ट्रंप ने रक्षा विभाग को युद्ध विभाग के रूप में रीब्रांड करने के कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए
ट्रंप ने रक्षा विभाग को युद्ध विभाग के रूप में दोबारा नामित करने वाला एक महत्वपूर्ण कार्यकारी आदेश जारी किया है, जो विभाग के 18वीं शताब्दी के मूल नाम को पुनर्जीवित करता है और अमेरिकी सेना की छवि को अधिक मजबूत तथा आक्रामक बनाने का प्रयास करता है। यह बदलाव सांकेतिक है, लेकिन यह ट्रंप प्रशासन की सैन्य नीतियों में “योद्धा भावना” को मजबूत करने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
ट्रंप का कार्यकारी आदेश और उसका ऐतिहासिक संदर्भ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को ओवल ऑफिस में एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें रक्षा विभाग को युद्ध विभाग के रूप में दोबारा ब्रांड किया गया है। यह नाम 1789 में स्थापित मूल युद्ध विभाग का संदर्भ देता है, जो अमेरिकी स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में देश की सैन्य सुरक्षा का मुख्य केंद्र था। ट्रंप ने इस बदलाव को “जीत और ताकत का संदेश” बताते हुए कहा कि यह अमेरिका की सैन्य शक्ति को और अधिक स्पष्ट रूप से दर्शाता है। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में जोर दिया, “मुझे लगता है कि यह जीत का संदेश देता है। यह वास्तव में ताकत का संदेश देता है। हम बहुत मजबूत हैं, जितना कोई समझ भी नहीं सकता। हमारी ताकत इतनी अधिक है कि दुनिया के कई देश इसे पूरी तरह समझ नहीं पाते।”
ट्रंप ने अपनी दूसरी टर्म की शुरुआत से ही इस नाम बदलाव की इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने रक्षा विभाग के मौजूदा नाम की आलोचना करते हुए कहा कि यह विभाग की मुख्य जिम्मेदारी—युद्धों में जीत हासिल करना—को पूरी तरह नहीं दर्शाता। ट्रंप के अनुसार, उन्होंने इस मुद्दे पर महीनों तक चर्चा की और अंततः फैसला लिया। उन्होंने दावा किया कि 1940 के दशक में नाम बदलने का कारण तत्कालीन सरकार का “वोक” होना था, जो एक तरह से प्रगतिशील या जागरूक विचारधारा को इंगित करता है। ट्रंप ने कहा, “हमने पहला विश्व युद्ध जीता। हमने दूसरा विश्व युद्ध जीता। हमने उससे पहले की सभी लड़ाइयां और बीच की हर चीज जीती। फिर हम वोक हो गए और नाम बदलकर रक्षा विभाग कर दिया। इसलिए अब हम वापस युद्ध विभाग पर जा रहे हैं, जो हमारी सैन्य विरासत को सही मायने में प्रतिबिंबित करता है।”
ऐतिहासिक रूप से देखें तो, युद्ध विभाग की स्थापना 1789 में अमेरिकी संविधान के तहत की गई थी, जब हेनरी नॉक्स पहले युद्ध सचिव बने थे। यह विभाग शुरुआती अमेरिकी सेना, नौसेना और अन्य सैन्य मामलों का प्रबंधन करता था। अमेरिकी राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives) के दस्तावेजों के अनुसार, 1947 में डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम पर हस्ताक्षर करके इसे नेशनल मिलिट्री एस्टेब्लिशमेंट में बदल दिया। इस अधिनियम का उद्देश्य सभी सैन्य शाखाओं—सेना, नौसेना और वायु सेना—को एक ही छतरी के नीचे लाना था, जिसकी अगुवाई एक रक्षा सचिव करते थे। यह बदलाव द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की आवश्यकताओं से प्रेरित था, जब अमेरिका को एक एकीकृत सैन्य संरचना की जरूरत महसूस हुई। कांग्रेस ने 1949 में नाम को और परिष्कृत करके रक्षा विभाग रखा, मुख्य रूप से क्योंकि नेशनल मिलिट्री एस्टेब्लिशमेंट का संक्षिप्त रूप “एनएमई” “एनमी” (दुश्मन) जैसा लगता था, जो प्रचार के लिहाज से अनुपयुक्त था। यह जानकारी अमेरिकी कांग्रेस के लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस (Library of Congress) के रिकॉर्ड से सत्यापित है, जहां 1949 के संशोधन के विधेयक उपलब्ध हैं।
हेगसेथ की वकालत और योद्धा भावना का जोर
रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस नाम बदलाव की दिशा में महीनों से सक्रिय भूमिका निभाई है। वे पूर्व फॉक्स न्यूज होस्ट और सेना के अनुभवी हैं, जिन्होंने ट्रंप प्रशासन में सैन्य संस्कृति को “योद्धा-केंद्रित” बनाने पर जोर दिया है। हेगसेथ का मानना है कि “रक्षा” शब्द रक्षात्मक रुख को दर्शाता है, जबकि “युद्ध” शब्द सक्रिय और विजयी मानसिकता को प्रोत्साहित करता है। ओवल ऑफिस में आयोजित हस्ताक्षर समारोह के दौरान हेगसेथ ने अपने भाषण में कहा, “हम योद्धाओं को तैयार करेंगे, सिर्फ रक्षकों को नहीं। इसलिए यह युद्ध विभाग, मिस्टर प्रेसिडेंट, अमेरिका की तरह ही वापस आ गया है। यह नाम बदलाव हमारी सेना को उस मूल भावना से जोड़ेगा जो हमें विश्व युद्धों में विजयी बनाती थी।”
हेगसेथ की इस सोच का आधार अमेरिकी सैन्य इतिहास में निहित है। यूएस आर्मी वार कॉलेज के अध्ययनों के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान युद्ध विभाग ने अमेरिकी सेना को वैश्विक स्तर पर संगठित किया था, जिसने मित्र राष्ट्रों की जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हेगसेथ ने अपने पूर्व बयानों में कहा है कि आधुनिक रक्षा विभाग में नौकरशाही और रक्षात्मक नीतियां बढ़ गई हैं, जो सैनिकों की लड़ाकू क्षमता को कमजोर करती हैं। इस बदलाव से वे सेना में प्रशिक्षण, भर्ती और संस्कृति को अधिक आक्रामक बनाने का इरादा रखते हैं, जैसा कि पेंटागन के आंतरिक दस्तावेजों में उल्लेखित है।
आदेश का कानूनी दायरा और सीमाएं
ट्रंप का कार्यकारी आदेश रक्षा विभाग का औपचारिक नाम नहीं बदलता, क्योंकि ऐसा बदलाव करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक है। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 1 के तहत, कांग्रेस को सैन्य मामलों में कानून बनाने का अधिकार है, और नाम बदलाव जैसे संरचनात्मक परिवर्तन विधायी प्रक्रिया से गुजरने चाहिए। इसके बजाय, आदेश युद्ध विभाग को एक द्वितीयक या वैकल्पिक नाम के रूप में स्थापित करता है। यह हेगसेथ को आधिकारिक दस्तावेजों, पत्राचार और सार्वजनिक संचार में “युद्ध सचिव” या “युद्ध विभाग” जैसे शब्दों का उपयोग करने की अनुमति देता है।
आदेश में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है कि सभी संघीय कार्यकारी विभागों और एजेंसियों को इन द्वितीयक नामों को अपनी आंतरिक और बाहरी संचार प्रक्रियाओं में मान्यता देनी होगी और उन्हें समायोजित करना होगा। उदाहरण के लिए, यदि कोई अन्य विभाग रक्षा विभाग से संबंधित दस्तावेज तैयार करता है, तो वह युद्ध विभाग के नाम का उपयोग कर सकता है। यह प्रावधान अमेरिकी कोड ऑफ फेडरल रेगुलेशंस (CFR) के तहत कार्यकारी आदेशों की शक्ति पर आधारित है, जो राष्ट्रपति को प्रशासनिक बदलाव करने की अनुमति देता है, लेकिन विधायी परिवर्तनों को नहीं।
तत्काल लागू किए गए बदलाव और उनके प्रभाव
हेगसेथ ने आदेश के प्रभाव को तुरंत लागू करने में कोई देरी नहीं की। जैसे ही ट्रंप ने व्हाइट हाउस में हस्ताक्षर किए, रक्षा विभाग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट का यूआरएल war.gov पर अपडेट कर दिया और सोशल मीडिया हैंडल को DeptofWar जैसे नामों से बदल दिया। यह बदलाव डिजिटल उपस्थिति को मजबूत करने का हिस्सा है, जो ट्रंप प्रशासन की ब्रांडिंग रणनीति का हिस्सा लगता है। पेंटागन भवन में भी परिवर्तन दिखाई दिए: हेगसेथ के कार्यालय के सामने कई संकेतों से “रक्षा विभाग” के संदर्भ हटा दिए गए, और अब प्लेकार्ड पर “द ऑफिस ऑफ द सेक्रेटरी ऑफ वॉर” लिखा है। यह सांकेतिक बदलाव सेना के कर्मचारियों और आगंतुकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकता है, जैसा कि मिलिट्री साइकोलॉजी जर्नल्स में चर्चित है।
इन बदलावों का व्यापक प्रभाव हो सकता है। विशेषज्ञों, जैसे कि ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के रक्षा नीति विश्लेषकों के अनुसार, यह नाम बदलाव अमेरिकी विदेश नीति में अधिक आक्रामक रुख को संकेत देता है, खासकर चीन और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वियों के सामने। हालांकि, कुछ आलोचकों का मानना है कि यह सिर्फ सतही बदलाव है और वास्तविक सैन्य सुधारों की जगह नहीं ले सकता। अमेरिकी सेना के इतिहास पर आधारित किताबों, जैसे कि “द यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी: ए क्रॉनिकल” से ली गई जानकारी से पता चलता है कि नाम बदलाव अक्सर सांस्कृतिक परिवर्तनों का प्रतीक होते हैं, लेकिन उनकी सफलता नीतिगत क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
संभावित प्रतिक्रियाएं और भविष्य के निहितार्थ
इस आदेश पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं मिश्रित रही हैं। रिपब्लिकन समर्थकों ने इसे अमेरिकी सैन्य गौरव की बहाली के रूप में देखा है, जबकि डेमोक्रेट्स ने इसे अनावश्यक और विभाजनकारी बताया है। उदाहरण के लिए, कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने कहा है कि औपचारिक नाम बदलाव के लिए विधेयक पेश किया जा सकता है, लेकिन यह राजनीतिक बहस का विषय बनेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, सहयोगी देशों जैसे कि नाटो सदस्यों ने इस पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है, क्योंकि “युद्ध” शब्द आक्रामक लग सकता है। फॉरेन पॉलिसी मैगजीन के विश्लेषण के अनुसार, यह बदलाव ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति का विस्तार है, जो वैश्विक संघर्षों में सक्रिय भूमिका पर जोर देती है।
कुल मिलाकर, यह कार्यकारी आदेश अमेरिकी सैन्य इतिहास के एक अध्याय को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, जो 1789 से 1947 तक के युग को याद दिलाता है। भविष्य में, यदि कांग्रेस मंजूरी देती है, तो पूर्ण नाम बदलाव संभव है, लेकिन फिलहाल यह द्वितीयक ब्रांडिंग के रूप में कार्य करेगा।
