कोलकाता में बारिश ने मचाई तबाही, पूजा से पहले हुई बारिश से सिटी ऑफ जॉय डूबा, 11 लोगों की मौत
कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में मंगलवार सुबह हुई अभूतपूर्व भारी बारिश ने पूरे शहर को पानी में डुबो दिया, जिससे 11 लोगों की दुखद मौत हो गई और दुर्गा पूजा की तैयारियां बुरी तरह प्रभावित हुईं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यह 1986 के बाद की सबसे ज्यादा दर्ज की गई बारिश थी, जिसमें 24 घंटों से कम समय में 251.4 मिमी पानी बरसा, जो पिछले 137 वर्षों में छठी सबसे बड़ी एकल-दिवसीय वर्षा के रूप में दर्ज हुई है, और इससे शहर की सड़कें, रेल सेवाएं, सड़क यातायात तथा हवाई सेवाएं पूरी तरह ठप हो गईं।
बारिश की तीव्रता और उसके व्यापक प्रभाव
आईएमडी के अधिकारियों ने विस्तार से बताया कि इस बारिश की गति औसतन 98 मिमी प्रति घंटा थी, जो क्लाउडबर्स्ट की परिभाषा (100 मिमी प्रति घंटा) से मात्र 2 मिमी कम थी, लेकिन इसकी अवधि और तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि यह एक सामान्य वर्षा से कहीं अधिक विनाशकारी साबित हुई। यह मूसलाधार बारिश मुख्य रूप से मंगलवार तड़के 2:30 बजे से सुबह 5:30 बजे तक छह घंटों में केंद्रित थी, जिसने कोलकाता के 1.5 करोड़ से अधिक निवासियों वाले विशाल क्षेत्र को जलमग्न कर दिया। शहर के विभिन्न हिस्सों में बारिश की मात्रा में काफी अंतर देखा गया—उदाहरण के लिए, दक्षिणी उपनगर गारिया में 332 मिमी की रिकॉर्ड बारिश दर्ज हुई, जबकि उत्तर कोलकाता के थानथानिया इलाके में 195 मिमी पानी गिरा। आईएमडी की ऐतिहासिक रिपोर्टों के आधार पर, यह बारिश 1986 के बाद की सबसे भारी थी और 1888 से लेकर अब तक के रिकॉर्ड में छठे स्थान पर है, जो शहर की जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों को दर्शाती है।
इस बारिश ने शहर की मुख्य धमनियों को नदियों में बदल दिया, जहां पानी का स्तर घुटनों से ऊपर तक पहुंच गया, और कई इलाकों में पूरा-पूरा मोहल्ला अलग-थलग पड़ गया। मेट्रो रेलवे की ब्लू लाइन (दक्षिणेश्वर से शहीद खुदीराम स्टेशन तक) में पानी भरने से सेवाएं आंशिक रूप से बंद करनी पड़ीं, जबकि उपनगरीय ट्रेनें सीलdah साउथ, सीलdah नॉर्थ और मुख्य लाइनों पर प्रभावित हुईं। हावड़ा और कोलकाता स्टेशनों पर भी ट्रैक जलमग्न होने से ट्रेन सेवाएं बाधित रहीं। हवाई यातायात में भी देरी हुई, क्योंकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के आसपास के इलाकों में पानी जमा हो गया। कई वाहन सड़कों पर डूब गए, और घरों तथा अपार्टमेंट्स में पानी घुसने से फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स और दैनिक उपयोग की वस्तुएं बर्बाद हो गईं। एक स्थानीय निवासी मौमिता बिस्वास, जो कालीकापुर में रहती हैं, ने अपनी व्यथा साझा की: “मैं अपनी बुजुर्ग मां को डॉक्टर के पास ले जाने वाली थी, लेकिन टीवी पर पानी भरी सड़कों पर बिजली के करंट से लोगों की मौत की खबरें देखकर मैंने अपॉइंटमेंट रद्द कर दिया। बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं लग रहा था।” इस घटना ने शहर की पुरानी ड्रेनेज व्यवस्था की कमजोरियों को पूरी तरह उजागर कर दिया, जो ब्रिटिश काल से चली आ रही है लेकिन आधुनिकीकरण की कमी के कारण ऐसी आपदाओं में असफल साबित होती है, जैसा कि कोलकाता नगर निगम की रिपोर्टों में बार-बार उल्लेख किया गया है।
आईएमडी के विशेष मौसम बुलेटिन में स्पष्ट किया गया है कि यह बारिश एक चक्रवाती परिसंचरण के कारण हुई, जो समुद्र तल से 7.6 किलोमीटर ऊपर तक फैला हुआ था और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर आया। यह परिसंचरण अगले 24 घंटों तक बना रह सकता है और उसके बाद कमजोर पड़ सकता है, लेकिन 25 सितंबर के आसपास उत्तर-पश्चिम तथा मध्य बंगाल की खाड़ी में एक नया निम्न दबाव क्षेत्र विकसित होने की संभावना है, जो और अधिक बारिश ला सकता है। गुरुवार को हल्की से मध्यम बारिश की भविष्यवाणी की गई है, जिससे शहरवासियों में चिंता बनी हुई है। हिंदुस्तान टाइम्स और आईएमडी की रिपोर्टों के अनुसार, इस तरह की मौसमी घटनाएं जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही हैं, और कोलकाता जैसे तटीय शहरों को इससे सबसे ज्यादा खतरा है।
मौतें, दुर्घटनाएं और व्यक्तिगत कहानियां
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तार से बताया कि कुल 11 लोगों की मौत हुई, जिनमें से ज्यादातर (नौ) बिजली के खुले या असुरक्षित तारों से करंट लगने के कारण। कोलकाता शहर में आठ मौतें दर्ज हुईं, जबकि उत्तर 24 परगना जिले के शशान इलाके में एक, दक्षिण 24 परगना के अमताला में एक, और शहर के दक्षिणी बाहरी इलाके नरेंद्रपुर में शाम को एक और मौत हुई। इनमें से कई मामले पानी भरी सड़कों पर हुए, जहां लोग पैदल चलते हुए या वाहन चलाते हुए करंट की चपेट में आए। ट्रैफिक विभाग के डिप्टी कमिश्नर वाई श्रीकांत ने कहा कि कई ड्राइवरों को अपनी गाड़ियां बीच सड़क पर छोड़नी पड़ीं क्योंकि इंजन पानी में बंद हो गए, और कुछ मामलों में वाहन पूरी तरह डूब गए, जिससे बचाव कार्यों में मुश्किल हुई।
एक बिक्री प्रतिनिधि साइलन पांडा ने अपनी परेशानी बयां की: “मुझे अपने ऑफिस से उल्टाडांगा (पूर्वी कोलकाता) से पार्क सर्कस (दक्षिणी कोलकाता) तक पैदल चलना पड़ा, क्योंकि कोई बस, टैक्सी या ऑटो नहीं चल रहा था। रास्ते में पानी इतना था कि कमर तक पहुंच रहा था, और जगह-जगह पर लोग फंसे हुए थे।” सरकारी और निजी कार्यालय, अस्पताल, स्कूल तथा कॉलेज सभी पानी में डूबे, जिससे मरीजों को इलाज में देरी हुई और छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई। कई इलाकों में बिजली काट दी गई ताकि और दुर्घटनाएं न हों, लेकिन इससे लोगों की दैनिक दिनचर्या और बिगड़ गई।
सरकारी प्रतिक्रिया, पूजा तैयारियां और चुनौतियां
दुर्गा पूजा के औपचारिक रूप से रविवार को शुरू होने से ठीक पहले इस संकट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आपातकालीन कदम उठाने पर मजबूर किया। उन्होंने राज्य सचिवालय नबन्ना में एक विशेष कंट्रोल रूम स्थापित किया और कोलकाता नगर निगम (केएमसी) को निर्देश दिए कि शहर की ड्रेनेज प्रणाली का उपयोग करके पानी को हुगली नदी में निकाला जाए। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि मंगलवार दोपहर से नदी में हाई टाइड (उच्च ज्वार) के कारण निकासी प्रक्रिया कई घंटों तक धीमी रही, क्योंकि नदी का जल स्तर ऊंचा होने से पानी का बहाव उल्टा हो जाता है। केएमसी की रिपोर्टों के अनुसार, शहर की ड्रेनेज व्यवस्था मूल रूप से अच्छी है, लेकिन बढ़ती शहरीकरण और रखरखाव की कमी से यह ओवरलोड हो जाती है।
सरकार ने तत्काल सभी राज्य संचालित स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी और विश्वविद्यालयों को ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करने के निर्देश दिए। निजी स्कूलों से अनुरोध किया गया कि वे अपनी पहले से घोषित पूजा छुट्टियां दो दिन पहले शुरू करें, जैसा कि बंगाल सरकार की आधिकारिक घोषणा में उल्लेखित है और हिंदुस्तान टाइम्स ने रिपोर्ट किया है। इस फैसले से छात्रों और अभिभावकों को राहत मिली, लेकिन कई परिवारों की पूजा तैयारियां प्रभावित हुईं।
शहर भर में लगभग 3,000 दुर्गा पूजा पंडाल पानी में डूब गए, जिनमें से कई प्रसिद्ध हैं। फोरम फॉर दुर्गोत्सव के महासचिव शाश्वत बसु ने कहा, “हमारी अंतिम तैयारियां चल रही थीं, और पंडाल घूमने वाले लोग पहले से ही आने लगे थे। लेकिन जब पानी उतरा, तो हमने देखा कि महीनों की मेहनत से बनी कलाकृतियां और सजावट बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। कुछ पंडालों में मूर्तियां तक प्रभावित हुईं, जिससे आयोजकों को बड़ा नुकसान हुआ।” आईएमडी की चेतावनियों के बावजूद, पूजा समितियां अब अतिरिक्त सावधानियां बरत रही हैं, जैसे कि ऊंचे प्लेटफॉर्म का उपयोग।
राजनीतिक विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और जिम्मेदारियां
इस प्राकृतिक आपदा ने राजनीतिक तनाव को भी बढ़ा दिया। विपक्षी भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस सरकार पर कड़ा हमला किया, आरोप लगाते हुए कि आईएमडी द्वारा जारी ऑरेंज अलर्ट (भारी बारिश की चेतावनी) के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने उचित तैयारी नहीं की। उन्होंने कहा, “सरकार प्रकृति को दोष देकर बच नहीं सकती। लाखों लोग सरकारी विफलता की वजह से पीड़ित हैं—ड्रेनेज साफ नहीं किया गया, और आपातकालीन योजनाएं नाकाम रहीं।”
जवाब में, ममता बनर्जी ने कोलकाता की बिजली वितरण कंपनी सीईएससी को मुख्य दोषी ठहराया। उन्होंने कंपनी के चेयरमैन संजीव गोयनका से फोन पर बात की और मांग की कि बिजली केबलों को आधुनिक बनाया जाए तथा रखरखाव में सुधार किया जाए। उन्होंने आदेश दिया कि सीईएससी मृतकों के परिवारों को 5 लाख रुपये प्रति व्यक्ति मुआवजा दे, और राज्य सरकार भी सहायता प्रदान करेगी। सीईएससी के प्रवक्ता ने अपनी सफाई में कहा कि कोलकाता की आठ मौतों की जांच से पता चला कि पांच मामले आवासीय इमारतों में आंतरिक वायरिंग की खराबी से हुए, जबकि तीन स्ट्रीट लाइट पोल से जुड़े थे, जो सीईएससी की जिम्मेदारी नहीं हैं। उन्होंने बताया कि सावधानी के तौर पर कई जलमग्न इलाकों में बिजली काट दी गई, और दोपहर तक लगभग 50% कनेक्शन बहाल कर दिए गए, जैसा कि कंपनी की आधिकारिक बयान में उल्लेखित है।
बनर्जी ने केंद्र सरकार की मेट्रो रेलवे पर भी आरोप लगाया कि उनके निर्माण स्थलों पर छोड़ी गई सामग्री ने ड्रेनेज लाइनों को ब्लॉक कर दिया, जिससे पानी निकासी बाधित हुई। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन (डीवीसी) को दोषी ठहराया, जो केंद्र के अधीन है और झारखंड में बांधों से पानी छोड़ता है, साथ ही बिहार तथा उत्तर प्रदेश से आने वाले बाढ़ के पानी को गंगा नदी में बहाने के लिए। उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल की भौगोलिक संरचना नाव की तरह है, जहां ऊपर के राज्यों से सारा पानी इकट्ठा होता है। हमने फरक्का बैराज अधिकारियों से बार-बार गंगा की ड्रेजिंग (सफाई) की मांग की, लेकिन कुछ नहीं हुआ।” डीवीसी और फरक्का बैराज की रिपोर्टों के अनुसार, हाल के वर्षों में जल प्रबंधन में सुधार की जरूरत है, लेकिन अंतरराज्यीय समन्वय की कमी से समस्याएं बनी रहती हैं।
मुख्यमंत्री ने राजनीतिक आरोपों का जवाब देते हुए कहा, “यह राजनीति खेलने का समय नहीं है। जब दिल्ली या महाराष्ट्र में बाढ़ आती है, या उत्तराखंड में भूस्खलन से जानें जाती हैं, तो हम कुछ नहीं कहते। प्रकृति दुनिया भर में कहर बरपा रही है—यह हमारे नियंत्रण में नहीं है।” यह बयान वैश्विक जलवायु परिवर्तन की रिपोर्टों से मेल खाता है, जहां आईएमडी और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें बताती हैं कि ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं।
आगे की स्थिति और दीर्घकालिक चुनौतियां
आईएमडी के पूर्वानुमान के अनुसार, चक्रवाती परिसंचरण अगले 24 घंटों तक सक्रिय रहेगा और उसके बाद कमजोर पड़ सकता है, लेकिन नया निम्न दबाव क्षेत्र बनने से और बारिश हो सकती है। अधिकारियों ने पानी निकालने के लिए पंपों का उपयोग बढ़ाया है, और कई इलाकों में बचाव टीमें तैनात की गई हैं। हालांकि, ड्रेनेज की पुरानी समस्याएं और हुगली नदी की क्षमता सीमा ने स्थिति को जटिल बनाया है। हिंदुस्तान टाइम्स, आईएमडी तथा राज्य सरकार के आधिकारिक स्रोतों के आधार पर, शहर में गुरुवार को और वर्षा की संभावना है, जो पूजा उत्सव को और प्रभावित कर सकती है।
दीर्घकालिक रूप से, यह घटना कोलकाता की शहरी योजना पर सवाल उठाती है। शहर की ड्रेनेज प्रणाली 19वीं सदी की है, और बढ़ती आबादी तथा जलवायु परिवर्तन से यह अपर्याप्त साबित हो रही है। सरकारी रिपोर्टों में सुझाव दिया गया है कि ड्रेनेज को आधुनिक बनाना, निर्माण स्थलों पर सख्त नियम लागू करना और अंतरराज्यीय जल प्रबंधन में सुधार आवश्यक है। इस बीच, निवासियों को सलाह दी गई है कि वे घरों में रहें, बिजली के तारों से दूर रहें और आपातकालीन सेवाओं का उपयोग करें। यह जानकारी आईएमडी की वेबसाइट, हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्टों तथा पश्चिम बंगाल सरकार के बयानों पर आधारित है, जो तथ्यों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करती हैं।
