद्योगिक रणनीति की दिशा बताएगा।
निष्पादन की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने कैपेक्स को विकास का केंद्र बनाया है। लेकिन 2026-27 में सिर्फ “कितना आवंटन हुआ” पर्याप्त नहीं होगा। सवाल यह होगा कि कितना खर्च हुआ, कहाँ हुआ, और उससे क्या परिणाम निकला। यही वह जगह है जहाँ सरकार “परफॉर्मेंस” को बजट नैरेटिव का हिस्सा बना सकती है। अब बजट को ऐसे पढ़ा जा रहा है जैसे यह एक साल की “डिलीवरी रिपोर्ट” भी हो और अगले साल का “वर्क ऑर्डर” भी।
नीचे नीति ट्रेड-ऑफ का एक व्यावहारिक मैप दिया है, जो दिखाता है कि एक फैसले का असर दूसरे पर कैसे पड़ सकता है।
| नीति निर्णय | संभावित लाभ | संभावित जोखिम |
| कैपेक्स ऊँचा रखना | इंफ्रा निर्माण, उत्पादकता, निजी निवेश को संकेत | कर्ज जरूरत बढ़े तो ब्याज लागत और बॉन्ड यील्ड दबाव |
| घाटा तेजी से घटाना | फिस्कल विश्वसनीयता, स्थिरता, निवेशक भरोसा | कुछ खर्चों पर ब्रेक, मांग पर अल्पकालिक असर |
| टैरिफ सरलीकरण | लागत अनुमान आसान, सप्लाई चेन बेहतर | कुछ घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धा दबाव |
| टैक्स अनुपालन सरल करना | बिजनेस ईज, विवाद में कमी | राजस्व पर अल्पकालिक अनिश्चितता यदि संक्रमण ठीक न हो |
यहाँ “रविवार” फिर एक संकेत बनता है। सरकार अगर समय-निर्धारण को सख्ती से पकड़ती है, तो वह यह भी कहना चाहती है कि नीति-निष्पादन का चक्र समय पर चलेगा। आज के आर्थिक प्रबंधन में “समय” एक संसाधन है, और सरकार उसे बचाने की भाषा में फैसले लेती दिख रही है।
किसे फायदा, किस पर दबाव: सेक्टर, राज्य, नौकरी और मध्यम वर्ग के लिए क्या बदल सकता है

बजट विश्लेषण का सबसे उपयोगी हिस्सा वह होता है जो “घोषणा” से आगे जाकर वास्तविक जीवन के असर को समझाए। 2026-27 में असर को चार समूहों में पढ़ा जा सकता है: (1) इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण-आधारित उद्योग, (2) उपभोक्ता और मध्यम वर्ग, (3) राज्य सरकारें और उनकी परियोजनाएँ, (4) रोजगार और कौशल आधारित भविष्य।
अगर कैपेक्स प्राथमिकता बनी रहती है, तो निर्माण, इंजीनियरिंग, परिवहन, रेलवे सप्लाई चेन, और शहरी विकास से जुड़े क्षेत्रों को लगातार मांग का सहारा मिल सकता है। इसका दूसरा असर रोजगार पर हो सकता है, क्योंकि इंफ्रा परियोजनाएँ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के रोजगार बनाती हैं। लेकिन यह रोजगार अक्सर भौगोलिक रूप से असमान होता है, और समय के साथ टिकाऊपन का सवाल भी रहता है। इसलिए सरकार को यह दिखाना पड़ेगा कि कैपेक्स के साथ मानव पूंजी और कौशल विकास का निवेश भी बढ़ रहा है।
मध्यम वर्ग के लिए बजट का सबसे संवेदनशील भाग टैक्स और महँगाई से जुड़ा है। अगर सरकार कर राहत देती है, तो खपत बढ़ सकती है। अगर सरकार कर राहत नहीं देती, तो वह यह तर्क दे सकती है कि फिस्कल अनुशासन और सार्वजनिक निवेश ज्यादा जरूरी है। दोनों ही स्थितियों में मध्यम वर्ग बजट को “अपनी जेब” के नजरिये से पढ़ेगा, जबकि सरकार उसे “देश की क्षमता” के नजरिये से पेश करेगी। 2026-27 का राजनीतिक अर्थशास्त्र इसी टकराव में आकार लेगा।
राज्य सरकारों के लिए केंद्र का बजट एक संकेतक होता है कि केंद्रीय योजनाओं, साझेदारी परियोजनाओं और ट्रांसफर में क्या दिशा रहेगी। यदि केंद्र समय पर बजट पेश करता है और जल्दी पास कराने की कोशिश करता है, तो राज्यों के लिए भी परियोजना योजना बनाना आसान हो जाता है। लेकिन अगर केंद्र अपने घाटा लक्ष्य के कारण कुछ फंडिंग मॉडल सख्त करता है, तो राज्यों को अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ सकते हैं। यह संघीय वित्त का वह क्षेत्र है जहाँ बजट के छोटे फैसले भी राजनीतिक बहस बन जाते हैं।
रोजगार की बहस 2026-27 में और तेज़ हो सकती है, क्योंकि युवा आबादी की अपेक्षाएँ बढ़ रही हैं। बजट की भूमिका यहाँ सीमित है, लेकिन दिशा देने वाली है। सरकार टैक्स इंसेंटिव, स्किलिंग, स्टार्टअप इकोसिस्टम और मैन्युफैक्चरिंग सपोर्ट के जरिए संकेत दे सकती है कि रोजगार रणनीति किस ओर जा रही है। यदि टैरिफ सरलीकरण या औद्योगिक नीति बदलाव होता है, तो उसका असर नौकरी-निर्माण की संरचना पर पड़ेगा। यही कारण है कि बजट का विश्लेषण सिर्फ “कितना पैसा” नहीं, बल्कि “किस दिशा में संरचना” का सवाल है।
नीचे एक तुलनात्मक सार है, जो बताता है कि किस तरह के नीति संकेत किन समूहों को मदद या दबाव दे सकते हैं। यह अंतिम निष्कर्ष नहीं, बल्कि दिशात्मक फ्रेम है।
| समूह/क्षेत्र | संभावित सहारा | संभावित दबाव |
| इंफ्रा और निर्माण | कैपेक्स जारी रहा तो मांग स्थिर | फिस्कल अनुशासन के कारण कुछ परियोजनाओं में प्राथमिकता बदल सकती है |
| मध्यम वर्ग | टैक्स सरलीकरण, अनुपालन आसान | व्यापक राहत सीमित रही तो खपत पर मनोवैज्ञानिक असर |
| राज्य सरकारें | समय पर निर्णय से योजना आसान | ट्रांसफर या साझेदारी शर्तें सख्त हुईं तो संसाधन दबाव |
| रोजगार/युवा | कौशल और उत्पादन नीति से अवसर | संरचनात्मक सुधार धीमे रहे तो अपेक्षा-गैप बढ़ सकता है |
इस पूरे चित्र में “रविवार” का अर्थ यह है कि सरकार बजट के संदेश को सप्ताहांत में सेट करके एक व्यवस्थित व्याख्या चाहती है। इससे “विनर्स बनाम लूजर्स” की सतही बहस से आगे जाकर नीति की वास्तविक दिशा पर फोकस करने का मौका मिलता है, बशर्ते कि सरकार अपने दस्तावेज़ों में पर्याप्त स्पष्टता दे।
अब आगे क्या: देखने लायक संकेत, संभावित परिदृश्य और दीर्घकालिक परिणाम
आने वाले हफ्तों में बजट से पहले और बाद में कुछ ऐसे संकेत होंगे जो 2026-27 की कहानी तय करेंगे। पहला संकेत आर्थिक सर्वे का होगा, क्योंकि वही सरकार की अपनी नजर में अर्थव्यवस्था की ताकत और कमजोरी को फ्रेम करता है। दूसरा संकेत बजट भाषण और दस्तावेज़ों का होगा, जहाँ खर्च, कर, और कर्ज की रणनीति सामने आएगी। तीसरा संकेत संसद की बहसों और संशोधनों का होगा, क्योंकि वहीं यह तय होता है कि प्रस्ताव कितने व्यावहारिक हैं। चौथा संकेत बाजार की प्रतिक्रिया का होगा, खासकर बॉन्ड मार्केट, क्योंकि कर्ज लागत और भरोसा लंबे समय तक वहीं से तय होता है।
यहाँ दो संभावित परिदृश्य समझना उपयोगी है। पहला परिदृश्य “कैपेक्स-निरंतरता + घाटा नियंत्रण” का है, जिसमें सरकार इंफ्रा खर्च को बनाए रखते हुए घाटा धीरे-धीरे घटाती है। यह परिदृश्य भरोसे के लिए अच्छा है, लेकिन इसमें टैक्स राहत और सामाजिक व्यय के लिए जगह सीमित हो सकती है। दूसरा परिदृश्य “राहत-झुकाव + मांग प्रोत्साहन” का है, जिसमें सरकार खपत बढ़ाने के लिए कुछ राहत देती है। यह अल्पकाल में लोकप्रिय हो सकता है, लेकिन घाटा और बॉरोइंग के दबाव के कारण बाजार ज्यादा संवेदनशील हो सकता है। वास्तविक बजट अक्सर इन दोनों के बीच का रास्ता चुनता है, लेकिन संकेत यह तय करते हैं कि सरकार किस तरफ झुक रही है।
“Union Budget 2026 Sunday” का दीर्घकालिक अर्थ तभी बनेगा जब हम इसे संस्थागत बदलावों की श्रृंखला में रखें। अगर भारत बजट प्रक्रिया को लगातार अधिक समयबद्ध, दस्तावेज़-समृद्ध, और निष्पादन-केंद्रित बनाता है, तो यह विकास मॉडल की गुणवत्ता सुधार सकता है। इसका असर केवल सरकार तक सीमित नहीं रहेगा। निजी क्षेत्र निवेश निर्णयों में अधिक स्थिरता महसूस करेगा। राज्य सरकारें परियोजनाओं की योजना बेहतर कर पाएंगी। और अंतरराष्ट्रीय निवेशक भारत को “नीति-पूर्वानुमेय” अर्थव्यवस्था के रूप में अधिक भरोसे से देखेंगे।
लेकिन इस रास्ते की शर्त भी स्पष्ट है। स्थिर कैलेंडर तभी विश्वसनीयता बनाता है जब बजट के अनुमान यथार्थवादी हों, और निष्पादन का डेटा पारदर्शी हो। अगर बजट भाषण बहुत आकर्षक हो लेकिन परिणाम कमजोर हों, तो प्रतीकों की ताकत घट जाती है। इसलिए रविवार का निर्णय “सिर्फ प्रतीक” न रहे, इसके लिए बजट 2026-27 को कुछ ठोस संकेत देने होंगे, जैसे परियोजनाओं की प्रगति, राजस्व की गुणवत्ता, कर विवादों में कमी, और रोजगार व उत्पादकता से जुड़ी स्पष्ट रणनीति।
नीचे एक उपयोगी “देखने लायक संकेत” सूची है, जिसे बजट के दिन और उसके बाद ट्रैक किया जा सकता है।
- कर्ज और घाटा: सरकार का घाटा लक्ष्य और बाजार से कर्ज की योजना
- कैपेक्स की गुणवत्ता: किन क्षेत्रों में निवेश, और पिछले वर्ष की वास्तविक प्रगति
- टैक्स सरलीकरण: अनुपालन लागत घटाने के कदम, विवाद कम करने की दिशा
- टैरिफ संरचना: सरलीकरण बनाम संरक्षण का संतुलन
- रोजगार संकेत: स्किलिंग, मैन्युफैक्चरिंग, MSME, और स्टार्टअप सपोर्ट की स्पष्टता
अंततः, बजट 2026-27 का सबसे बड़ा प्रश्न “कितना खर्च” नहीं, बल्कि “किस तरह का राज्य” है। क्या भारत का वित्तीय शासन मॉडल समय पर निर्णय, पारदर्शी निष्पादन और स्थिर नीति के जरिए भरोसा बढ़ाएगा, या वह पुराने ढंग के ऐलान-केन्द्रित चक्र में लौटेगा। रविवार का बजट अगर होता है, तो वह संकेत देता है कि सरकार कम से कम अपने प्रशासनिक कैलेंडर को “स्थिरता का वादा” बनाना चाहती है।
