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पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कारकी नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं

नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की बनीं देश की पहली महिला प्रधानमंत्री, संसद भंग और नए चुनावों की घोषणा की गई। इस विस्तारित संस्करण में हम इस घटनाक्रम की गहराई से चर्चा करेंगे, जिसमें राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि, प्रमुख व्यक्तियों की भूमिका, और भविष्य की चुनौतियों को शामिल किया गया है, ताकि पाठकों को पूरी तस्वीर मिल सके।

नेपाल के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को देश का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। यह नियुक्ति शुक्रवार, 12 सितंबर 2025 को की गई, जब कई दिनों की राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शनों के बाद स्थिति में सुधार के संकेत दिखाई दिए। राष्ट्रपति ने साथ ही संसद को भंग कर दिया और प्रतिनिधि सभा के लिए 5 मार्च 2026 को नए चुनाव कराने की घोषणा की। यह फैसला नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां युवा प्रदर्शनकारियों की मांगों को मानते हुए एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया है। सुशीला कार्की, जो 73 वर्ष की हैं, न केवल नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रही हैं, बल्कि अब वे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री भी बन गई हैं। उनकी नियुक्ति से उम्मीद की जा रही है कि देश में स्थिरता लौटेगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत होगी।

राष्ट्रपति पौडेल ने सुशीला कार्की को एक संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण समारोह में पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। यह शपथ ग्रहण संसद भंग होने के तुरंत बाद हुआ, जो दर्शाता है कि राष्ट्रपति कार्यालय ने स्थिति को जल्द से जल्द नियंत्रित करने की कोशिश की है। नेपाल के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति को आपातकालीन स्थितियों में ऐसे कदम उठाने का अधिकार है, और विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम संकट के समय का एक व्यावहारिक समाधान है। कार्की अब एक अंतरिम कैबिनेट का नेतृत्व करेंगी, जो अगले छह महीनों में चुनावों की तैयारी और निगरानी का काम संभालेगी। राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, इस कैबिनेट का मुख्य उद्देश्य देश को राजनीतिक अराजकता से बाहर निकालना और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना होगा।

विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि और जेन जी की भूमिका

यह सब कुछ जेन जी युवाओं के नेतृत्व में हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों से शुरू हुआ। नेपाल में राजनीतिक वर्ग की वर्षों की कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और दिखावटी जीवनशैली से निराश युवा पीढ़ी सड़कों पर उतर आई। ये युवा तकनीक-प्रेमी हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी मांगों को मजबूती से उठा रहे थे। 8 सितंबर 2025 को पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने इन प्रदर्शनों पर कड़ी कार्रवाई की, जिसमें कम से कम 19 लोगों की मौत हो गई। इस क्रूर दमन ने विरोध को और भड़का दिया, और सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, एक्स (पूर्व ट्विटर), यूट्यूब और अन्य 23 प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन यह प्रतिबंध उलटा पड़ गया, क्योंकि युवाओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना और विरोध और तेज हो गया।

9 सितंबर को विरोध हिंसक रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक नेताओं के घरों पर हमला किया, उन्हें आग लगाई और कई नेताओं के साथ बदसलूकी की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट, संसद भवन और सिंह दरबार (सरकार का मुख्यालय) जैसे प्रमुख सरकारी ढांचों को जलाकर राज्य पर प्रतीकात्मक कब्जा कर लिया। इन घटनाओं ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया और ओली सरकार को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। ओली अब सेना की सुरक्षा में हैं, और प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह उखाड़ फेंका जाए। जेन जी अभियानकर्ताओं ने सुशीला कार्की के नाम पर सहमति जताई, लेकिन संसद भंग किए बिना कोई समझौता नहीं करने का फैसला किया। काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह, जो आंदोलन के प्रमुख चेहरे हैं, ने कार्की के नाम का समर्थन किया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने इसे स्वीकार किया। प्रमुख अभियानकर्ता सुडान गुरुंग ने स्पष्ट कहा कि संसद भंग करना “गैर-परक्राम्य” है, क्योंकि बिना इसके पुरानी पार्टियां अपना प्रभाव बनाए रखेंगी।

राष्ट्रपति की चिंताएं और विस्तारित परामर्श

राष्ट्रपति पौडेल ने इस संकट को सुलझाने के लिए गुरुवार रात से ही कई दौर की बैठकें कीं। उन्होंने सुशीला कार्की, कानूनी विशेषज्ञों और सेना की मदद से परामर्श किया। सूत्रों के अनुसार, पौडेल इस बात से बेहद चिंतित थे कि अगर संसद को प्रधानमंत्री नियुक्त करने से पहले भंग किया गया, तो नई कैबिनेट बिना किसी संसदीय जांच या जवाबदेही के काम कर सकेगी, जो लोकतंत्र के लिए खतरा हो सकता है। हालांकि, कार्की ने प्रदर्शनकारियों की मांग का समर्थन किया और तर्क दिया कि संसद भंग किए बिना पुरानी व्यवस्था जस की तस रहेगी।

शुक्रवार को युवा प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति कार्यालय के बाहर इंतजार करते रहे, जबकि पौडेल ने प्रमुख राजनीतिक नेताओं से भी सलाह ली। इन नेताओं ने जोर दिया कि कोई भी फैसला संवैधानिक सीमाओं के अंदर रहना चाहिए। सेना, जो सड़कों पर शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, इस देरी से निराश हो रही थी और चाहती थी कि प्रक्रिया जल्द पूरी हो। संवैधानिक विशेषज्ञ बिपिन अधिकारी, जो काठमांडू विश्वविद्यालय में कानून के प्रोफेसर हैं, ने कहा कि कार्की की नियुक्ति संकटकालीन उपाय है और अदालत में इसकी चुनौती की संभावना कम है। उन्होंने उदाहरण दिए कि नेपाल के इतिहास में ऐसे संकटों को इसी तरह संभाला गया है, जैसे 2006 के लोकतंत्र आंदोलन के बाद के बदलाव।

सुशीला कार्की: भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा की कहानी

सुशीला कार्की को नेपाल में एक साफ-सुथरी और ईमानदार नेता के रूप में जाना जाता है। कई लोग उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा कहते हैं, क्योंकि उनके मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल में उन्होंने कई उच्च-स्तरीय भ्रष्टाचार मामलों पर सख्त फैसले दिए। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (वाराणसी, भारत) से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री और त्रिभुवन विश्वविद्यालय (नेपाल) से कानून की डिग्री हासिल की है। 13 अप्रैल 2016 से 10 जुलाई 2016 तक वे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रहीं, और फिर 11 जुलाई 2016 को पूर्ण मुख्य न्यायाधीश बनीं। वे 7 जून 2017 को सेवानिवृत्त हुईं। उनके कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करने वाले कई फैसले आए, जैसे सरकारी हस्तक्षेप के खिलाफ आदेश।

प्रोफेसर और भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत लोक राज बराल ने द हिंदू को दिए साक्षात्कार में कहा कि कार्की का चयन वर्तमान स्थिति में पूरी तरह उचित है। उन्होंने अपनी किताब “नेपाल: फ्रॉम मोनार्की टू रिपब्लिक” में नेपाल के राजनीतिक बदलावों पर विस्तार से लिखा है। बराल के अनुसार, कार्की की तत्काल चुनौतियां कानून-व्यवस्था बनाए रखना, राज्य संस्थाओं में विश्वास बहाल करना और निष्पक्ष चुनाव कराना होंगी। उनकी साफ छवि से उम्मीद है कि वे शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण कर पाएंगी।

अंतरिम सरकार की प्रमुख प्राथमिकताएं और चुनौतियां

कार्की को अब एक कैबिनेट गठित करनी होगी, जिसमें आवश्यक मंत्रालयों के लिए मंत्री नियुक्त किए जाएंगे। यह कैबिनेट चुनावों तक सरकारी कार्यों को संभालेगी। बिपिन अधिकारी के अनुसार, सरकार की पहली प्राथमिकता 8 सितंबर के नरसंहार की स्वतंत्र जांच और जिम्मेदारों का अभियोजन होना चाहिए। दूसरी, राज्य ढांचों पर हमलों और आगजनी की आपराधिक जांच। इसके अलावा, लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए संवैधानिक सुधारों की दिशा में काम करना जरूरी है, जैसे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना।

नेपाल के इस संकट ने सवाल उठाए हैं कि क्या यह लोकतंत्र का पतन है या नई शुरुआत। विशेषज्ञों का मानना है कि जेन जी की भागीदारी से देश में नई ऊर्जा आएगी, लेकिन अंतरिम सरकार को सावधानी से काम करना होगा ताकि अराजकता न फैले।

भारत की प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ

भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल की नई अंतरिम सरकार का स्वागत किया है। बयान में कहा गया, “हम माननीय श्रीमती सुशीला कार्की के नेतृत्व में नेपाल की नई अंतरिम सरकार के गठन का स्वागत करते हैं। हमें उम्मीद है कि इससे शांति और स्थिरता बढ़ेगी।” भारत ने खुद को नेपाल का निकट पड़ोसी, साथी लोकतंत्र और विकास भागीदार बताते हुए दोनों देशों की समृद्धि के लिए सहयोग जारी रखने का वादा किया। नेपाल और भारत के बीच गहरे सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध हैं, और भारत ने हमेशा नेपाल के राजनीतिक बदलावों में सकारात्मक भूमिका निभाई है, जैसे 2015 के संविधान निर्माण में सहायता।

यह घटनाक्रम नेपाल को एक नए युग की ओर ले जा सकता है, जहां युवा आवाजें राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाएं। कार्की के नेतृत्व में देश को उम्मीद है कि भ्रष्टाचार कम होगा और विकास की गति बढ़ेगी।