ऊर्जागैस

समुद्र के नीचे ऊर्जा भंडार! अंडमान बेसिन में पाई गई प्राकृतिक गैस

भारतीय सरकार ने अंडमान बेसिन में प्राकृतिक गैस की खोज की आधिकारिक पुष्टि की है, जो देश के ऊर्जा क्षेत्र में एक क्रांतिकारी विकास है। यह खोज न केवल गहरे समुद्र अन्वेषण के इतिहास में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई है, बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम भी है।

खोज की जगह और तकनीकी विवरण

यह महत्वपूर्ण खोज श्री विजयपुरम-2 नामक कुएं में की गई है, जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के तट से लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां समुद्र की गहराई करीब 295 मीटर है, और कुआं कुल 2,650 मीटर तक खोदा गया है। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) द्वारा संचालित इस ड्रिलिंग ऑपरेशन में उन्नत तकनीकों का उपयोग किया गया, जिसमें हाई-प्रेशर ड्रिलिंग उपकरण और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम शामिल हैं। परीक्षण के दौरान, गैस 2,212 मीटर से 2,250 मीटर की गहराई पर पाई गई, जहां खुदाई प्रक्रिया में कभी-कभी प्राकृतिक लपटें भी उभरीं, जो गैस की मौजूदगी का स्पष्ट संकेत था। नमूने को विश्लेषण के लिए आंध्र प्रदेश के काकीनाडा स्थित प्रयोगशाला में भेजा गया, जहां गहन परीक्षणों से पता चला कि गैस में 87 प्रतिशत मीथेन की मात्रा है। मीथेन की इतनी उच्च सांद्रता इस गैस को उच्च गुणवत्ता वाली बनाती है, जो ईंधन के रूप में कुशल और कम प्रदूषणकारी होती है। हालांकि, भंडार की कुल मात्रा और व्यावसायिक उपयोगिता का आकलन अभी बाकी है। ओएनजीसी के विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले महीनों में 3डी सिस्मिक सर्वे और अतिरिक्त ड्रिलिंग टेस्ट किए जाएंगे, जो भंडार के आकार को सटीक रूप से मापेंगे। सरकारी रिपोर्टों से पता चलता है कि अंडमान बेसिन में कुल अनुमानित गैस भंडार 1,000 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से अधिक हो सकता है, जो भारत की वार्षिक गैस खपत के कई वर्षों को पूरा करने में सक्षम है।

मंत्री का बयान और भूगर्भीय महत्व

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस खोज को “ऊर्जा अवसरों से भरा एक समुद्र” करार दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह खोज अंडमान बेसिन की प्राकृतिक गैस समृद्धि को साबित करती है, जो इंडो-बर्मीज भूगर्भीय बेल्ट का हिस्सा है। इसी बेल्ट में पड़ोसी देशों जैसे म्यांमार और इंडोनेशिया में भी बड़ी गैस खोजें हुई हैं। उदाहरण के लिए, म्यांमार के यादाना गैस फील्ड ने वहां की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है, जहां से गैस निर्यात से अरबों डॉलर की कमाई होती है। इंडोनेशिया के नाटुना द्वीप समूह में भी समान खोजों ने ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा दिया है। मंत्री पुरी के अनुसार, यह खोज भारत के लिए समान अवसर पैदा करेगी, खासकर जब देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए 85 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल का आयात करता है। विश्वसनीय स्रोतों जैसे यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) की रिपोर्टों से पुष्टि होती है कि इस क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना हाइड्रोकार्बन भंडारों के लिए आदर्श है, जिसमें प्राचीन समुद्री तलछटें गैस निर्माण को बढ़ावा देती हैं।

समुद्र मंथन मिशन का हिस्सा

यह घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर शुरू की गई “राष्ट्रीय गहन समुद्री अन्वेषण मिशन” या “समुद्र मंथन” का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत की विशाल समुद्री सीमाओं में तेल और गैस की खोज को तेज करना है, ताकि ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम हो सके। मिशन के तहत 4,000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है, जिसमें उन्नत सबमरीन, रोबोटिक ड्रोन और सैटेलाइट इमेजिंग जैसी तकनीकों का उपयोग शामिल है। मिशन की समयसीमा 2030 तक निर्धारित है, जब तक भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य है। ओएनजीसी और अन्य सरकारी एजेंसियों के सहयोग से, यह मिशन न केवल अंडमान बेसिन बल्कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी फोकस करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिशन ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देगा, जिसमें समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग शामिल है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आर्थिक प्रभाव

यह खोज भारत के अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। इससे ब्राजील की पेट्रोब्रास, ब्रिटेन की बीपी इंडिया, नीदरलैंड की शेल और अमेरिका की एक्सॉन मोबिल जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी के दरवाजे खुलेंगे। ये कंपनियां अपनी विशेषज्ञता, जैसे ऑफशोर ड्रिलिंग और गैस निष्कर्षण तकनीक, भारत को प्रदान कर सकती हैं। मंत्री पुरी ने कहा, “यह खोज भारत की अमरता की यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल प्राकृतिक गैस का भंडार है, बल्कि हमारी ऊर्जा आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है।” आर्थिक दृष्टिकोण से, यह खोज रोजगार सृजन को बढ़ावा देगी, खासकर अंडमान क्षेत्र में जहां हजारों नौकरियां पैदा हो सकती हैं। विश्व बैंक की रिपोर्टों के अनुसार, ऐसी खोजें जीडीपी में 1-2 प्रतिशत की वृद्धि कर सकती हैं, साथ ही ऊर्जा कीमतों को स्थिर रखने में मदद करेंगी। पर्यावरणीय पहलू पर, गैस का उपयोग कोयले की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जन करता है, जो भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों के अनुरूप है। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ड्रिलिंग से समुद्री पारिस्थितिकी को खतरा हो सकता है, इसलिए सतत विकास के मानकों का पालन जरूरी है।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में व्यापक प्रभाव

यह खोज ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हैं, और भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है, और घरेलू उत्पादन बढ़ाने से आयात बिल में सालाना अरबों डॉलर की बचत हो सकती है। अंडमान बेसिन की खोज से प्रेरित होकर, सरकार अन्य समुद्री क्षेत्रों में भी अन्वेषण तेज करेगी, जिसमें मानव रहित वाहनों और एआई-आधारित डेटा विश्लेषण का उपयोग होगा। यह न केवल ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत करेगी, बल्कि तकनीकी नवाचार और कौशल विकास को भी प्रोत्साहित करेगी। पड़ोसी देशों के अनुभव से सीखते हुए, भारत इस खोज को व्यावसायिक उत्पादन में बदल सकता है, जो अगले दशक में ऊर्जा परिदृश्य को बदल देगा।