अफगानिस्तान में वार्ता के बीच पाकिस्तान में सीमा पर हिंसक झड़प
पाकिस्तान की सेना ने रविवार को एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए बताया कि अफगानिस्तान की सीमा के निकटवर्ती क्षेत्र में हुई हिंसक झड़पों में कम से कम पांच पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हो गई, जबकि 25 से अधिक हथियारबंद लड़ाके मारे गए। ये घटनाएं खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में हुईं, जहां सीमा पर तैनात पाकिस्तानी सेना ने कथित अफगान घुसपैठियों का मुकाबला किया। पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने कहा कि ये हमले रविवार की सुबह शुरू हुए और कई घंटों तक चले, जिसमें भारी गोलीबारी और मोर्टार हमलों का इस्तेमाल हुआ। ये झड़पें न केवल सैन्य बलों के बीच थीं, बल्कि इससे आसपास के सीमावर्ती गांवों में भी दहशत फैल गई, जहां स्थानीय लोग लंबे समय से ऐसी हिंसा का सामना कर रहे हैं।
ये हमले ऐसे समय पर हुए हैं जब अफगान और पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल तुर्की के इस्तांबुल शहर में महत्वपूर्ण शांति वार्ता कर रहे हैं। ये वार्ताएं हाल ही में घोषित सीजफायर के बाद शुरू हुई हैं, जो दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने का प्रयास हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स, जैसे डीडब्ल्यू (DW) की खबरों से पता चलता है कि ये बातचीत अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा सुरक्षा, आतंकवाद रोकथाम और व्यापारिक सहयोग पर केंद्रित हैं। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से ये सीमा पर हुई अब तक की सबसे घातक लड़ाई थी, जो इस महीने की शुरुआत में शुरू हुई थी। उस समय की गोलीबारी में सैनिकों के अलावा कुछ नागरिक भी हताहत हुए थे, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ गई। विशेषज्ञों का मानना है कि ये घटनाएं दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित कर रही हैं, जहां अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा, जिसे डुरंड लाइन के नाम से जाना जाता है, लंबे समय से विवाद का विषय बनी हुई है। इस सीमा की लंबाई लगभग 2,640 किलोमीटर है, और यह पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरती है, जो घुसपैठ और तस्करी को आसान बनाती है।
सीमा पर घुसपैठ की कोशिश, पाकिस्तान ने लगाए अफगानिस्तान पर गंभीर आरोप
पाकिस्तान की सेना के मीडिया विंग, इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) ने विस्तृत बयान में कहा कि अफगान मूल के हथियारबंद समूहों ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के दो अलग-अलग स्थानों पर सीमा पार करने का प्रयास किया। पहला हमला बाजौर जिले के निकट हुआ, जहां पाकिस्तानी चौकियों पर सीधा हमला बोला गया, जबकि दूसरा कुर्रम एजेंसी के पास था, जो पाराचिनार शहर के आसपास का संवेदनशील इलाका है। ISPR के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की, जिसमें ड्रोन निगरानी और आर्टिलरी फायरिंग का इस्तेमाल किया गया। इस कार्रवाई में मारे गए लड़ाकों को “आतंकवादी” करार दिया गया, और सेना ने दावा किया कि उनके पास हथियारों का बड़ा जखीरा बरामद हुआ, जिसमें रॉकेट लॉन्चर और ग्रेनेड शामिल थे।
सेना ने इन घटनाओं के समय पर गंभीर सवाल उठाए हैं, कहा कि इससे अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार की मंशा पर संदेह होता है, विशेष रूप से उसके इलाके से पाकिस्तान की ओर निर्देशित आतंकवाद को रोकने के वादों पर। ISPR ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अफगानिस्तान को दोहा समझौते (2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच हुआ) के तहत अपनी जिम्मेदारियां पूरी करनी चाहिए, जिसमें अपने देश की मिट्टी का इस्तेमाल पड़ोसी देशों के खिलाफ न करने का वादा शामिल है। पाकिस्तान का यह रुख लंबे समय से बना हुआ है; विभिन्न रिपोर्ट्स, जैसे यूनाइटेड नेशंस की सुरक्षा परिषद की दस्तावेजों और बीबीसी की जांच से साबित होता है कि तालिबान शासन के बाद अफगान मिट्टी पर सक्रिय समूह जैसे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत (ISKP) ने पाकिस्तान में कई हमले किए हैं। TTP ने खुद कई बार जिम्मेदारी ली है, और पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान इन समूहों को पनाह दे रहा है, जबकि काबुल इन दावों को सिरे से खारिज करता है।
इस सीमा विवाद की जड़ें ऐतिहासिक हैं। डुरंड लाइन 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच खींची गई थी, लेकिन अफगानिस्तान इसे कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। 2021 के बाद से तालिबान के सत्ता में आने पर पाकिस्तान ने उम्मीद की थी कि आतंकवाद कम होगा, लेकिन इसके उलट हमले बढ़ गए हैं। इस महीने की शुरुआती झड़पों में, जो 10 दिनों पहले हुईं, कम से कम 10 पाकिस्तानी सैनिक और कई नागरिक मारे गए थे। ये घटनाएं सीमावर्ती इलाकों के निवासियों के लिए दैनिक खतरा बन गई हैं, जहां स्कूल बंद हो जाते हैं और बाजार प्रभावित होते हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों, जैसे इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की रिपोर्ट्स से पता चलता है कि ये तनाव न केवल सैन्य बलों को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि मानवीय संकट भी पैदा कर रहे हैं, जिसमें विस्थापन और आर्थिक नुकसान शामिल है।
शांति वार्ता में सफलता की उम्मीद, लेकिन युद्ध की धमकी ने बढ़ाई चिंता
पिछली गोलीबारी के तुरंत बाद, जो इस महीने की शुरुआत में हुई थी, दोनों देशों ने एक 48 घंटे का शुरुआती सीजफायर घोषित किया था। यह समझौता कतर की मध्यस्थता से हुआ था, लेकिन यह केवल दो दिन ही चला, क्योंकि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगाया। इसके बाद, कतर और तुर्की की संयुक्त मध्यस्थता से पिछले रविवार को दूसरा युद्धविराम लागू किया गया, जो अब तक बरकरार है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सीजफायर मजबूती से कायम है, और उन्हें विश्वास है कि अफगानिस्तान भी शांति की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। उन्होंने वार्ता की प्रगति पर संतोष जताया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि अगर इस्तांबुल की चल रही बातचीत में कोई ठोस समझौता नहीं हुआ, तो स्थिति “खुली जंग” में बदल सकती है, जो पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर देगी।
इस्तांबुल में हो रही ये वार्ताएं अफगानिस्तान के सुरक्षा सलाहकार हमदुल्लाह मोहिब और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोइजुद्दीन वान के नेतृत्व में चल रही हैं। चर्चा के मुख्य बिंदु सीमा पर निगरानी बढ़ाना, आतंकवादी समूहों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई, और व्यापारिक रास्तों को फिर से खोलना हैं। विश्वसनीय स्रोतों जैसे रॉयटर्स और अल जजीरा की रिपोर्ट्स से स्पष्ट है कि ये वार्ताएं क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मध्य एशिया में अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव से न केवल दोनों देशों का आर्थिक विकास रुक जाता है, बल्कि ईरान, चीन और भारत जैसे पड़ोसी देश भी प्रभावित होते हैं। तालिबान सरकार ने वार्ता के दौरान आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है, जिसमें TTP जैसे समूहों को अफगान मिट्टी से हटाने का वादा शामिल है। हालांकि, पाकिस्तान को इन वादों पर अमल की मांग है, क्योंकि पिछले सालों में कई ऐसे समझौते टूट चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत के अनुसार, इन वार्ताओं से न केवल सैन्य तनाव कम होगा, बल्कि सीमावर्ती व्यापार, जो सालाना अरबों डॉलर का है, को भी बढ़ावा मिलेगा। लेकिन अगर वार्ता विफल हुई, तो विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन और मानवीय संकट हो सकता है, जैसा कि 2021 के बाद देखा गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का हस्तक्षेप, जल्द समाधान का दावा
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव पर सीधा हस्तक्षेप का संकेत दिया है। मलेशिया के कुआलालंपुर में चल रहे आसियान शिखर सम्मेलन के साइडलाइन्स पर ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, “मैंने सुना है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फिर से तनाव भड़क गया है, लेकिन मैं इसे बहुत जल्द सुलझा लूंगा।” ट्रंप का यह बयान उनकी विदेश नीति की शैली को दर्शाता है, जहां वे दक्षिण एशिया के मुद्दों पर प्रत्यक्ष मध्यस्थता की भूमिका निभाते रहे हैं। 2025 में दोबारा चुने गए ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद भी क्षेत्र में रुचि बनाए रखी है, खासकर आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा के संदर्भ में।
अमेरिका की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है; दोहा समझौते में उनकी मध्यस्थता ने तालिबान को सत्ता सौंपने में मदद की थी। हालांकि, तालिबान शासन के बाद अमेरिका का प्रभाव कुछ कम हुआ है, लेकिन ट्रंप के बयान से संकेत मिलता है कि वे फिर से सक्रिय हो सकते हैं। विशेषज्ञों, जैसे काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका की भागीदारी से वार्ताओं को वैधता मिल सकती है और दोनों पक्षों पर दबाव बढ़ सकता है। ट्रंप ने आगे कहा कि वे आसियान नेताओं के साथ भी इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे, जो दर्शाता है कि यह विवाद वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। कुल मिलाकर, ट्रंप का हस्तक्षेप शांति प्रक्रिया को गति दे सकता है, लेकिन सफलता के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान को भी ईमानदार प्रयास करने होंगे।
कुल मिलाकर, ये सीमा झड़पें और चल रही वार्ताएं दक्षिण एशिया की जटिल भू-राजनीति को उजागर करती हैं। शांति न केवल दोनों देशों के सैनिकों और नागरिकों के लिए जरूरी है, बल्कि पूरे क्षेत्र के आर्थिक विकास, व्यापार और सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, जिसमें संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और पड़ोसी देश शामिल हैं, इन वार्ताओं की सफलता की प्रतीक्षा कर रहा है ताकि और जानों की क्षति रोकी जा सके और स्थिरता बहाल हो। हाल के वर्षों में ऐसी घटनाओं से लाखों लोग प्रभावित हुए हैं, और अब उम्मीद है कि कूटनीति हिंसा पर भारी पड़ेगी।
यह जानकारी एम. एस. एन. और काबुल नाउ से एकत्र की गई है।
