मोदी ने ट्रंप को संदेश में शी और पुतिन के साथ हाथ मिलाया
ट्रंप प्रशासन की ओर से लगाए गए भारी टैरिफ और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना कर रहे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक बेहद दोस्ताना मुलाकात की। यह मोदी की सात साल में चीन की पहली आधिकारिक यात्रा थी, जो तियानजिन शहर में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान हुई। इस मुलाकात में तीनों नेता हाथ में हाथ डाले नजर आए, जो वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। मोदी की यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब अमेरिका भारत पर रूसी तेल खरीदने के कारण दबाव डाल रहा है, और ट्रंप ने भारत को “एकतरफा व्यापारिक आपदा” करार दिया है। इस लेख में हम इस घटना को विस्तार से समझेंगे, जिसमें बैठक के पल-पल के विवरण, पृष्ठभूमि, प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं शामिल हैं। हम विश्वसनीय स्रोतों जैसे सीएनएन, न्यूयॉर्क टाइम्स, रॉयटर्स और भारतीय मीडिया से प्राप्त जानकारी पर आधारित तथ्यों का उपयोग करेंगे ताकि यह रिपोर्ट अनुभवी, विशेषज्ञता से भरपूर, आधिकारिक और भरोसेमंद बने।
बड़ा परिदृश्य
अमेरिका के पिछले कई राष्ट्रपतियों ने भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले में एक प्रमुख सहयोगी के रूप में देखा है और इसे मजबूत करने के लिए आक्रामक प्रयास किए हैं। उदाहरण के लिए, क्वाड (क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग) जैसे गठबंधनों में भारत को शामिल किया गया, जिसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए एकजुट हैं। लेकिन ट्रंप प्रशासन की नीति अलग है – वे भारत और रूस के बीच दूरी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, साथ ही रूस को चीन से अलग करने का प्रयास कर रहे हैं। ट्रंप का मानना है कि रूस को अलग करके अमेरिका अपने हितों को मजबूत कर सकता है, लेकिन तीनों नेताओं का हाथ पकड़कर खड़े होने का दृश्य – जिसमें मोदी, शी और पुतिन मुस्कुराते हुए बात करते नजर आए – कम से कम प्रतीकात्मक रूप से अमेरिका की इन कोशिशों के लिए एक बड़ा झटका है। यह दृश्य एससीओ शिखर सम्मेलन में कैद हुआ, जो 31 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक तियानजिन में आयोजित हुआ। एससीओ एक क्षेत्रीय संगठन है जिसमें रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान, ईरान और कई मध्य एशियाई देश शामिल हैं, और इसे कभी-कभी “नाटो का विकल्प” कहा जाता है क्योंकि यह सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और आतंकवाद विरोध पर केंद्रित है। इस साल के सम्मेलन में 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए, और इसका फोकस कनेक्टिविटी, व्यापार और बहुपक्षीय सहयोग पर था। मोदी की भागीदारी भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” को दर्शाती है, जहां भारत अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए रूस और चीन के साथ भी संतुलन साध रहा है। इस पृष्ठभूमि में, ट्रंप के टैरिफ भारत के लिए एक बड़ा मुद्दा बने हुए हैं, जो रूसी तेल आयात पर आधारित हैं और भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
खबर की मुख्य बातें
मोदी और पुतिन हाथ में हाथ डाले एससीओ शिखर सम्मेलन के मुख्य सभागार में पहुंचे। वे दोनों पहले से ही करीबी दोस्त की तरह व्यवहार कर रहे थे, और जैसे ही वे पहुंचे, उन्होंने शी जिनपिंग के साथ एक तंग घेरा बनाया। तीनों नेताओं के चेहरों पर गर्म मुस्कान थी, और वे कैमरों के सामने हंसते-बात करते नजर आए। यह पल सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जहां वीडियो में तीनों नेता एक-दूसरे की पीठ थपथपाते और मजाक करते दिखे। शी ने अपने उद्घाटन भाषण में “शीत युद्ध की मानसिकता” और “धमकाने वाली नीतियों” की कड़ी निंदा की, हालांकि उन्होंने ट्रंप या अमेरिका का नाम सीधे नहीं लिया। उन्होंने कहा कि दुनिया को पुरानी मानसिकताओं से बाहर निकलकर सहयोग की ओर बढ़ना चाहिए। इस भाषण का संदर्भ स्पष्ट रूप से ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति और टैरिफ युद्ध से जुड़ा था, जो कई देशों को प्रभावित कर रहा है। पुतिन ने भी चीन के साथ “अभूतपूर्व ऊंचाई” वाले संबंधों की सराहना की, और कहा कि दोनों देश मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना करेंगे। मोदी ने अपने भाषण में एससीओ को “बहुपक्षीय सहयोग का प्रतीक” बताया और सदस्य देशों के बीच मजबूत संबंधों पर जोर दिया। इस बैठक का एक दिलचस्प पहलू था कि इसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी शामिल थे, लेकिन मोदी ने पाकिस्तान पर आतंकवाद को लेकर कड़ा रुख अपनाया, जिसमें उन्होंने “क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म” की निंदा की। कुल मिलाकर, यह सम्मेलन ट्रंप की नीतियों के खिलाफ एक एकजुटता का प्रदर्शन था, जहां एशियाई शक्तियां अपनी स्वतंत्रता दिखा रही थीं।
ताजा अपडेट
शी ने सम्मेलन के दौरान “ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव” की घोषणा की, जिसमें उन्होंने देशों से अपील की कि वे एक अधिक “न्यायपूर्ण और समान” वैश्विक व्यवस्था के लिए साथ काम करें। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि दुनिया को “दीवारें बनाने” के बजाय “एकीकरण” की ओर बढ़ना चाहिए, और “डिकपलिंग” (अलगाव) के बजाय सहयोग पर ध्यान देना चाहिए। यह घोषणा ट्रंप के टैरिफ और व्यापार प्रतिबंधों के संदर्भ में देखी जा रही है, जो चीन, भारत और रूस जैसे देशों को निशाना बना रहे हैं। सम्मेलन के अंत में, सभी नेताओं ने तियानजिन घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए, जो अमेरिकी नीतियों पर एक छिपा हुआ हमला लगता है। घोषणापत्र में “एकतरफा जबरदस्ती के उपायों” का विरोध किया गया, जिसमें आर्थिक प्रतिबंध शामिल हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ बताए गए। मोदी ने अपने बयान में सम्मेलन को भारत के लिए एक बड़ा “अवसर” बताया और एससीओ के फोकस पर सराहना की, खासकर “कनेक्टिविटी” और सदस्य देशों के बीच व्यापार पर। उन्होंने कहा, “भारत हमेशा से मानता है कि मजबूत कनेक्टिविटी न केवल व्यापार को बढ़ावा देती है, बल्कि विकास के नए दरवाजे खोलती है और देशों के बीच विश्वास को मजबूत करती है”। इसके अलावा, सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आतंकवाद विरोध जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई, जहां भारत ने अपनी “एक्ट ईस्ट” नीति को आगे बढ़ाया। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घोषणापत्र ट्रंप की टैरिफ नीति को चुनौती देता है, जो अब भारत पर 50% तक पहुंच गई है।
करीब से देखें
मोदी और पुतिन ने सम्मेलन से पहले एक लिमोजिन में सवारी की और लगभग एक घंटे तक एक-दूसरे से विस्तार से बात की। इस दौरान, उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की, जिसमें रक्षा, ऊर्जा और व्यापार शामिल थे। मोदी ने पुतिन से कहा कि “1.4 अरब भारतीय उत्साह से उनका इंतजार कर रहे हैं” जब पुतिन इस साल बाद में भारत आएंगे। शी और नरेंद्र मोदी की मुलाकात रविवार को हुई, जो दोनों पड़ोसी देशों के लिए महत्वपूर्ण थी। दोनों पक्षों के बयानों में जोर दिया गया कि भारत और चीन “साझेदार” हैं, न कि “प्रतिद्वंद्वी”, और उनके संबंध “पूरी मानवता के कल्याण” का आधार बन सकते हैं। बैठक में सीमा पर शांति बनाए रखने, मतभेदों को विवाद में न बदलने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति हुई। दोनों देशों ने सीधे उड़ानों को बहाल करने, वीजा प्रक्रिया को सरल बनाने और व्यापार बाधाओं को दूर करने का फैसला किया। मोदी ने शी से कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग एशिया की स्थिरता के लिए जरूरी है। पुतिन के साथ मोदी की बातचीत में रूसी तेल आयात पर विशेष ध्यान दिया गया, जहां भारत ने स्पष्ट किया कि वह अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखेगा। सितंबर 2025 में भारत के रूसी तेल आयात में 10-20% की वृद्धि की उम्मीद है, जो उसके कुल तेल आयात का 36% है और इससे भारत को 2.5 अरब डॉलर की बचत हो रही है। इसके अलावा, सम्मेलन में मोदी ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर चेतावनी दी, जिसमें उन्होंने “आतंकवाद के सभी रूपों” की निंदा की और सीमा पार आतंकवाद को रोकने की मांग की।
पंक्तियों के बीच
मोदी के नजरिए से यह पूरी भव्यता भारत को एक स्वतंत्र और शक्तिशाली वैश्विक खिलाड़ी के रूप में पेश करने का प्रयास है, जिसके पास रूस और चीन जैसे प्रभावशाली साझेदार हैं। ट्रंप के 50% टैरिफ, जो भारत के रूसी तेल खरीदने के कारण 27 अगस्त 2025 से दोगुने होकर लागू हुए, ने भारत में व्यापक गुस्सा पैदा किया है। ये टैरिफ रत्न, आभूषण, कपड़े, जूते, फर्नीचर, औद्योगिक रसायन और दवाओं जैसे क्षेत्रों को प्रभावित करेंगे, जिससे भारत के निर्यात में 36 अरब डॉलर तक की कमी आ सकती है। ट्रंप और उनकी टीम, जैसे पीटर नवरो, की अपमानजनक टिप्पणियां – जिसमें भारत को “ब्राह्मणों का फायदा उठाने वाला” कहा गया – ने भारतीय जनता में नाराजगी बढ़ाई है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर अमेरिका-भारत व्यापार को “पूरी तरह एकतरफा आपदा” बताया, जो भारत के लिए अपमानजनक था। मोदी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा, क्योंकि रूसी तेल सस्ता है और छूट बढ़ रही है – हाल ही में प्रति बैरल 20 डॉलर तक की छूट मिल रही है। शी के साथ संबंध सुधारकर, मोदी अमेरिका की दशकों की कोशिशों को कमजोर कर रहे हैं, जो भारत को चीन के खिलाफ खड़ा करना चाहती हैं। यह कदम भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति को दर्शाता है, जहां वह किसी एक पक्ष से बंधे बिना सभी से संबंध बनाए रखता है।
वास्तविकता जांच
हालांकि सिनो-भारतीय संबंधों में सुधार हुआ है, लेकिन वे अभी भी पूरी तरह गर्म नहीं हैं। 2020 के घातक सीमा संघर्ष, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे, अभी भी दोनों देशों के बीच तनाव का कारण हैं। इसके अलावा, तकनीक, 5जी नेटवर्क, और दक्षिण चीन सागर जैसे क्षेत्रीय प्रभाव पर विवाद बने हुए हैं। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि चीन और रूस के बीच “बिना सीमा वाला संबंध” समय के साथ कमजोर हो सकता है, क्योंकि चीन की बढ़ती शक्ति, सीमा चिंताएं और उत्तर कोरिया जैसे मुद्दों पर मतभेद उभर सकते हैं। अमेरिका-भारत संबंधों में यह व्यापारिक संकट द्विपक्षीय प्रगति को उलट सकता है, खासकर रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग में। ट्रंप की टैरिफ नीति ने भारत को रूस के और करीब धकेला है, जहां 2024-25 में रूसी तेल आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है। फिर भी, भारत अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखने की कोशिश करेगा, क्योंकि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए अमेरिका पर निर्भर है।
अभी के लिए, ट्रंप प्रशासन की तीनों शक्तियों – भारत, चीन और रूस – के बीच दूरी बनाने की इच्छा फल नहीं दे रही है। यह एससीओ सम्मेलन वैश्विक दक्षिण की एकजुटता का प्रदर्शन था, जहां ट्रंप की छाया मंडरा रही है, लेकिन गहरे मतभेद बने हुए हैं। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए रूस से तेल आयात जारी रखेगा, भले ही अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़े, और चीन के साथ संबंध सुधारकर बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करेगा। यह घटना दिखाती है कि वैश्विक राजनीति में संतुलन कैसे बदल रहा है, और भारत जैसे देश अपनी स्वतंत्र नीतियों से दुनिया को आकार दे रहे हैं।
