15 जलवायु-प्रतिरोधी कृषि पद्धतियाँ भारत दुनिया को सिखा रहा है
जलवायु परिवर्तन आज दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में अनियमित मानसून, सूखा और बाढ़ जैसी समस्याएं किसानों की आजीविका को खतरे में डाल रही हैं। लेकिन भारत के किसान सदियों से प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर खेती कर रहे हैं। ये पारंपरिक और आधुनिक जलवायु-अनुकूल कृषि अभ्यास न केवल फसलें बचाते हैं, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारते हैं और पानी की बचत करते हैं। इस लेख में हम १५ ऐसे अभ्यासों पर चर्चा करेंगे जो भारत विश्व को सिखा रहा है। ये अभ्यास सरल हैं, कम लागत वाले हैं और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं। इन्हें अपनाने से न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव गंभीर हैं। २०२५ तक औसत तापमान में १.५ डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है, जिससे प्रमुख फसलों के उत्पादन में १०% तक कमी आ सकती है। लेकिन राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) जैसे कार्यक्रमों से किसानों को मजबूत बनाया जा रहा है। ये १५ अभ्यास भारत की विविध जलवायु के लिए उपयुक्त हैं और वैश्विक स्तर पर अपनाए जा सकते हैं। भारत के किसान न केवल अपनी फसलों को बचा रहे हैं, बल्कि विश्व के अन्य देशों को भी ये टिकाऊ तरीके सिखा रहे हैं। उदाहरण के लिए, सूखा प्रतिरोधी फसलें जैसे बाजरा और सहभागी धान, जो अनियमित वर्षा वाले क्षेत्रों में सफल हैं।
ये अभ्यास फसल विविधीकरण, मिट्टी स्वास्थ्य प्रबंधन और जल-कुशल सिंचाई पर जोर देते हैं। आइए जानें कैसे भारत जलवायु-स्मार्ट कृषि के क्षेत्र में अग्रणी बन रहा है। ये विधियां न केवल जलवायु जोखिमों से निपटती हैं, बल्कि किसानों की आय भी बढ़ाती हैं। वैश्विक स्तर पर, भारत की ये प्रथाएं दक्षिण एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में अपनाई जा रही हैं।
१. जीरो टिलेज या शून्य जुताई
आज के बदलते मौसम में मिट्टी को मजबूत रखना बहुत जरूरी है। जीरो टिलेज एक सरल विधि है जिसमें खेत की जुताई नहीं की जाती। फसल अवशेषों को जमीन पर ही छोड़ दिया जाता है। इससे मिट्टी का कटाव रुकता है और नमी बनी रहती है। यह अभ्यास भारत के गेहूं बेल्ट में बहुत लोकप्रिय हो गया है, जहां किसान पारंपरिक जुताई से थक चुके हैं। जीरो टिलेज न केवल समय बचाता है, बल्कि ईंधन और श्रम की भी बचत करता है। भारत में यह अभ्यास गेहूं की खेती में बहुत लोकप्रिय है। पंजाब और हरियाणा में ५००,००० हेक्टेयर क्षेत्र में सूखे बीज से धान बोया जा रहा है, जो पिछले १० वर्षों से ३४% अधिक है।
इससे पानी की बचत १५% होती है और लागत १५०-२०० डॉलर प्रति हेक्टेयर कम आती है। यह विधि जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करती है क्योंकि यह मीथेन गैस उत्सर्जन कम करती है। किसान जल्दी बुआई कर पकने से पहले गर्मी से बचाते हैं। हरियाणा में ६०% किसान इसका उपयोग कर रहे हैं। यह प्रथा पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है, लेकिन आधुनिक मशीनों से आसान हो गई है। किसान बताते हैं कि इससे खरपतवार कम होते हैं और मिट्टी में सूक्ष्मजीव बढ़ते हैं।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| पानी की बचत | सिंचाई में कमी | १५% |
| लागत में कमी | कम श्रम और ईंधन | १५०-२०० डॉलर/हेक्टेयर |
| मिट्टी स्वास्थ्य | जैविक पदार्थ बढ़ना | ८% |
| दक्षता | जल्दी बुआई | ५००,००० हेक्टेयर अपनाया गया |
२. वर्षा जल संचयन
पानी की कमी आज हर किसान की चिंता है। वर्षा जल संचयन एक पुरानी लेकिन प्रभावी विधि है जिसमें बारिश का पानी इकट्ठा कर तालाबों या कुओं में संग्रहीत किया जाता है। भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्रों में यह अभ्यास आम है। यह न केवल भूजल स्तर बढ़ाता है, बल्कि फसलों को सूखे के समय जीवन देता है। किसान छोटे-छोटे तालाब बनाकर वर्षा को बर्बाद होने से बचाते हैं। महाराष्ट्र और राजस्थान में किसान खेतों में छोटे तालाब बनाते हैं, जिससे फसल उत्पादन ५०% तक बढ़ जाता है। २०२५ तक भारत में वर्षा जल संचयन बाजार ८९.१ मिलियन डॉलर का हो सकता है।
इससे भूजल स्तर बढ़ता है और सूखे में सिंचाई संभव होती है। यह विधि जलवायु-अनुकूल है क्योंकि यह मानसून पर निर्भरता कम करती है। पंजाब में गेहूं की पैदावार २४% बढ़ी है। सरकारी योजनाएं जैसे जल शक्ति अभियान इसे बढ़ावा दे रही हैं। राजस्थान के किसान बताते हैं कि इससे उनके खेत साल भर हरे-भरे रहते हैं। यह अभ्यास छोटे किसानों के लिए सस्ता और आसान है।
| क्षेत्र | फसल | पैदावार वृद्धि (%) | पानी बचत (लीटर/हेक्टेयर) |
| पंजाब | गेहूं | २४ | १२०,००० |
| महाराष्ट्र | धान | ३८ | १५५,००० |
| कश्मीर | बादाम | ४४ | १०५,००० |
| तमिलनाडु | बाजरा | २० | ९६,००० |
३. फसल चक्रण
मिट्टी को थकने न देना खेती का मूल मंत्र है। फसल चक्रण एक बुद्धिमान तरीका है जिसमें एक ही खेत में अलग-अलग फसलें बारी-बारी से उगाई जाती हैं। इससे मिट्टी के पोषक तत्व संतुलित रहते हैं और कीट रोग कम होते हैं। यह प्रथा भारत के विभिन्न भागों में सदियों से चली आ रही है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसे और महत्वपूर्ण बना दिया है। किसान दालें और अनाज को मिलाकर मिट्टी को नाइट्रोजन से भरपूर रखते हैं। उत्तर भारत में गेहूं-मक्का के बाद दालें उगाने से उत्पादन ३२% बढ़ा है।
यह अभ्यास ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ३९% कम करता है। राजस्थान में लेग्यूम कवर फसलों से मिट्टी की उर्वरता सुधरी है। जलवायु परिवर्तन में यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह फसलों को मौसम की अनियमितताओं से बचाता है। किसानों की आय २०% बढ़ती है। यह विधि फसल असफलता के जोखिम को फैलाती है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| उत्पादन वृद्धि | अनाज और प्रोटीन | २६-३२% |
| उत्सर्जन कमी | N₂O | ३९% |
| मिट्टी स्वास्थ्य | कार्बन भंडारण | ८% |
| आय वृद्धि | किसान लाभ | २०% |
४. एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम)
कीटों से लड़ना खेती का हिस्सा है, लेकिन रसायनों पर निर्भर न रहना स्मार्ट तरीका है। आईपीएम में रासायनिक कीटनाशकों के बजाय जैविक और सांस्कृतिक विधियां अपनाई जाती हैं। यह प्रथा किसानों को प्रकृति के साथ सहयोग सिखाती है, जहां ट्रैप्स और प्राकृतिक शत्रु कीटों को नियंत्रित करते हैं। भारत के चावल उत्पादक क्षेत्रों में यह बहुत उपयोगी साबित हुआ है। भारत में धान की खेती में स्टेम बोरर और लीफ फोल्डर को नियंत्रित करने के लिए ट्रैप्स और प्राकृतिक शत्रु उपयोग किए जाते हैं। ओडिशा में किसानों ने आईपीएम से २०-३०% लागत बचाई है।
यह अभ्यास रोगों जैसे ब्लास्ट और ब्राउन स्पॉट को कम करता है। जलवायु परिवर्तन से कीट बढ़ते हैं, लेकिन आईपीएम पर्यावरण-अनुकूल समाधान देता है। सब्जी फसलों में यह सफल रहा है। किसान कहते हैं कि इससे फसलें स्वस्थ रहती हैं और मिट्टी प्रदूषित नहीं होती।
| कीट/रोग | विधि | लाभ |
| स्टेम बोरर | ट्रैप्स | २०-३०% लागत बचत |
| लीफ फोल्डर | जैविक नियंत्रण | उत्पादन वृद्धि |
| ब्लास्ट रोग | सांस्कृतिक प्रथाएं | रोग कमी |
| गंडी बग | एकीकृत दृष्टिकोण | टिकाऊ खेती |
५. जैविक खेती
प्रकृति से लिया, प्रकृति को लौटाया—यह जैविक खेती का मूल सिद्धांत है। जैविक खेती में रासायनिक उर्वरकों के बजाय कम्पोस्ट और गोबर खाद का उपयोग होता है। भारत में यह अभ्यास छोटे किसानों को सशक्त बना रहा है, जहां स्थानीय सामग्री से खाद बनाई जाती है। सिक्किम जैसे राज्य पूर्ण रूप से जैविक हो चुके हैं। भारत में १६ सतत कृषि प्रथाओं में यह प्रमुख है। सिक्किम पूरी तरह जैविक राज्य है, जहां उत्पादन १०-१५% बढ़ा है।
इससे मिट्टी की जैविक पदार्थ बढ़ता है और जलवायु प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। यह अभ्यास वैश्विक स्तर पर अपनाया जा रहा है क्योंकि यह प्रदूषण कम करता है। किसानों को बाजार में अधिक कीमत मिलती है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| मिट्टी उर्वरता | जैविक पदार्थ | १०-१५% वृद्धि |
| उत्पादन | फसल पैदावार | १०-१५% |
| पर्यावरण | रसायन कमी | ५०% |
| स्वास्थ्य | उपभोक्ता लाभ | पोषण मूल्य बढ़ा |
६. एग्रोफॉरेस्ट्री
खेत को जंगल बनाना—यह एग्रोफॉरेस्ट्री का सौंदर्य है। एग्रोफॉरेस्ट्री में खेतों में पेड़ लगाए जाते हैं। इससे मिट्टी कटाव रुकता है और कार्बन संग्रहण होता है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान फलदार पेड़ों के साथ दालें उगा रहे हैं। यह प्रथा आय के कई स्रोत देती है। भारत में २.५-३ अरब टन अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य है। राजस्थान में किसानों ने फलों के साथ दालें उगाकर आय दोगुनी की है। जलवायु परिवर्तन में पेड़ छाया और हवा नियंत्रण देते हैं। यह जैव विविधता भी बढ़ाती है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| कार्बन संग्रहण | अतिरिक्त सिंक | २.५-३ अरब टन |
| आय वृद्धि | बहु-फसल | दोगुनी |
| मिट्टी संरक्षण | कटाव रोक | ४०% |
| जैव विविधता | प्रजातियां बढ़ी | ३०% |
७. कवर फसलें और मल्चिंग
मिट्टी को नंगा न छोड़ना—यह कवर फसलें और मल्चिंग का संदेश है। कवर फसलें मिट्टी को ढकती हैं और मल्चिंग अवशेषों से नमी बचाती है। भारत में यह सूखा क्षेत्रों में उपयोगी है, जहां किसान फसल अवशेषों या घास से मिट्टी को ढकते हैं। यह प्रथा मिट्टी को गर्मी और ठंड से बचाती है, जो जलवायु परिवर्तन के बढ़ते तापमान में बहुत जरूरी है। किसान लेग्यूम जैसी कवर फसलें उगाकर मिट्टी को पोषण देते हैं और खरपतवार को दबाते हैं। फल-सब्जी खेती में मल्च से पानी वाष्पीकरण ५०% कम होता है। राजस्थान में लेग्यूम कवर से मिट्टी स्वास्थ्य सुधरा।
यह अभ्यास जलवायु-अनुकूल है क्योंकि यह मिट्टी तापमान नियंत्रित करता है। खरपतवार भी कम होते हैं। राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के तहत इसे बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे किसान मिट्टी कार्बन को बढ़ा रहे हैं। यह छोटे खेतों के लिए आसान और कम लागत वाला है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| नमी संरक्षण | वाष्पीकरण कमी | ५०% |
| मिट्टी स्वास्थ्य | पोषक तत्व | ४५% सुधार |
| खरपतवार नियंत्रण | प्राकृतिक | ३०% |
| उत्पादन | फसल वृद्धि | २०% |
८. ड्रिप सिंचाई
हर बूंद का सदुपयोग—ड्रिप सिंचाई इसी का प्रतीक है। ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे जड़ों तक पहुंचता है। भारत में पानी की कमी वाले क्षेत्रों में यह ३०-५०% पानी बचाती है। गुजरात और महाराष्ट्र के किसान इसे अपनाकर फसलें हरा-भरा रखते हैं। यह प्रथा अनियमित मानसून में फसलों को नियमित पानी देती है, जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख प्रभाव है। किसान प्लास्टिक पाइपों से पानी की बूंदें गिराकर बर्बादी रोकते हैं।
गुजरात में कपास की खेती में ३३% पैदावार बढ़ी। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना इसे बढ़ावा दे रही है। जलवायु परिवर्तन से अनियमित वर्षा में यह महत्वपूर्ण है। यह विधि बिजली भी बचाती है। प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत ५५% सब्सिडी मिलती है, जिससे छोटे किसान आसानी से अपनाते हैं। यह उर्वरकों को भी कुशलता से उपयोग करती है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| पानी बचत | कुशल वितरण | ३०-५०% |
| पैदावार | फसल वृद्धि | ३३% |
| लागत | कम बर्बादी | २०% |
| पर्यावरण | कम रनऑफ | ४०% |
९. फसल विविधीकरण
एक फसल पर निर्भर न रहना—फसल विविधीकरण की सीख है। फसल विविधीकरण में एक फसल के बजाय कई उगाई जाती हैं। भारत में बाजरा और ज्वार जैसे टिकाऊ अनाज बढ़ाए जा रहे हैं। यह प्रथा जोखिम कम करती है और पोषण सुरक्षा देती है। जलवायु परिवर्तन से एक फसल असफल होने पर दूसरी बचाती है, जैसे सूखे में बाजरा और बाढ़ में दालें। किसान धान के स्थान पर दालें या तिलहन उगाकर मिट्टी को आराम देते हैं।
२०२३ को संयुक्त राष्ट्र ने बाजरा वर्ष घोषित किया। सूखे में बाजरा की पैदावार १२३९ किग्रा/हेक्टेयर है। यह अभ्यास जलवायु जोखिम कम करता है। राजस्थान में मिलेट्स ने किसानों को सूखे से बचाया। राष्ट्रीय मिशन के तहत १७ राज्यों में पायलट परियोजनाएं चल रही हैं। इससे आय स्थिर रहती है।
| फसल | प्रतिरोधक | पैदावार (किग्रा/हेक्टेयर) |
| बाजरा | सूखा | १२३९ |
| ज्वार | गर्मी | १२०० |
| दालें | बाढ़ | ८०० |
| मक्का | अनियमित वर्षा | २५०० |
१०. प्राकृतिक खेती
बिना रसायनों की खेती—प्राकृतिक खेती का आकर्षण है। प्राकृतिक खेती में कोई रसायन नहीं उपयोग होता। आंध्र प्रदेश में लाखों किसान इसे अपना रहे हैं। यह विधि किसानों को आत्मनिर्भर बनाती है। जलवायु परिवर्तन में यह मिट्टी को स्वाभाविक रूप से मजबूत करती है, जहां जीवाणु और केंचुए पोषक तत्व बनाते हैं। किसान गोबर और पत्तों से खाद बनाकर लागत शून्य रखते हैं। इससे मिट्टी कार्बन ८% बढ़ा। यह कम लागत वाली है। वैश्विक स्तर पर यह जैविक विकल्प देती है। जीरो बजट प्राकृतिक खेती ने लाखों को लाभ पहुंचाया। परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) इसे समर्थन दे रही है। इससे फसलें रोग प्रतिरोधी बनती हैं।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| मिट्टी सुधार | कार्बन बढ़ना | ८% |
| लागत कमी | रसायन मुक्त | ३०% |
| स्वास्थ्य | पोषण | १५% |
| अपनाना | किसान | लाखों |
११. सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन (एसआरआई)
धान की खेती को पानी बचाकर करना—एसआरआई का लक्ष्य है। एसआरआई में धान कम पानी से उगाया जाता है। भारत में यह ३०% पानी बचाती है। बिहार में पैदावार २०% बढ़ी। यह प्रथा बीज की बचत भी करती है। जलवायु परिवर्तन से पानी की कमी बढ़ रही है, इसलिए एसआरआई धान उत्पादन को टिकाऊ बनाती है। किसान युवा पौधे लगाकर जड़ें मजबूत बनाते हैं और खेतों को हवा लगाते हैं।
जलवायु में यह मीथेन कम करती है। बिहार और तमिलनाडु में हजारों किसान इसे अपना चुके हैं। राष्ट्रीय नवाचार जलवायु अनुकूल कृषि (एनआईसीआरए) के तहत इसे प्रदर्शित किया जा रहा है। इससे फसल चक्र छोटा होता है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| पानी बचत | कम बाढ़ | ३०% |
| पैदावार | धान वृद्धि | २०% |
| उत्सर्जन | मीथेन कमी | ४०% |
| लागत | कम बीज | २५% |
१२. कंटूर फार्मिंग
ढलानों पर खेती को सुरक्षित बनाना—कंटूर फार्मिंग की विशेषता है। कंटूर फार्मिंग में ढलानों पर फसलें समोच्च रेखाओं पर लगाई जाती हैं। हिमालय क्षेत्र में यह कटाव रोकती है। ४०% मिट्टी बचत होती है। यह प्रथा पानी के बहाव को नियंत्रित करती है। जलवायु परिवर्तन से भारी वर्षा बढ़ रही है, इसलिए कंटूर फार्मिंग बाढ़ और कटाव से बचाती है। किसान पंक्तियों में बोकर मिट्टी को बांधते हैं और पेड़ लगाकर मजबूती देते हैं। सूखा और बाढ़ में उपयोगी। उत्तराखंड और हिमाचल में इसे एनआईसीआरए के तहत बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पानी मिट्टी में रुकता है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| कटाव रोक | मिट्टी संरक्षण | ४०% |
| पानी नियंत्रण | रनऑफ कमी | ५०% |
| उत्पादन | स्थिर | १५% |
| पर्यावरण | जैव विविधता | २०% |
१३. वेर्मीकम्पोस्टिंग
केंचुओं से सोना बनाना—वेर्मीकम्पोस्टिंग का जादू है। वेर्मीकम्पोस्टिंग में केंचुए से खाद बनाई जाती है। भारत में यह मिट्टी संरचना सुधारती है। पानी धारण क्षमता २०% बढ़ती है। यह घरेलू स्तर पर आसान है। जलवायु परिवर्तन में सूखे से मिट्टी सूख जाती है, लेकिन वेर्मीकम्पोस्ट नमी बनाए रखती है। किसान अपशिष्ट से खाद बनाकर लागत बचाते हैं और मिट्टी को जैविक बनाते हैं। टिकाऊ खाद्य उत्पादन के लिए आदर्श। मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन योजना के तहत इसे प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे पोषक तत्व धीरे-धीरे उपलब्ध होते हैं।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| मिट्टी सुधार | संरचना | २०% |
| पोषक तत्व | प्राकृतिक | ३०% |
| लागत | कम खर्च | १५% |
| स्वास्थ्य | जैविक | २५% |
१४. डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर)
धान को बिना रोपा सीधे बोना—डीएसआर की सादगी है। डीएसआर में धान को सीधे बोया जाता है। ५०% पानी बचत होती है। उत्तर भारत में ३३०,००० हेक्टेयर में अपनाया गया। यह मीथेन उत्सर्जन कम। जलवायु परिवर्तन से धान खेती में पानी संकट बढ़ रहा है, इसलिए डीएसआर वैकल्पिक तरीका है। किसान नर्सरी की मेहनत बचाते हैं और मशीनों से बीज बोते हैं। पैदावार स्थिर रहती है। पंजाब में इसे फसल विविधीकरण के साथ जोड़ा जा रहा है। इससे श्रम कम लगता है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| पानी बचत | बिना बाढ़ | ५०% |
| उत्सर्जन | कार्बन फुटप्रिंट | ३०% कमी |
| क्षेत्र | अपनाया | ३३०,००० हेक्टेयर |
| पैदावार | स्थिर | १०% |
१५. फ्लोटिंग फार्मिंग
बाढ़ में भी खेती—फ्लोटिंग फार्मिंग का चमत्कार है। फ्लोटिंग फार्मिंग में पानी पर तैरते बेड बनाए जाते हैं। बाढ़ प्रभावित बंगाल में सब्जियां उगाई जाती हैं। ४०% उत्पादन बढ़ा। यह विधि जलवायु बाढ़ में उपयोगी। जलवायु परिवर्तन से बाढ़ें बढ़ रही हैं, इसलिए फ्लोटिंग फार्मिंग भूमि की कमी में खेती संभव बनाती है। किसान पानी हायसिंथ या बांस से बेड बनाते हैं और सब्जियां उगाते हैं। विविध सब्जियां उगाई जा सकती हैं। पूर्वोत्तर भारत में इसे एनआईसीआरए के तहत प्रदर्शित किया जा रहा है। इससे साल भर उत्पादन होता है।
| लाभ | विवरण | आंकड़े |
| बाढ़ प्रतिरोध | तैरते बेड | ४०% उत्पादन |
| पानी उपयोग | कुशल | ३०% |
| विविधता | सब्जियां | २० प्रकार |
| लागत | कम | १५% |
निष्कर्ष
भारत के ये १५ जलवायु-अनुकूल कृषि अभ्यास न केवल किसानों को मजबूत बनाते हैं, बल्कि विश्व को सतत खेती का पाठ पढ़ाते हैं। जीरो टिलेज से पानी बचत, फसल चक्रण से मिट्टी स्वास्थ्य, वर्षा संचयन से सिंचाई और आईपीएम से कीट नियंत्रण—ये सभी अभ्यास एक-दूसरे के पूरक हैं। २०२५ में जलवायु चुनौतियां बढ़ेंगी, जैसे अनियमित मानसून और तापमान वृद्धि, लेकिन ये अभ्यास १०-२०% पैदावार हानि रोक सकते हैं। सरकार के कार्यक्रम जैसे राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए), परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) और मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड योजना इन्हें बढ़ावा दे रहे हैं। किसानों को प्रशिक्षण देकर, जैसे कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के माध्यम से, हम इनका विस्तार कर सकते हैं। इसके अलावा, मोबाइल ऐप्स जैसे किसान सुविधा ऐप मौसम पूर्वानुमान और सलाह देते हैं।
वैश्विक स्तर पर, भारत की ये प्रथाएं दक्षिण एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में अपनाई जा रही हैं, जहां जलवायु जोखिम समान हैं। इन अभ्यासों से न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है। छोटे किसानों के लिए सब्सिडी, ऋण और बीमा की जरूरत है ताकि अपनाना आसान हो। आखिर में, इन प्रथाओं को अपनाकर हम हरी क्रांति को नई दिशा दे सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ धरती छोड़ सकते हैं। भारत का अनुभव साबित करता है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मेल जलवायु-अनुकूल कृषि का भविष्य है।
