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नीतीश कुमार ने 10वीं बार ली बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ

पटना: जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के प्रमुख नीतीश कुमार ने गुरुवार सुबह पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड 10वीं बार शपथ ली। यह समारोह पिछले हफ्ते (14 नवंबर 2025) हुए बिहार विधानसभा चुनावों में एनडीए की भारी जीत के ठीक बाद आयोजित हुआ, जहां गठबंधन ने कुल 243 सीटों में से 202 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। आलोचकों द्वारा उनकी उम्र (74 वर्ष) और स्वास्थ्य को लेकर सत्ता के लिए अयोग्य बताए जाने के बावजूद, नीतीश कुमार ने अपनी राजनीतिक चतुराई और गठबंधन प्रबंधन की कला से एक बार फिर साबित कर दिया कि वे बिहार की राजनीति के केंद्र में बने रहने की क्षमता रखते हैं। शपथ समारोह सुबह 11 बजे शुरू हुआ, जिसमें राज्यपाल अरिफ मोहम्मद खान ने शपथ दिलाई। गांधी मैदान, जो स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जयप्रकाश नारायण के इमरजेंसी विरोधी आंदोलन तक के ऐतिहासिक घटनाक्रमों का साक्षी रहा है, आज फिर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्याय का गवाह बना।​

समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गुजरात के भूपेंद्र पटेल, असम के हिमंता बिस्वा सरमा समेत एनडीए शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। यह आयोजन एनडीए की एकजुटता और ताकत का शानदार प्रदर्शन था, जहां विपक्षी महागठबंधन को करारी शिकस्त देने के बाद गठबंधन के सभी दलों ने एक मंच पर अपनी मजबूती दिखाई। पटना में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए थे, जिसमें 5,000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात थे, और करीब तीन लाख लोग समारोह में शामिल हुए। शपथ के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर बधाई संदेश जारी किया: “बिहार सरकार में मंत्री के रूप में शपथ लेने वाले सभी को मेरी शुभकामनाएं। यह एक शानदार टीम है, जिसमें समर्पित नेता हैं जो बिहार को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। बिहार का विकास भारत के विकास का आधार है।” यह संदेश एनडीए की विकास-केंद्रित दृष्टि को रेखांकित करता है।​​

नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा गठबंधनों के बार-बार बदलावों से भरी पड़ी है, जिसे आलोचक ‘पलटू राम’ कहकर चिढ़ाते हैं, लेकिन यह उनकी सत्ता में बने रहने का सबसे बड़ा राज रहा है। वे 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कुल 20 वर्ष से अधिक समय तक सेवा कर चुके हैं, और पहले से ही देश के आठवें सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्रियों की सूची में हैं। यदि यह पांच साल का कार्यकाल पूरा होता है, तो वे सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन चामलिंग के 24 वर्ष 165 दिनों के राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ देंगे, जो एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। चुनाव परिणामों के अनुसार, जेडीयू ने 85 सीटें जीतीं, जबकि मुख्य सहयोगी भाजपा को 89 सीटें मिलीं। लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) को 19, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM) को 5, और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को 4 सीटें हासिल हुईं। दूसरी ओर, विपक्षी आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन को महज 35 सीटें ही नसीब हुईं, जो ‘जंगल राज’ के मुद्दे पर उनकी हार को दर्शाता है।​

गांधी मैदान का ऐतिहासिक महत्व: नीतीश की राजनीतिक यात्रा का साक्षी

पटना का गांधी मैदान न केवल आज का समारोह स्थल है, बल्कि बिहार की राजनीति के कई महत्वपूर्ण मोड़ों का गवाह रहा है। 1990 में लालू प्रसाद यादव ने यहां से अपना पहला शपथ ग्रहण किया था, जब जनता दल ने मंडल कमीशन की सिफारिशों पर समर्थन के दम पर सत्ता हासिल की थी। उस समय नीतीश कुमार लालू के साथी थे, लेकिन जल्द ही मतभेदों के कारण अलगाव हो गया। 2000 में नीतीश ने यहां से लालू सरकार के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया, जब उन्होंने कहा, “भिक्षा नहीं, हिस्सेदारी चाहिए। जो सरकार हमारे हितों को नजरअंदाज करे, वह सत्ता में नहीं रह सकती।” यह वाक्य बिहार की राजनीति में एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। तीन दशक बाद, आज वही गांधी मैदान नीतीश की 10वीं शपथ का साक्षी बना, जहां लालू का आरजेडी गठबंधन बुरी तरह हार गया। नीतीश ने अपनी ‘सुशासन बाबू’ की छवि को मजबूत किया है, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी अटकलें (जैसे उनकी आवाज और गतिविधियों पर सवाल) अब भी बनी हुई हैं। फिर भी, एनडीए की जीत ने साबित कर दिया कि मतदाता विकास और स्थिरता को प्राथमिकता देते हैं।​

नई कैबिनेट का गठन: अनुभवी चेहरों पर जोर और जातिगत संतुलन

नीतीश कुमार के साथ कुल 21 विधायकों ने मंत्री के रूप में शपथ ली, जो नई 26 सदस्यीय मंत्रिपरिषद का आधार बनेगी। इसमें भाजपा को सबसे ज्यादा 14 पद, जेडीयू को 8, लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) को 2, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) को 1, और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को 1 पद मिला। कुल मिलाकर 9 नए चेहरे शामिल हैं, जबकि बाकी अनुभवी नेता हैं, जो सरकार को स्थिरता प्रदान करेंगे। भाजपा ने जेडीयू पर ‘बड़े भाई’ का दर्जा बरकरार रखा, लेकिन सीटों के अनुपात में संतुलन बनाते हुए जातिगत समीकरणों का ध्यान रखा। यह चयन बिहार की जटिल सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर किया गया है, जहां यादव, कुर्मी, कोइरी, ईबीसी, एससी-एसटी और मुस्लिम वोट बैंक महत्वपूर्ण हैं।​

भाजपा की ओर से उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा ने शपथ ली, जो पिछली सरकार में भी नीतीश के डिप्टी रहे थे और अब पांच साल के लिए दोबारा जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। दलीप जायसवाल, जो पहले राजस्व और भूमि सुधार मंत्री रह चुके हैं, ने भी शपथ ली। अन्य प्रमुख भाजपा नेता मंगल पांडेय (पूर्व स्वास्थ्य मंत्री), संजय सिंह ‘टाइगर’ (मिल्कीपुर से विधायक), राम कृपाल यादव (पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री और लोकसभा सांसद, जो आरजेडी और जेडीयू से भाजपा में आए), नितिन नवीन (पूर्व सड़क निर्माण मंत्री), प्रेम कुमार (पूर्व कानून, गन्ना विकास और कला-संस्कृति मंत्री), लक्ष्येंद्र रौशन (पूर्णिया से विधायक), आशीष कुमार सिंह, सुरेंद्र मेहता, नारायण प्रसाद, राम निषाद, अरुण शंकर प्रसाद और श्रेयसी सिंह ने शपथ ग्रहण की। श्रेयसी सिंह, 34 वर्षीय कॉमनवेल्थ गेम्स की स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज, ने जामुई सीट से अपनी जीत को कैबिनेट पद में बदल लिया और युवा चेहरा के रूप में उभरीं।​

जेडीयू की ओर से विजेंद्र प्रसाद यादव (पूर्व ऊर्जा मंत्री, जो बिजली आपूर्ति में सुधार के लिए जाने जाते हैं), श्रवण कुमार (पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री, गरीबी उन्मूलन योजनाओं के जानकार), विजय कुमार चौधरी (पूर्व जल संसाधन मंत्री, बाढ़ प्रबंधन विशेषज्ञ), अशोक चौधरी (पूर्व ग्रामीण इंजीनियरिंग और पंचायती राज मंत्री), लेशी सिंह (पूर्व उपभोक्ता संरक्षण मंत्री, पांच बार की विधायक), मदन साहनी (पूर्व सामाजिक कल्याण मंत्री, जो आरजेडी से जेडीयू में आए), सुनील कुमार (भोर से दो बार विधायक) और मोहम्मद जामा खान (पूर्व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री) ने शपथ ली। इनमें से कई नेता नीतीश के लंबे समय के सहयोगी हैं, जो पार्टी की मजबूती को दर्शाते हैं। यह चयन न केवल अनुभव पर आधारित है, बल्कि बिहार के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विकास को गति देने के लिए रणनीतिक रूप से तैयार किया गया है।​

छोटे सहयोगियों को मिला प्रतिनिधित्व: गठबंधन की मजबूती का संकेत

एनडीए के छोटे सहयोगी दलों को भी प्रतिनिधित्व देकर गठबंधन की एकजुटता को मजबूत किया गया। लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के चिराग पासवान ने अपनी पार्टी को दो पद दिलाए, जिसमें संजय कुमार सिंह (महुआ से विधायक) ने तेज प्रताप यादव (लालू के बेटे) को हराकर पहली बार मंत्री बने। हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) के जितन राम मांझी ने अपने बेटे संतोष मांझी को पद दिलाया, जो विधान परिषद सदस्य हैं और पहले सूचना प्रौद्योगिकी व आपदा प्रबंधन मंत्री रह चुके हैं। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को पहली बार मंत्री बनवाया, जो विधान परिषद सदस्य हैं। ये नियुक्तियां दल-विशेष से अधिक गठबंधन की व्यापकता दिखाती हैं, जहां छोटे दलों को महत्व देकर एनडीए ने अपनी पकड़ मजबूत की।​

भविष्य की दिशा: विकास और चुनौतियां

यह कैबिनेट गठन बिहार की जातिगत और क्षेत्रीय गणित को संतुलित करने का सफल प्रयास है, जहां जेडीयू-भाजपा ने अनुभवी नेताओं को प्राथमिकता दी ताकि सरकार स्थिर रहे। चुनावों में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को 238 सीटों पर लड़ी होने के बावजूद एक भी सीट न मिलना विपक्ष की कमजोरी को उजागर करता है। नीतीश कुमार की नई सरकार अब बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महिला सशक्तिकरण पर फोकस करेगी, जैसा कि एनडीए के चुनावी घोषणापत्र में वादा किया गया है। हालांकि, आर्थिक चुनौतियां जैसे बेरोजगारी, बाढ़ और प्रवासन बिहार के समक्ष बरकरार हैं, जिन्हें नई टीम को संबोधित करना होगा। कुल मिलाकर, यह शपथ ग्रहण बिहार के लिए एक नई शुरुआत का प्रतीक है, जहां स्थिरता और विकास की उम्मीदें बढ़ गई हैं।