अफ़ग़ान तालिबान से लड़ रहा है पाकिस्तान, बड़े युद्ध की आशंका
पाकिस्तानी सेना और अफगान तालिबान के बीच वीकेंड पर हुई जोरदार लड़ाई ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है, जो 2021 में तालिबान की काबुल में सत्ता हासिल करने के बाद से सबसे घातक संघर्ष साबित हो रही है। इस संघर्ष की शुरुआत 9 अक्टूबर 2025 को हुई जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के काबुल, खोस्त, जलालाबाद और पक्तिका प्रांतों में हवाई हमले किए, जिनका मुख्य निशाना तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के ठिकाने थे। इन हमलों में टीटीपी के नेता नूर वली मेहसूद को निशाना बनाया गया था, हालांकि टीटीपी ने एक ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी कर दावा किया कि वह जिंदा हैं।
दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर भारी नुकसान पहुंचाने के दावे किए हैं, लेकिन ये आंकड़े स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हो सके हैं। तालिबान ने रविवार को घोषणा की कि सीमा पर रात भर चली उनकी कार्रवाइयों में 58 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, 30 घायल हुए और 25 पाकिस्तानी सेना चौकियों पर कब्जा कर लिया गया। वहीं, पाकिस्तान की सेना ने हानि के आंकड़ों को काफी कम बताते हुए कहा कि उसके 23 सैनिक शहीद हुए, जबकि उन्होंने 200 से अधिक अफगान लड़ाकों को मार गिराया और 19 से 21 अफगान चौकियों पर कब्जा किया। तालिबान ने अपने पक्ष से केवल नौ सैनिकों के मारे जाने की बात कही, लेकिन पाकिस्तानी ड्रोन हमलों में कंधार और हेलमंद प्रांतों में 19 तालिबान लड़ाकों की मौत की अनियंत्रित रिपोर्ट्स भी सामने आई हैं।
इन दावों की पुष्टि मुश्किल है क्योंकि 2,600 किलोमीटर लंबी दुर्गम डूरंड लाइन सीमा क्षेत्र तक पहुंच पर सख्त पाबंदियां हैं, और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भी सीमित पहुंच मिली है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स और रॉयटर्स जैसे विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार, ऐसे संघर्षों में दोनों पक्ष अक्सर अतिरंजित आंकड़े पेश करते हैं, लेकिन वास्तविक क्षति हमेशा कम साबित होती है, जो स्थिति को और जटिल बनाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये झड़पें न केवल सैन्य बल्कि आर्थिक और मानवीय संकट को भी जन्म दे रही हैं।
पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच लड़ाई क्यों?
ये दोनों देश कभी करीबी सहयोगी थे, खासकर सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान जब पाकिस्तान ने तालिबान को समर्थन दिया था, लेकिन संबंध अब उलटे पड़ गए हैं। तनाव की जड़ इस्लामाबाद की मांग है कि काबुल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे पाकिस्तान-विरोधी गुटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे, जो अफगान तालिबान से वैचारिक रूप से जुड़े हैं। टीटीपी का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सख्त इस्लामी शासन लागू करना है, जो अफगानिस्तान की सीमा से सटा हुआ है और पश्तून बहुल क्षेत्र है।
पाकिस्तान सरकार का आरोप है कि टीटीपी अफगान मिट्टी से सुरक्षित ठिकानों पर हमले करता है, जबकि अफगान तालिबान इसकी साफ मनाही करते हैं। हाल के वर्षों में टीटीपी के हमले तेज हो गए हैं; उदाहरण के लिए, 8 अक्टूबर 2025 को कुर्रम जिले में टीटीपी ने पाकिस्तानी सेना के काफिले पर हमला कर 11 सैनिकों समेत दो अधिकारियों को मार गिराया। इस साल जनवरी से 15 सितंबर तक टीटीपी के हमलों में 500 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें 311 सैनिक और 73 पुलिसकर्मी शामिल थे, जैसा कि एएफपी ने पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता के हवाले से बताया। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में पाया गया कि टीटीपी को काबुल की “द फॉक्चुओ अथॉरिटीज” यानी तालिबान सरकार से भारी लॉजिस्टिकल, हथियारों और प्रशिक्षण की मदद मिलती है, जो पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा है।
पाकिस्तान ने भारत पर भी टीटीपी और अन्य विद्रोही गुटों को समर्थन देने का आरोप लगाया है, ताकि देश को अंदर से कमजोर किया जा सके, लेकिन भारत इन दावों को सिरे से खारिज करता है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान खुद भारत के कश्मीर क्षेत्र में सक्रिय अलगाववादी गुटों को हवाला और प्रशिक्षण देता है, जो लंबे समय से चल रहे क्षेत्रीय विवादों का हिस्सा है। विल्सन सेंटर के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन की रिपोर्ट्स के अनुसार, ये पारस्परिक आरोप दोनों देशों को एक-दूसरे के खिलाफ उकसाते रहते हैं, जिससे सीमा पर तनाव लगातार बना रहता है। इतिहास में देखें तो 2007 से ही अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर छोटे-मोटे संघर्ष होते रहे हैं, लेकिन 2021 के बाद तालिबान की सत्ता से ये और गंभीर हो गए हैं।
नाजुक सीमा स्थिति
पिछले हफ्ते अफगान तालिबान ने पाकिस्तान पर काबुल और पूर्वी अफगानिस्तान के एक बाजार पर हवाई बमबारी का गंभीर आरोप लगाया, जो 9 अक्टूबर की रात को अब्दुल हक स्क्वायर के पास हुआ था। पाकिस्तान सरकार ने इन हमलों की सीधी पुष्टि या खंडन नहीं किया, लेकिन बार-बार जोर देकर कहा है कि सीमा पार बढ़ते उग्रवाद के खिलाफ आत्मरक्षा का अधिकार है, जिसमें ड्रोन और हवाई कार्रवाइयां शामिल हैं। अफगान तालिबान ने 11 अक्टूबर की देर रात पाकिस्तानी सैनिकों पर हमला करने का दावा किया, जो “पाकिस्तानी सेना द्वारा काबुल और अन्य क्षेत्रों पर किए गए हवाई हमलों का बदला” था।
ये झड़पें 11-12 अक्टूबर की रात को कम से कम पांच स्थानों पर भड़कीं, जहां तालिबान ने पाकिस्तानी चौकियों पर समन्वित हमले किए, जबकि पाकिस्तान ने अफगान पक्ष पर जवाबी कार्रवाई जारी रखी। वाशिंगटन स्थित दक्षिण एशिया विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने डीडब्ल्यू को बताया कि ये ताजा झड़पें “इस्लामाबाद की असफलता से उपजी हैं, जो अफगानिस्तान आधारित पाकिस्तान-विरोधी आतंकवाद को रोकने में नाकाम रहा है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत, सीमित सैन्य अभियानों और राजनयिक प्रयासों के बावजूद सफलता नहीं मिली, जिसके चलते पाकिस्तान ने अब अफगानिस्तान के अंदर लक्षित काउंटर-टेरर ऑपरेशंस तेज कर दिए हैं। इससे तालिबान की प्रतिक्रिया भड़क गई, जो सीमा पर चौकियों को निशाना बना रही है। फिलहाल 12 अक्टूबर की शाम तक लड़ाई थम गई लगती है, लेकिन स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है, और दोनों पक्षों के सैन्य बल अभी भी हाई अलर्ट पर हैं।
इन झड़पों के कारण दोनों देशों के बीच 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा पर व्यापार पूरी तरह ठप हो गया है, क्योंकि पाकिस्तान ने तोरखम और चमन जैसे प्रमुख क्रॉसिंग पॉइंट्स को दूसरे दिन भी बंद रखा। रॉयटर्स के अनुसार, एक पाकिस्तानी उद्योग प्रतिनिधि ने बताया कि सैकड़ों लदे ट्रक और कंटेनर दोनों तरफ फंस गए हैं, जिससे दैनिक व्यापार का नुकसान करोड़ों डॉलर का हो रहा है। अफगानिस्तान के लिए यह सीमा जीवन रेखा है, क्योंकि 80% से अधिक निर्यात पाकिस्तान के रास्ते होता है, और इस बंदी से खाद्य सामग्री और ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस ने दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश की है।
क्या टीटीपी के हमले बढ़ेंगे?
अफगानिस्तान के पूर्व राजदूत और अटलांटिक काउंसिल के वरिष्ठ फेलो ओमर समद ने डीडब्ल्यू को बताया कि दोनों पक्षों के बीच यह शत्रुता “व्यापक हिंसा और सैन्य कार्रवाई में बदल सकती है, जो वर्तमान झड़पों से कहीं आगे निकल जाएगी।” इससे两国 के रिश्तों को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है, खासकर जब दोनों पहले से ही आर्थिक और राजनीतिक संकटों से जूझ रहे हैं। समद ने चेतावनी दी कि पिछले दो सालों से पाकिस्तानी सेना और अफगान सरकार के बीच तनाव बढ़ रहा है, जो गलतफहमियों, रणनीतिक भूलों और खराब प्रबंधन से उपजा है, जिसने सीमा को युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है।
कुगेलमैन का मानना है कि इस संकट का प्रमुख परिणाम टीटीपी के बदले के हमलों में भारी इजाफा हो सकता है, क्योंकि टीटीपी का पाकिस्तान में मजबूत नेटवर्क है, भले ही उसका मुख्यालय अफगानिस्तान में हो। उन्होंने कहा कि अफगान तालिबान पाकिस्तानी सेना का सीधा मुकाबला नहीं कर सकते, लेकिन सीमा चौकियों पर घात लगाकर हमले कर सकते हैं, जो टीटीपी को प्रोत्साहन देगा। इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के कार्यकारी निदेशक और सुरक्षा विशेषज्ञ इम्तियाज गुल ने भी सहमति जताई। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, “अफगानिस्तान के साथ इन झड़पों के बाद पाकिस्तान को टीटीपी से उग्रवाद का खतरा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ेगा, क्योंकि 2025 में ही टीटीपी ने दर्जनों हमले किए हैं।” गुल ने सलाह दी कि अब काउंटर-टेरर ऑपरेशंस को मजबूत करने, खुफिया नेटवर्क को अपग्रेड करने और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने की जरूरत है ताकि आतंकवाद की जड़ों को उखाड़ा जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर तालिबान टीटीपी को समर्थन देता रहा, तो पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में अस्थिरता और बढ़ेगी।
दोनों सरकारों के बीच रिश्ते भले ही खराब हों, लेकिन पिछले साल से सुधार की कोशिशें जारी हैं, जैसे कि मई 2025 में पाकिस्तान का घोषणा कि वह अफगान तालिबान के साथ राजनयिक संबंधों को मजबूत करेगा और काबुल में राजदूत भेजेगा, हालांकि पूर्ण मान्यता अभी नहीं दी गई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि अफगानिस्तान को “भारत की तरह करारा जवाब” मिलेगा, लेकिन साथ ही कूटनीति पर जोर दिया। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने सीमा पर जाकर फ्रंटलाइन का निरीक्षण किया, जबकि अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि उनकी कार्रवाई “अस्थायी विराम” पर है।
दोनों पड़ोसी देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और जन-से-जन के गहरे रिश्ते हैं, जो पश्तून संस्कृति और व्यापार पर आधारित हैं। पिछले 40 सालों के युद्धों से प्रभावित अफगानिस्तान से लाखों शरणार्थी पाकिस्तान में बस गए, जहां उन्होंने समुदाय बनाए। लेकिन तालिबान के साथ तनाव बढ़ने पर 2023 में पाकिस्तान ने लगभग 4 मिलियन अफगानों को वापस भेजने का अभियान शुरू किया, जिसमें अब तक 800,000 से अधिक को निर्वासित किया गया। इससे काबुल में गुस्सा भड़का, और काबुल में पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शन हुए। कतर और सऊदी अरब की अपील पर तालिबान ने युद्धविराम स्वीकार किया, जो राजनयिक हस्तक्षेप का संकेत है।
समद ने जोर देकर कहा कि दोनों पक्षों को झगड़ालू रवैये के बजाय रचनात्मक बातचीत पर ध्यान देना चाहिए। “दोनों देशों में कमजोरियां और ताकतें हैं जो एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं; अफगानिस्तान के पास सैन्य असमानता के बावजूद खोने को ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन पाकिस्तान आंतरिक fragility से जूझ रहा है।” उन्होंने जोड़ा, “अब राजनयिक कौशल, सावधानी और ईमानदार संवाद का समय है; धोखे, बहानों और दिखावे के लिए कोई जगह नहीं बची है, वरना क्षेत्रीय अस्थिरता सभी को निगल लेगी।” विशेषज्ञों की राय है कि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, जैसे अमेरिका या संयुक्त राष्ट्र की, तनाव कम करने में मदद कर सकती है।
यह जानकारी अल जज़ीरा और बीबीसी से एकत्र की गई है।
