अंतरिम प्रधानमंत्री के नाम के बाद मार्च में होंगे नेपाल में चुनाव
नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने संसद को भंग करके 5 मार्च 2026 को नए चुनाव कराने का फैसला किया है, जो देश में हाल की घातक हिंसा और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद आया है। इस फैसले के साथ पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में अंतरिम आधार पर नियुक्त किया गया, जो भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों के बाद पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के इस्तीफे का नतीजा है।
यह घोषणा राष्ट्रपति कार्यालय से शुक्रवार देर शाम जारी एक बयान में की गई, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि “प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया गया है” और चुनाव की तारीख तय की गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम एक सप्ताह की हिंसक घटनाओं के बाद उठाया गया, जिसमें “जेन जी” यानी युवा पीढ़ी के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों ने नेपाल की राजनीति को हिला दिया, क्योंकि वे वर्षों की सबसे बड़ी उथल-पुथल थे। कम से कम 51 लोग मारे गए और 1,300 से ज्यादा घायल हुए, जिसमें पुलिस की गोलीबारी और झड़पें शामिल थीं। बीबीसी की रिपोर्ट्स बताती हैं कि प्रदर्शनकारी मुख्य रूप से युवा थे, जो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सरकारी नीतियों से त्रस्त थे। कार्की की नियुक्ति राष्ट्रपति पौडेल, सेना प्रमुख अशोक राज सिग्देल और प्रदर्शन नेताओं के बीच दो दिनों की गहन वार्ता के बाद हुई, जो एक समझौते का परिणाम थी। कार्की, जो 2016-2017 में मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं, को भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त रुख के लिए जाना जाता है, और उनकी नियुक्ति से उम्मीद की जा रही है कि अंतरिम सरकार सुधारों पर ध्यान देगी।
नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता कोई नई बात नहीं है। 2008 में राजशाही के समाप्त होने के बाद से देश ने कई सरकारें देखी हैं, लेकिन आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, पर्यटन और रेमिटेंस पर निर्भर है, लेकिन युवा बेरोजगारी की दर 20% से ऊपर है। अल जजीरा की रिपोर्ट्स के अनुसार, लाखों नेपाली युवा मध्य पूर्व, दक्षिण कोरिया, मलेशिया और अन्य देशों में प्रवासी मजदूर के रूप में काम करने जाते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था को तो सहारा देता है लेकिन सामाजिक असंतोष बढ़ाता है। इन प्रदर्शनों की शुरुआत सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध से हुई थी, जिसे सरकार ने 4 सितंबर को लागू किया था लेकिन बाद में वापस ले लिया। रॉयटर्स के अनुसार, यह प्रतिबंध फेसबुक समेत कई प्लेटफॉर्मों पर था, जो युवाओं के बीच सूचना प्रसार को रोकने का प्रयास था, लेकिन इससे उल्टा असर हुआ और विरोध तेज हो गया। हिंसा तब थमी जब ओली ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया, जो नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता हैं और कई बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
भारत की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय प्रभाव
नेपाल के दक्षिणी पड़ोसी भारत ने इन घटनाक्रमों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है, उम्मीद जताते हुए कि इससे शांति और स्थिरता आएगी। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट किया, “नेपाल की अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री बनने पर माननीय सुशीला कार्की जी को हार्दिक बधाई। भारत नेपाल के भाइयों और बहनों की शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।” भारत के विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी कर नेपाल के साथ मजबूत द्विपक्षीय संबंधों पर जोर दिया, जिसमें व्यापार, ऊर्जा और सीमा प्रबंधन शामिल हैं। द हिंदू अखबार की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत नेपाल को सालाना अरबों डॉलर की सहायता देता है, खासकर बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं में। नेपाल, जो चीन और भारत के बीच स्थित है, दोनों देशों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। चीन ने भी इन घटनाओं पर नजर रखी है, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिम सरकार के दौरान क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि नेपाल की विदेश नीति दोनों पड़ोसियों से प्रभावित होती है।
सामान्य स्थिति की वापसी और सामाजिक प्रभाव
शनिवार तक नेपाल में, जहां 3 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं, सामान्य स्थिति धीरे-धीरे लौट रही थी। राजधानी काठमांडू के अधिकांश इलाकों में दुकानें खुल गईं, बाजारों में चहल-पहल बढ़ी और सड़कों पर वाहन चलने लगे। मंगलवार से लागू निषेधाज्ञाएं (कर्फ्यू) हटा ली गईं, जिससे लोगों को राहत मिली। रॉयटर्स की रिपोर्ट्स बताती हैं कि प्रदर्शनों के दौरान संसद भवन, लग्जरी होटल और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया गया, जो elite वर्ग और भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से का प्रतीक था। द गार्जियन के अनुसार, ये विरोध “जेन जी” आंदोलन का हिस्सा थे, जो सोशल मीडिया के माध्यम से संगठित हुए और युवाओं की निराशा को दर्शाते हैं। अब जबकि हिंसा थम गई है, समाज में घाव भरने की जरूरत है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, घायलों में कई को गंभीर चोटें आईं, और अस्पतालों पर बोझ बढ़ा। पर्यटन उद्योग, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है, को भी नुकसान पहुंचा क्योंकि उथल-पुथल के दौरान पर्यटक घट गए।
तत्काल चुनौतियां और भविष्य की दिशा
नई अंतरिम सरकार के सामने कई तत्काल चुनौतियां हैं। मारे गए लोगों के रिश्तेदार काठमांडू में प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास बालुवाटार के बाहर जमा हुए, जो शहीद का दर्जा और मुआवजे की मांग कर रहे थे। शहीद का दर्जा देने से परिवारों को सरकारी लाभ मिलते हैं, जैसे पेंशन और सम्मान। कुछ परिवारों ने मांग पूरी होने तक शवों को मुर्दाघर से लेने से मना कर दिया। 21 साल के उमेश महत की बहन सुमित्रा महत ने कहा, “मेरा भाई देश के लिए मरा है, उसे शहीद घोषित किया जाए और सरकार मेरे माता-पिता को मुआवजा दे।” वे अन्य प्रभावित परिवारों के साथ एक बैनर लेकर खड़े थे, जिसमें मारे गए लोगों की तस्वीरें थीं। ज्यादातर का दावा था कि उनके रिश्तेदारों को पुलिस की गोली से मारा गया। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐसे मामलों में स्वतंत्र जांच की जरूरत है ताकि पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित हो।
कार्की की सरकार को अब भ्रष्टाचार विरोधी सुधार, आर्थिक स्थिरता और चुनाव की तैयारी पर ध्यान देना होगा। विश्व बैंक के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि नेपाल की जीडीपी वृद्धि दर 2024 में 4.6% रही, लेकिन महंगाई और बेरोजगारी चुनौतियां बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) सुझाव देता है कि नेपाल को निवेश बढ़ाने और नौकरियां पैदा करने के लिए सुधार करने चाहिए। प्रदर्शनकारियों की मांगों में सरकारी पारदर्शिता और युवा रोजगार योजनाएं शामिल हैं। मार्च के चुनाव से पहले, अंतरिम सरकार को संविधान के अनुसार काम करना होगा, और विशेषज्ञों का मानना है कि यह अवधि नेपाल के लोकतंत्र को मजबूत करने का मौका दे सकती है।
