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नोबेल पुरस्कार 2025: मैरी ब्रंको, फ्रेड रैम्सडेल, शिमोन सकागुची को चिकित्सा पुरस्कार

2025 का नोबेल पुरस्कार फिजियोलॉजी या मेडिसिन श्रेणी में अमेरिकी वैज्ञानिकों मैरी ई. ब्रंकॉ और फ्रेड राम्सडेल तथा जापानी वैज्ञानिक शिमोन सकागुची को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है। यह पुरस्कार उनकी उन क्रांतिकारी खोजों के लिए है जिन्होंने शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के रहस्यों को उजागर किया, विशेष रूप से यह समझाया कि कैसे इम्यून सिस्टम अपने ही ऊतकों पर हमला करने से बचता है।

नोबेल समिति ने कहा कि इन वैज्ञानिकों ने पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस की अवधारणा को स्थापित किया, जो इम्यून सिस्टम को नियंत्रित रखने का एक महत्वपूर्ण तंत्र है। उनकी खोजों से ऑटोइम्यून बीमारियों, कैंसर के इलाज और अंग प्रत्यारोपण की सफलता दर में सुधार की नई संभावनाएं खुली हैं। दुनिया भर में लाखों लोग रूमेटॉइड आर्थराइटिस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, ल्यूपस और टाइप-1 डायबिटीज जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं, और ये खोजें इनके खिलाफ लड़ाई को मजबूत बनाती हैं।

यह पुरस्कार 11 मिलियन स्वीडिश क्रोना (लगभग 10 लाख अमेरिकी डॉलर) का है, जो तीनों में बराबर बंटेगा। घोषणा स्टॉकहोम के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट से हुई, और यह 2025 के नोबेल पुरस्कारों की पहली घोषणा थी।

विजेताओं का विस्तृत परिचय

मैरी ई. ब्रंकॉ का जन्म 1961 में अमेरिका में हुआ। उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में पीएचडी प्राप्त की, जहां उन्होंने जेनेटिक रिसर्च पर फोकस किया। वर्तमान में वे सिएटल, वाशिंगटन में इंस्टीट्यूट फॉर सिस्टम्स बायोलॉजी में सीनियर प्रोग्राम मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। उनकी रिसर्च मुख्य रूप से इम्यून सिस्टम की जेनेटिक आधार पर केंद्रित रही है, और स्कर्फी चूहों की स्टडी में उनके योगदान ने फॉक्सपी3 जीन की पहचान में अहम भूमिका निभाई। ब्रंकॉ ने कई वर्षों तक जीन मैपिंग और म्यूटेशन एनालिसिस पर काम किया, जो ऑटोइम्यून डिसऑर्डर्स की समझ को गहरा बनाने वाली साबित हुई।

फ्रेड राम्सडेल का जन्म 1960 में हुआ। 1987 में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स से इम्यूनोलॉजी में पीएचडी की। उनके करियर की शुरुआत जेनेटिक रिसर्च लैब्स में हुई, जहां उन्होंने X क्रोमोसोम से जुड़ी बीमारियों पर अध्ययन किया। अब वे सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया में सोनोमा बायोथेरेप्यूटिक्स नामक बायोटेक कंपनी में साइंटिफिक एडवाइजर के रूप में काम कर रहे हैं। राम्सडेल ने ब्रंकॉ के साथ मिलकर स्कर्फी म्यूटेंट चूहों पर लंबे समय तक रिसर्च की, जिसमें डीएनए सीक्वेंसिंग और जेनेटिक रेस्क्यू एक्सपेरिमेंट्स शामिल थे। उनके काम ने साबित किया कि फॉक्सपी3 जीन की गड़बड़ी से इम्यून सिस्टम असंतुलित हो जाता है।

शिमोन सकागुची का जन्म 1951 में जापान में हुआ। 1976 में क्योटो यूनिवर्सिटी से उन्होंने मेडिसिन में एमडी डिग्री हासिल की, और 1983 में इम्यूनोलॉजी में पीएचडी पूरी की। वे क्योटो यूनिवर्सिटी और उसके बाद टोक्यो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे, और वर्तमान में ओसाका यूनिवर्सिटी के इम्यूनोलॉजी फ्रंटियर रिसर्च सेंटर में डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर हैं। सकागुची का रिसर्च करियर 1980 के दशक से इम्यून टॉलरेंस पर केंद्रित रहा। 1995 में उनकी एक महत्वपूर्ण खोज ने रेगुलेटरी टी सेल्स को दुनिया के सामने लाया। वे कई अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में पब्लिश्ड हैं और इम्यूनोलॉजी के क्षेत्र में सैकड़ों पेपर्स के लेखक हैं।

प्रतिरक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण कार्य: पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस

हमारा शरीर हर दिन हजारों सूक्ष्म जीवों—जैसे बैक्टीरिया, वायरस और फंगी—के हमलों का सामना करता है। प्रतिरक्षा प्रणाली इन विदेशी आक्रमणकारियों को पहचानती है और नष्ट कर देती है, लेकिन कभी-कभी ये रोगाणु मानव कोशिकाओं की नकल करके छिप जाते हैं। अगर इम्यून सिस्टम गलती से अपने ही कोशिकाओं या ऊतकों पर हमला कर दे, तो ऑटोइम्यून बीमारियां हो जाती हैं, जैसे थायरॉइड की सूजन, पैंक्रियास का नुकसान या जोड़ों की जकड़न।

पेरिफेरल इम्यून टॉलरेंस इसी समस्या का समाधान है। यह थाइमस ग्रंथि के बाहर—यानी शरीर के बाहरी भागों में—होने वाली प्रक्रिया है, जहां इम्यून सिस्टम को नियंत्रित रखा जाता है। पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि इम्यून टॉलरेंस सिर्फ सेंट्रल टॉलरेंस से होता है, जिसमें थाइमस में हानिकारक टी सेल्स को नष्ट कर दिया जाता है। लेकिन इन नोबेल विजेताओं ने साबित किया कि एक अतिरिक्त सुरक्षा परत मौजूद है—रेगुलेटरी टी सेल्स। ये सेल्स इम्यून सिस्टम की ‘सिक्योरिटी गार्ड्स’ की तरह काम करती हैं, जो अन्य इम्यून कोशिकाओं को चेक रखती हैं।

टी सेल्स इम्यून सिस्टम का मुख्य हिस्सा हैं। हेल्पर टी सेल्स (सीडी4+) इम्यून रिस्पॉन्स को सक्रिय करती हैं, जबकि किलर टी सेल्स (सीडी8+) संक्रमित कोशिकाओं को मारती हैं। लेकिन रेगुलेटरी टी सेल्स (सीडी4+ सीडी25+) इन सबको संतुलित रखती हैं। ये सेल्स एलर्जेंस, गट माइक्रोबायोटा और पर्यावरणीय एजेंट्स के खिलाफ अत्यधिक प्रतिक्रिया को रोकती हैं। बिना इनके, सामान्य इम्यून रिस्पॉन्स अनियंत्रित हो सकती है।

शिमोन सकागुची की 1995 की क्रांतिकारी खोज

1995 में शिमोन सकागुची ने इम्यूनोलॉजी के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखा। उस समय प्रचलित धारणा थी कि इम्यून टॉलरेंस सिर्फ थाइमस में सेंट्रल टॉलरेंस से होता है। सकागुची ने चूहों पर एक्सपेरिमेंट्स किए, जहां उन्होंने सीडी4+ टी सेल्स को इंजेक्ट किया। सामान्य रूप से ये हेल्पर सेल्स इम्यून सिस्टम को जागृत करती हैं, लेकिन सकागुची के एक्सपेरिमेंट में इम्यून सिस्टम दब गया। इससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सीडी4+ सेल्स के अलग-अलग प्रकार होते हैं।

इस हाइपोथेसिस को साबित करने में सकागुची को एक दशक से अधिक समय लगा। उन्होंने सीडी25 प्रोटीन (आईएल-2 रिसेप्टर का अल्फा चेन) को मार्कर के रूप में इस्तेमाल किया। ‘द जर्नल ऑफ इम्यूनोलॉजी’ में पब्लिश्ड उनके पेपर ने दिखाया कि सीडी4+ सीडी25+ टी सेल्स इम्यून सिस्टम को शांत रखती हैं। ये रेगुलेटरी टी सेल्स पेरिफेरल ऊतकों में घूमती हैं और ऑटोइम्यून डिसीज से बचाती हैं। चूहों में इनकी कमी से थायरॉइड, पैंक्रियास और अन्य अंगों में सूजन हो गई।

कई वैज्ञानिक शुरू में संशय में थे, लेकिन सकागुची की खोज ने रेगुलेटरी टी सेल्स को अलग करने और स्टडी करने का रास्ता खोला। बाद में रिसर्चर्स ने इनकी विभिन्न उप-प्रकारों की पहचान की, जैसे आईएल-10 स्राव करने वाली या टाइमर-1 एक्सप्रेस करने वाली, जो अलग-अलग इम्यून सप्रेशन गुण दिखाती हैं।

मैरी ब्रंकॉ और फ्रेड राम्सडेल की जेनेटिक खोज: स्कर्फी चूहों का रहस्य

इम्यून टॉलरेंस की जेनेटिक आधार 2001 में ब्रंकॉ और राम्सडेल की रिसर्च से स्पष्ट हुई। 1940 के दशक में अमेरिकी लैब में जन्मे कुछ नर चूहों की प्रजाति—स्कर्फी चूहे—बहुत कमजोर पैदा होती थी। ये चूहे त्वचा की बीमारी, बाल झड़ना, सूजन और कई अंगों की विफलता से ग्रस्त हो जाते थे। यह X क्रोमोसोम से जुड़ी बीमारी थी, जो सिर्फ नर चूहों को प्रभावित करती थी।

ब्रंकॉ और राम्सडेल ने इस म्यूटेशन को मैप करने का काम शुरू किया। उन्होंने X क्रोमोसोम के मध्य भाग को टारगेट किया और धीरे-धीरे संभावित क्षेत्र को 5 लाख न्यूक्लियोटाइड्स तक सीमित कर दिया। फिर उन्होंने इस क्षेत्र के 20 संभावित जीनों की डिटेल्ड मैपिंग की। हेल्दी और स्कर्फी चूहों के जीनों की तुलना में अंतिम—20वें—जीन में म्यूटेशन मिला। यह जीन पहले अज्ञात था, लेकिन फोर्कहेड बॉक्स (फॉक्स) जीन फैमिली से मिलता-जुलता था। उन्होंने इसे फॉक्सपी3 नाम दिया।

इस खोज को साबित करने के लिए उन्होंने जेनेटिक रेस्क्यू एक्सपेरिमेंट्स किए। पांच ट्रांसजेनिक माउस लाइन्स बनाईं, प्रत्येक में अलग कॉपी नंबर के साथ फॉक्सपी3 जीन डाला। इन्हें स्कर्फी चूहों से क्रॉस किया, और वाइल्ड-टाइप फॉक्सपी3 ने नर चूहों को बीमारी से बचा लिया। ‘नेचर जेनेटिक्स’ में 2001 के उनके पेपर ने यह साबित किया।

फॉक्सपी3 और आईपीईएक्स सिंड्रोम: मानव प्रभाव

ब्रंकॉ और राम्सडेल ने संदेह किया कि स्कर्फी जैसी बीमारी मनुष्यों में भी होती है। डेटाबेस सर्च से उन्हें फॉक्सपी3 का मानव समकक्ष मिला—FOXP3। दुनिया भर के पीडियाट्रिशियंस से सैंपल्स इकट्ठा किए, और आईपीईएक्स सिंड्रोम (इम्यून डिस्रेगुलेशन, पॉलीएंडोक्रिनोपैथी, एंटरोपैथी, X-लिंक्ड) वाले लड़कों में FOXP3 म्यूटेशन पाए। यह दुर्लभ सिंड्रोम X-लिंक्ड है, जो नवजात लड़कों में इम्यून सिस्टम को असंतुलित कर देता है, जिससे डायरिया, डायबिटीज और त्वचा की समस्याएं होती हैं।

2003 में शिमोन सकागुची ने इन खोजों को जोड़ा। उन्होंने प्रमाणित किया कि फॉक्सपी3 जीन रेगुलेटरी टी सेल्स के विकास और फंक्शन को नियंत्रित करता है। ये सेल्स अन्य टी सेल्स को मॉनिटर करती हैं, वास्तविक खतरे (जैसे वायरस) पर ही रिस्पॉन्स सक्रिय करती हैं, और शरीर के ऊतकों को सहन करती हैं।

नोबेल समिति की प्रतिक्रिया और वैज्ञानिक महत्व

नोबेल कमिटी के चेयर ओले कैंपे ने कहा, “उनकी खोजों ने यह समझने में निर्णायक भूमिका निभाई है कि हममें से अधिकांश को गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियां क्यों नहीं होतीं।” कमिटी मेंबर मैरी वाहरेन-हर्लेनियस ने जोड़ा कि ये खोजें इम्यून सिस्टम को नियंत्रित रखने के फंडामेंटल नॉलेज प्रदान करती हैं। थॉमस पर्लमैन, सेक्रेटरी-जनरल, ने बताया कि सकागुची से बात हुई, जो भावुक हो गए, जबकि ब्रंकॉ और राम्सडेल को वॉयसमेल छोड़ा गया।

यह खोज इम्यूनोलॉजी का नया फील्ड—पेरिफेरल टॉलरेंस—शुरू करने वाली है। इससे पहले माइक्रोआरएनए (2024) और एमआरएनए वैक्सीन्स (2023) पर पुरस्कार दिए गए थे।

चिकित्सा क्षेत्र पर गहरा प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं

इन खोजों ने चिकित्सा को बदल दिया। फॉक्सपी3 आधारित थेरेपीज क्लिनिकल ट्रायल्स में हैं, जो रेगुलेटरी टी सेल्स को बढ़ाकर या मॉड्यूलेट करके काम करती हैं। ऑटोइम्यून डिसीज जैसे एसएलई (सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस) में, जहां इम्यून सिस्टम ऊतकों पर हमला करता है, ये थेरेपीज सूजन कम कर सकती हैं।

कैंसर इम्यूनोथेरेपी में, रेगुलेटरी टी सेल्स ट्यूमर के आसपास इम्यून सप्रेशन को तोड़ सकती हैं, जिससे चेकपॉइंट इन्हिबिटर्स अधिक प्रभावी हों। अंग प्रत्यारोपण में, ये सेल्स रिजेक्शन को रोक सकती हैं, जिससे ट्रांसप्लांट्स की सफलता बढ़ेगी। रेगुलेटरी बी सेल्स (ब्रेग्स) भी इसमें भूमिका निभा रही हैं, जो आईएल-10 स्राव करके होमियोस्टेसिस बनाए रखती हैं।

दुनिया भर में 5-8% लोग ऑटोइम्यून डिसीज से प्रभावित हैं। इन वैज्ञानिकों की सहयोगी खोजें—जो 1995 से 2003 तक फैली—लाखों मरीजों के लिए उम्मीद लाती हैं। भविष्य में, एआई और जेनेटिक एडिटिंग (जैसे CRISPR) से ये थेरेपीज और उन्नत होंगी।

2025 का यह नोबेल पुरस्कार इम्यून संबंधी बीमारियों से जूझते मानवता के लिए एक मील का पत्थर है, जो विज्ञान की मौलिक रिसर्च के व्यावहारिक प्रभाव को दर्शाता है।

यह जानकारी इंडिया टुडे और अल जज़ीरा से एकत्र की गई है