नेपाल अशांतिः कौन है सुशीला कारकी? अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने वाली पहली महिला मुख्य न्यायाधीश और अब सबसे आगे
नेपाल में चल रहे जेन ज़ी प्रदर्शन आंदोलन ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अपना अंतरिम नेता चुना है, जैसा कि समाचार एजेंसी एएनआई ने विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया। यह फैसला लगभग चार घंटे तक चली एक वर्चुअल बैठक में लिया गया, जिसमें युवा आयोजकों ने स्पष्ट रूप से सहमति जताई कि कोई भी राजनीतिक दलों से जुड़ा हुआ युवा इस महत्वपूर्ण भूमिका को नहीं संभालेगा। इसके बजाय, कार्की को आगामी राजनीतिक वार्ताओं में प्रदर्शनकारियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया, जैसा कि नेपाल के स्थानीय मीडिया प्लेटफॉर्म खबरहब ने विस्तार से बताया। यह निर्णय ऐसे समय पर आया है जब राजधानी काठमांडू में सख्त कर्फ्यू लागू है, और सरकारी इमारतों, प्रमुख राजनेताओं के निजी आवासों तथा यहां तक कि संसद भवन को गुस्साए प्रदर्शनकारियों द्वारा आग के हवाले कर दिया गया है। व्यवस्था बहाल करने के लिए सेना की टुकड़ियां तैनात की गई हैं, और स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है। ये विरोध प्रदर्शन मूल रूप से एक विवादास्पद सोशल मीडिया प्रतिबंध से शुरू हुए थे, लेकिन अब वे भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, आर्थिक असमानता और लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अभिजात वर्ग की सत्ता के खिलाफ एक व्यापक जन-असंतोष में बदल चुके हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अशांति की शुरुआत से अब तक कम से कम 19 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि सैकड़ों प्रदर्शनकारी और सुरक्षा बलों के सदस्य घायल हुए हैं।
ये प्रदर्शन नेपाल के युवा पीढ़ी की गहरी निराशा और हताशा को उजागर करते हैं, जहां बेरोजगारी की दर ऊंची है, शिक्षा प्रणाली कमजोर है, और आर्थिक अवसर सीमित हैं। आंदोलन ने अब राजनीतिक सुधारों की मांग को और मजबूत किया है, जिसमें नई अंतरिम सरकार का गठन, भ्रष्टाचार पर सख्त कानूनी कार्रवाई, और युवाओं को राजनीतिक प्रक्रिया में अधिक भागीदारी शामिल है। हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि प्रदर्शनकारियों ने अंतरिम सरकार के लिए एक ऐसे तटस्थ और सम्मानित चेहरे की तलाश की, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों से पूरी तरह अलग हो और जनता का विश्वास जीत सके। इस संदर्भ में, सुशीला कार्की का नाम सर्वसम्मति से चुना गया, क्योंकि उनकी छवि न्यायिक निष्पक्षता और भ्रष्टाचार विरोधी रुख की है। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह आंदोलन नेपाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है, खासकर जब देश पहले से ही आर्थिक संकट और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है।
प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि को समझने के लिए, यह जानना जरूरी है कि सोशल मीडिया प्रतिबंध का मुद्दा केवल शुरुआत था। सरकार ने कथित तौर पर फर्जी खबरों और अफवाहों को रोकने के नाम पर यह प्रतिबंध लगाया, लेकिन युवाओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना। इससे पहले, नेपाल में कोविड-19 महामारी के दौरान बढ़ी बेरोजगारी और सरकारी भ्रष्टाचार की घटनाओं ने जनता के गुस्से को भड़काया। अब, प्रदर्शनकारी न केवल सोशल मीडिया की बहाली की मांग कर रहे हैं, बल्कि पूरे राजनीतिक सिस्टम में बदलाव चाहते हैं, जिसमें नए चुनाव और स्वतंत्र जांच आयोगों का गठन शामिल है। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में कई मौतें हुईं, और मानवाधिकार संगठनों ने अत्यधिक बल प्रयोग की निंदा की है।
सुशीला कार्की कौन हैं?
सुशीला कार्की नेपाल की न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम हैं, जिन्होंने 2016 में देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनकर लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। उनका जन्म 1952 में नेपाल के बिराटनगर शहर में हुआ था, और उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वकील के रूप में अपना करियर शुरू किया। कार्की ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कई वर्षों तक सेवा दी, जहां उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में साहसिक फैसले दिए। लेकिन उनका कार्यकाल 2017 में विवादों में घिर गया, जब सांसदों ने उन पर “पक्षपातपूर्ण फैसले देने” और कार्यकारी क्षेत्र में अनुचित हस्तक्षेप करने का आरोप लगाते हुए महाभियोग प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव मुख्य रूप से उनके उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा था, जिसमें अदालत ने सरकार द्वारा की गई पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को रद्द कर दिया, क्योंकि इसमें वरिष्ठता के सिद्धांत को नजरअंदाज किया गया था। इस फैसले ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, क्योंकि इससे सरकार की मनमानी पर अंकुश लगा। महाभियोग प्रक्रिया के दौरान कार्की को स्वतः निलंबित कर दिया गया, लेकिन संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह प्रक्रिया असफल रही, और जून 2017 में उनकी सामान्य सेवानिवृत्ति हो गई।
कार्की का करियर हमेशा न्यायिक स्वतंत्रता और नैतिकता पर आधारित रहा है। उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में भाग लिया, जैसे कि राजनीतिक नियुक्तियों की जांच, पर्यावरणीय मुद्दों पर फैसले, और महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े केस। सेवानिवृत्ति के बाद, वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं, और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों में अपनी आवाज बुलंद करती रहीं। हाल की अशांति में, प्रदर्शनकारियों ने उन्हें एक विश्वसनीय और निष्पक्ष व्यक्तित्व के रूप में देखा, जो राजनीतिक दलों की जकड़न से मुक्त हैं। उनकी छवि ऐसी है कि वे युवाओं की मांगों को प्रभावी ढंग से सरकार के सामने रख सकती हैं, और अंतरिम सरकार में उनकी भूमिका राजनीतिक स्थिरता ला सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कार्की का अनुभव नेपाल की न्यायिक प्रणाली को मजबूत करने में मददगार साबित होगा।
इससे पहले, काठमांडू के युवा मेयर बालेंद्र शाह, जिन्हें लोकप्रिय रूप से “बालेन” कहा जाता है, अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने वाले एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरे थे। 35 वर्षीय बालेन ने भारत के कर्नाटक स्थित विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की है। वे नेपाल के अंडरग्राउंड हिप-हॉप संगीत दृश्य से प्रमुखता में आए, जहां उनके गाने भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और युवाओं की समस्याओं पर केंद्रित होते थे। राजनीति में प्रवेश करने से पहले, बालेन ने इंजीनियर के रूप में काम किया और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहे। 2022 में काठमांडू के मेयर चुने जाने के बाद, उन्होंने शहर की सफाई, ट्रैफिक प्रबंधन और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों से सुर्खियां बटोरीं। जून 2023 में, उन्होंने फिल्म “आदिपुरुष” में नेपाल से जुड़ी एक विवादास्पद लाइन के विरोध में काठमांडू में सभी भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई। बालेन की लोकप्रियता युवाओं के बीच उनकी सीधी और बेबाक शैली से आती है, लेकिन प्रदर्शन आयोजकों ने राजनीतिक तटस्थता को प्राथमिकता देते हुए कार्की को चुना। फिर भी, बालेन का प्रभाव आंदोलन में बना हुआ है, और वे युवाओं की आवाज को मजबूत करने में भूमिका निभा रहे हैं।
ये घटनाक्रम नेपाल की राजनीतिक स्थिति को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं, जहां युवा अब पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह चुनौती दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से भारत और चीन जैसे पड़ोसी देश, स्थिति पर नजर रखे हुए हैं, क्योंकि नेपाल की स्थिरता क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी है। मानवाधिकार संगठनों ने सरकार से संयम बरतने और प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण विरोध की अपील की है। कार्की जैसी हस्तियां यदि अंतरिम सरकार का नेतृत्व करती हैं, तो यह सुधारों की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बहुत हैं।
